बिहार विधानसभा चुनाव 2025: महागठबंधन की बुरी हार के पीछे के प्रमुख कारणों का विस्तृत विश्लेषण

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाले महागठबंधन को करारी शिकस्त मिली। कुल 243 सीटों पर हुए इस चुनाव में एनडीए (BJP-JD(U)-LJP) ने 202 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया, जबकि महागठबंधन केवल 35 सीटों पर सिमट गया। RJD को 22 सीटें मिलीं, कांग्रेस को मात्र 5-6, और अन्य सहयोगी दलों को बिखरी हुई सफलता।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: महागठबंधन की बुरी हार के पीछे के प्रमुख कारणों का विस्तृत विश्लेषण

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाले महागठबंधन को करारी शिकस्त मिली। कुल 243 सीटों पर हुए इस चुनाव में एनडीए (BJP-JD(U)-LJP) ने 202 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया, जबकि महागठबंधन केवल 35 सीटों पर सिमट गया। RJD को 22 सीटें मिलीं, कांग्रेस को मात्र 5-6, और अन्य सहयोगी दलों को बिखरी हुई सफलता। मतदान के समय महागठबंधन सत्ता परिवर्तन का दावा कर रहा था, लेकिन नतीजों ने तेजस्वी यादव और उनके गठबंधन को पूरी तरह नकार दिया। वोट शेयर में RJD ने 25-27% हासिल किया (2020 से थोड़ा बेहतर), लेकिन सीटों में 110 से घटकर 35 रह जाना हार की गहराई दर्शाता है।

इस हार के पीछे कई संरचनात्मक, रणनीतिक और सामाजिक कारण हैं। चुनाव विश्लेषकों, मीडिया रिपोर्ट्स और एग्जिट पोल्स के आधार पर नीचे इनका विस्तृत विश्लेषण दिया गया है। जो जाति गतिशीलता, अव्यावहारिक वादों, गठबंधन की कमजोरियां और मतदाता व्यवहार से जुड़े हैं। इसके अलावा, अन्य माध्यमों से मिले आंकड़ों से अतिरिक्त अंतर्दृष्टि भी जोड़ी गई है।

  1. सीट बंटवारे में आपसी कलह और यादव-केंद्रित रणनीति का उल्टा असर

महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी सीट वितरण में उभरी। तेजस्वी यादव ने 143 सीटों में से 52 (लगभग 36%) टिकट यादव उम्मीदवारों को दिए, जबकि बिहार में यादव आबादी मात्र 14% है। 2020 में यह संख्या 40 थी, लेकिन 2025 में इसे बढ़ाने से 'यादव राज' की छवि मजबूत हुई। BJP ने इसे 'आरजेडी का जातिवादी एजेंडा' बताकर प्रचार किया, जो गैर-यादव वोटरों (विशेषकर EBC, OBC और शहरी मध्यम वर्ग) में घुसपैठ कर गया। परिणाम: 126 यादव-बहुल सीटों में से महागठबंधन को केवल 17 मिलीं, जबकि NDA ने 102 जीतीं।

सहयोगी दलों (कांग्रेस, वामपंथी) में असंतोष बढ़ा। घोषणापत्र का नाम 'तेजस्वी प्रण' रखना भी कलह का कारण बना, क्योंकि इससे लग रहा था कि RJD ही मुख्य है। नेताओं के बीच तालमेल की कमी को हार का कारण बताया गया। कुल मिलाकर, यह रणनीति वोट ट्रांसफर को बाधित कर गठबंधन की एकता तोड़ गई।

  1. अव्यावहारिक और लुभावने वादों का बुलबुला फूटना

तेजस्वी के अभियान का केंद्र 'हर परिवार में एक सरकारी नौकरी, 30,000 रुपये पेंशन और जीविका दीदियों को 30,000 मासिक' जैसे वादे थे। लेकिन इनकी कोई स्पष्ट योजना, बजट या कार्यान्वयन रोडमैप नहीं था। युवा मतदाताओं (जो बेरोजगारी से त्रस्त हैं) ने इसे 'लोकलुभावन' माना, न कि विश्वसनीय। मतदान के दोनों चरणों के बाद भी विस्तार न देने से विश्वास टूटा।

NDA ने विपरीत रणनीति अपनाई: बूथ-स्तरीय 'भरोसेमंद घोषणाएं' जैसे 'लड़कियों को साइकिल, छात्रवृत्ति और रोजगार मेले'। इससे युवा वोटर NDA की ओर खिसके। एग्जिट पोल्स में 18-25 आयु वर्ग में NDA को 55% समर्थन मिला, जबकि महागठबंधन को 30% से कम। यह वादों की खोखलापन हार का प्रमुख कारक बनी।

  1. EBC, सहयोगी दलों और कांग्रेस की नाकामी

अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC, 36% आबादी) महागठबंधन का पारंपरिक वोट बैंक था, लेकिन 2025 में यह टूट गया। 141 EBC-बहुल सीटों में से महागठबंधन को केवल 14 मिलीं (2020 में 61 थीं)। तेजस्वी ने EBC से संपर्क अंतिम समय में किया, जिससे प्रभावी मोबिलाइजेशन नहीं हो सका। NDA ने JDU के जरिए EBC को मजबूती से जोड़ा।

कांग्रेस की स्थिति और खराब रही: 60-61 सीटों पर लड़ी, लेकिन केवल 5-6 जीतीं (वोट शेयर 8.71%)। राहुल गांधी की 'वोट अधिकार यात्रा' और 'गांधी मैजिक' फेल साबित हुआ। कई सीटों पर उम्मीदवार बदलाव से बागी उभरे, और युवा-महिलाओं में कांग्रेस का आकर्षण शून्य रहा। वाम दलों की भी सीमित पहुंच ने गठबंधन को कमजोर किया।

  1. मुस्लिम तुष्टिकरण की धारणा और 'जंगलराज' की छवि

महागठबंधन की मुस्लिम-समर्थक छवि (15% आबादी) उल्टी पड़ी। वक्फ कानून रद्द करने का वादा और RJD MLC कारी सोहेब का विवादित बयान ('वक्फ बिल वालों का इलाज') BJP ने 'जंगलराज की वापसी' से जोड़ा। इससे यादव समर्थक भी छिटके। सीमांचल (मुस्लिम बहुल) में महागठबंधन को बुरी हार मिली।

NDA ने 'शांति और विकास' का नैरेटिव चलाया, जो एग्जिट पोल्स में 60% वोटरों को आकर्षित किया। यह धारणा तेजस्वी को 'लालू 2.0' के रूप में पेश कर हार का कारण बनी।

  1. महिलाओं-युवाओं का रुझान NDA की ओर, लालू विचारधारा पर दोहरा मानदंड

महिलाओं का मतदान 71.6% रहा (पुरुषों से 9% अधिक), जो ऐतिहासिक था। नीतीश कुमार की योजनाएं (एक करोड़ महिलाओं को 10,000 रुपये, साइकिल स्कीम) ने उन्हें NDA की ओर खींचा। युवाओं में भी रोजगार वादे फेल होने से NDA को फायदा।

तेजस्वी ने खुद को लालू प्रसाद की सामाजिक न्याय विचारधारा से जोड़ा, लेकिन 'जंगलराज' से दूरी बनाई यह दोहरापन मतदाताओं को पसंद नहीं आया। लालू का प्रचार में अभाव और उनके पोस्टरों की कमी ने पारंपरिक समर्थकों को निराश किया। 

अन्य प्रमुख फैक्टर

  • NDA की मजबूत रणनीति: बूथ-स्तरीय एकजुटता, प्रशांत किशोर जैसे सलाहकारों का समर्थन, और जातिगत संतुलन (JDU-EBC, BJP-उपरी जातियां)।
  • तेज प्रताप जैसी आंतरिक कलह: तेज प्रताप यादव महुआ में तीसरे नंबर पर रहे, जो RJD की आंतरिक अस्थिरता दर्शाता है।
  • राहुल गांधी का 'वोटचोरी' मुद्दा: जनता को अपील नहीं की, बल्कि BJP ने इसे मजाक बनाया।

कारक

महागठबंधन पर असर

NDA को फायदा

जाति रणनीति

यादव तरजीह से गैर-यादव वोट लॉस

संतुलित जातिगत गठजोड़

वादे

अव्यावहारिक, योजना-रहित

भरोसेमंद, क्रियान्वित

EBC/सहयोगी

देर से संपर्क, कलह

मजबूत मोबिलाइजेशन

छवि

तुष्टिकरण + जंगलराज

विकास + शांति

मतदाता वर्ग

महिलाएं-युवा खिसके

उच्च भागीदारी का लाभ