मकर संक्रांति पर पुष्कर के वराह मंदिर में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, पगड़ीधारी धर्मराज बने आस्था का केंद्र
मकर संक्रांति 2026 के पावन अवसर पर ब्रह्मा की नगरी पुष्कर में आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला। यहां भगवान विष्णु के वराह अवतार का 10वीं सदी का प्राचीन वराह मंदिर श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र बना रहा
पुष्कर। मकर संक्रांति 2026 के पावन अवसर पर ब्रह्मा की नगरी पुष्कर में आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला। यहां भगवान विष्णु के वराह अवतार का 10वीं सदी का प्राचीन वराह मंदिर श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र बना रहा। मकर संक्रांति पर मंदिर परिसर में दिनभर मेले जैसा माहौल रहा और देश–प्रदेश से आए श्रद्धालुओं ने दर्शन कर दान-पुण्य किया।
वराह मंदिर की सबसे खास और अनोखी परंपरा यह है कि यहां भगवान धर्मराज, भगवान वराह के द्वारपाल के रूप में विराजमान हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर स्थापित धर्मराज की प्रतिमा सिर पर पगड़ी धारण किए पहरेदार के रूप में दिखाई देती है, जो देशभर में अपनी तरह की दुर्लभ मान्यता मानी जाती है। बताया जाता है कि मंदिर की स्थापना के समय ही धर्मराज की प्रतिमा भी स्थापित की गई थी और तभी से मकर संक्रांति पर उनकी पूजा और कथा सुनने की परंपरा चली आ रही है।
मकर संक्रांति के दिन श्रद्धालुओं ने पुष्कर सरोवर में पवित्र स्नान कर ब्रह्मा मंदिर के दर्शन किए, इसके बाद बड़ी संख्या में भक्त वराह मंदिर पहुंचे। सुबह ठंड अधिक होने के कारण श्रद्धालुओं की संख्या कम रही, लेकिन जैसे-जैसे सूर्य की किरणें तेज हुईं, मंदिरों और घाटों पर भक्तों की भीड़ बढ़ती गई।
पंडित दिलीप शास्त्री के अनुसार मकर संक्रांति पर महापुण्य काल दोपहर 3:13 बजे से शाम 4:58 बजे तक रहा, जबकि शुभ समय शाम 5:55 बजे तक माना गया। इसी दौरान सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने से दान-पुण्य का विशेष महत्व रहा। पूरे दिन पुष्कर में भक्ति, श्रद्धा और पुण्य का वातावरण बना रहा।

