राजस्थान में दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को मिलेगा चुनाव लड़ने का मौका, 30 साल पुराने नियम में संशोधन को मंजूरी

राजस्थान सरकार ने पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़े विवादास्पद 'दो बच्चों' वाले नियम को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।

राजस्थान में दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को मिलेगा चुनाव लड़ने का मौका, 30 साल पुराने नियम में संशोधन को मंजूरी

जयपुर। राजस्थान सरकार ने पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़े विवादास्पद 'दो बच्चों' वाले नियम को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। नगरीय विकास एवं आवास मंत्री जाबर सिंह खर्रा ने नगर पालिका अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव को प्रशासनिक मंजूरी प्रदान कर दी है। अब यह प्रस्ताव विधि विभाग को भेजा जाएगा, जहां से हरी झंडी मिलने के बाद इसे कैबिनेट में रखा जाएगा। यदि विधानसभा में संशोधन विधेयक पारित हो जाता है, तो आने वाले निकाय और पंचायत चुनावों से पहले ही यह नियम बदल सकता है, जिससे हजारों उम्मीदवारों को राहत मिलेगी।

यह संशोधन राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 और राजस्थान नगर पालिका अधिनियम, 2009 में किया जाएगा। वर्तमान प्रावधानों के तहत, 27 नवंबर 1995 के बाद तीसरा बच्चा पैदा होने पर व्यक्ति पंच, सरपंच, उप-सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, प्रधान, जिला प्रमुख, पार्षद, सभापति या महापौर जैसे पदों के लिए अयोग्य घोषित हो जाता है। यह अयोग्यता धारा-24 (नगर पालिका अधिनियम) और पंचायती राज अधिनियम की धारा-19 में निहित है।

संशोधन की प्रक्रिया: अध्यादेश से विधानसभा तक का सफर

प्रशासनिक मंजूरी: मंत्री खर्रा ने प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है। यह कदम नवंबर 2025 में शुरू हुई प्रक्रिया का हिस्सा है, जब सरकार ने अध्यादेश लाने की तैयारी शुरू की थी।

विधि विभाग की समीक्षा: प्रस्ताव अब विधि विभाग के पास जाएगा, जहां कानूनी पहलुओं की जांच होगी।

कैबिनेट और विधानसभा: मंजूरी के बाद कैबिनेट में रखा जाएगा। उसके बाद विधानसभा में विधेयक पेश होगा। अध्यादेश के जरिए तत्काल प्रभाव लागू किया जा सकता है, लेकिन इसे 6 महीने के अंदर विधानसभा से पारित कराना होगा।

समयसीमा: यदि सब कुछ सुचारू रहा, तो 2026 के निकाय चुनावों से पहले बदलाव लागू हो सकता है।

मंत्री खर्रा ने कहा, "दो बच्चों के नियम से निर्वाचित प्रतिनिधियों को भेदभाव का सामना नहीं करना चाहिए। लोकसभा-विधानसभा में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है, तो स्थानीय चुनावों में क्यों?" यह बदलाव भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के कई नेताओं को फायदा पहुंचा सकता है, जो वर्तमान में अयोग्य हैं।

इतिहास: 1995 का प्रावधान और अब बदलाव की मांग

यह नियम 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैंरो सिंह शेखावत की भाजपा सरकार ने लागू किया था, जब परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संशोधन किया गया। लेकिन लंबे समय से सामाजिक संगठनों, भाजपा नेताओं और विधायकों ने इसे हटाने की मांग की। स्वतंत्र विधायक चंद्रभान सिंह ने भी विधानसभा में यह मुद्दा उठाया था। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के बयान ने भी बहस को हवा दी, जहां उन्होंने हिंदू परिवारों को अधिक संतान के लिए प्रोत्साहित किया।

कांग्रेस ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई है। पार्टी का कहना है कि इससे बेरोजगारी और जनसंख्या वृद्धि बढ़ सकती है। हालांकि, सरकार इसे समानता का कदम बता रही है।

प्रभाव: ग्रामीण राजनीति में बड़ा उलटफेर

लाभार्थी: ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में पुरुष और महिलाएं प्रभावित हैं। अध्ययनों के अनुसार, महिलाओं का 41% हिस्सा इस नियम से अयोग्य होता रहा है।

राजनीतिक बदलाव: सरपंच से मेयर तक के पदों पर नए चेहरे आ सकते हैं, जिससे स्थानीय सियासत में विविधता बढ़ेगी।

 राजस्थान के अलावा आंध्र प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, ओडिशा और गुजरात जैसे राज्य भी इसी तरह के प्रावधान रखते हैं, लेकिन कई ने इन्हें नरम किया है।

यह संशोधन न केवल चुनावी मैदान को व्यापक बनाएगा, बल्कि परिवार नियोजन नीति पर भी नई बहस छेड़ सकता है। सरकार का दावा है कि यह जनता की लंबे समय की मांग को पूरा करेगा।