ख्वाजा गरीब नवाज के 814वें उर्स में पाकिस्तानी जायरीनों का आना अनिश्चित, भारत-पाक तनाव की छाया

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में हर साल मनाए जाने वाले विश्व प्रसिद्ध उर्स के 814वें आयोजन की तैयारियां जोरों पर हैं।

ख्वाजा गरीब नवाज के 814वें उर्स में पाकिस्तानी जायरीनों का आना अनिश्चित, भारत-पाक तनाव की छाया

अजमेर। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में हर साल मनाए जाने वाले विश्व प्रसिद्ध उर्स के 814वें आयोजन की तैयारियां जोरों पर हैं। 17 दिसंबर को उर्स का झंडा चढ़ाया जाएगा, लेकिन इस बार पाकिस्तान से आने वाले सैकड़ों जायरीनों पर गहरा सस्पेंस बना हुआ है।

1974 के भारत-पाक ‘प्रोटोकॉल ऑन विजिट्स टू रिलिजियस श्राइंस’ के तहत हर साल लगभग 500 पाकिस्तानी जायरीन अजमेर आते हैं और इसके लिए उर्स से करीब एक महीना पहले पाकिस्तानी अखबारों में विज्ञापन जारी कर आवेदन प्रक्रिया शुरू हो जाती है। लेकिन इस बार न तो विज्ञापन जारी हुआ और न ही आवेदन प्रक्रिया शुरू हुई है।

सूत्रों के मुताबिक, 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले (22 अप्रैल), उसके जवाब में भारत के ऑपरेशन सिंदूर (7 मई) और इसके बाद दिल्ली में हुए बम धमाकों ने दोनों देशों के रिश्तों में भारी कड़वाहट पैदा कर दी है। इन घटनाओं के बाद सीमा पर चार दिनों तक गोलाबारी और सैन्य तनाव की स्थिति बनी रही थी। यही वजह है कि पाकिस्तान इस बार जायरीनों को भेजने को लेकर बेहद सतर्क है, जबकि भारत की ओर से भी अतिरिक्त सुरक्षा स्क्रूटनी की तैयारी है।

अजमेर जिला पुलिस अधीक्षक वंदिता राणा ने बताया, “अभी तक पाकिस्तानी जायरीनों के आगमन की कोई औपचारिक सूचना नहीं मिली है।” इसी तरह अजमेर रेल मंडल के मुख्य वाणिज्य प्रबंधक (CDCM) कैप्टन मिहिर देव ने कहा कि जgevers

जायरीन स्पेशल ट्रेन को चलाने के लिए अभी तक कोई निर्देश नहीं मिले हैं। हर साल पाकिस्तानी जायरीन विशेष ट्रेन से अटारी बॉर्डर होते हुए अजमेर पहुंचते हैं।

दरगाह परिसर में रंग-रोगन और सजावट का काम युद्धस्तर पर चल रहा है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं। अगर अंतिम समय में पाकिस्तान जायरीन भेजने का फैसला भी करता है, तो भी कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल और वीज़ा स्क्रूटनी के साथ ही उन्हें आने दिया जाएगा।