सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एंटी-कन्वर्जन कानून पर नोटिस जारी किया, राष्ट्रीय बैच में जोड़ा

देश की शीर्ष अदालत ने राजस्थान विधिविरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2025 (Rajasthan Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2025) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक और रिट याचिका पर राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एंटी-कन्वर्जन कानून पर नोटिस जारी किया, राष्ट्रीय बैच में जोड़ा

नई दिल्ली। देश की शीर्ष अदालत ने राजस्थान विधिविरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2025 (Rajasthan Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2025) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक और रिट याचिका पर राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर दिया है। यह नोटिस जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने आज सुनवाई के दौरान जारी किया, जो अब कुल चौथी ऐसी याचिका बन गई है।

याचिका पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) और अन्य संगठनों की ओर से दायर की गई है, जिसमें कानून के प्रावधानों को "मनमाना, अविवेकपूर्ण, अवैध और संविधान-विरुद्ध" बताते हुए अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) समेत अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) पर अनुचित प्रतिबंध लगाता है और अल्पसंख्यक समुदायों को उत्पीड़न का शिकार बनाने का माध्यम बन सकता है।

महत्वपूर्ण अपडेट, राष्ट्रीय बैच में टैगिंग

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को तत्काल प्रभाव से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों के समान "फ्रीडम ऑफ रिलीजन" या "एंटी-कन्वर्जन" कानूनों से जुड़े लंबित मामलों के राष्ट्रीय बैच के साथ जोड़ दिया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच को बताया कि ये मामले पहले से ही कोर्ट में लंबित हैं, इसलिए नई याचिका को इन्हीं के साथ टैग किया जाए।

इसका सीधा मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट अब एक साथ लगभग 10 राज्यों के इन विवादास्पद कानूनों की संवैधानिक जांच करेगा। ये कानून मुख्य रूप से "जबरन या धोखे से धर्मांतरण" को रोकने का दावा करते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अंतर-धार्मिक विवाहों को बाधित करते हैं। सितंबर 2025 में ही कोर्ट ने इन राज्यों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा था, और अब यह बैच और मजबूत हो गया है।

पृष्ठभूमि और अन्य याचिकाएं

पिछली सुनवाईयां: 3 नवंबर 2025 को कोर्ट ने दो अन्य याचिकाओं पर नोटिस जारी किया था, जो इसी कानून के प्रावधानों (जैसे संपत्ति जब्ती, धार्मिक स्थलों पर विध्वंस और एक करोड़ तक जुर्माना) को चुनौती देती हैं। 17 नवंबर को जयपुर कैथोलिक वेलफेयर सोसाइटी की याचिका पर भी नोटिस जारी हुआ, जिसमें कानून को "अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का औजार" बताया गया।

राजस्थान कानून की खासियतें: यह कानून सितंबर 2025 में राज्य विधानसभा से पारित होकर 29 अक्टूबर से लागू हुआ। इसमें "मास कन्वर्जन" (दो से अधिक व्यक्तियों का रूपांतरण) पर 20 साल से आजीवन कारावास और भारी जुर्माने का प्रावधान है। समर्थक इसे "धोखाधड़ी रोकने वाला" बताते हैं, जबकि विरोधी इसे संविधान-विरुद्ध मानते हैं।

राष्ट्रीय संदर्भ: भारत के कई राज्यों में ऐसे कानून हैं, जो "लव जिहाद" जैसे मुद्दों से जुड़े हैं। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इन पर चिंता जताई है, इन्हें धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला बताया है।

अगली कार्रवाई

कोर्ट ने राजस्थान सरकार और केंद्र को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। जवाब मिलने के बाद अंतरिम रोक लगाने की मांग पर विचार किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश की धार्मिक स्वतंत्रता नीति को प्रभावित कर सकता है।

यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता बनाम राज्य हस्तक्षेप के बीच संतुलन का बड़ा परीक्षण बनेगा। अधिक अपडेट के लिए आधिकारिक स्रोतों पर नजर रखें।