हनुमान बेनीवाल ने पार्टी क्यों बनाई, क्या पूरा हुआ पार्टी बनाने का मकसद?

राजस्थान की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) आज अपनी सालगिराह मना रही है। यह पार्टी 29 अक्टूबर 2018 को हनुमान बेनीवाल ने बनाई थी, जब उन्होंने भाजपा से मतभेदों के बाद किसानों, युवाओं और ग्रामीण समाज की आवाज़ को एक अलग मंच देने का फैसला किया था।

हनुमान बेनीवाल ने पार्टी क्यों बनाई, क्या पूरा हुआ पार्टी बनाने का मकसद?

राजस्थान की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) आज अपनी सालगिराह मना रही है। यह पार्टी 29 अक्टूबर 2018 को हनुमान बेनीवाल ने बनाई थी, जब उन्होंने भाजपा से मतभेदों के बाद किसानों, युवाओं और ग्रामीण समाज की आवाज़ को एक अलग मंच देने का फैसला किया था। उन्होंने इसे राजस्थान के किसान, ग्रामीण और क्षेत्रीय मुद्दों पर केंद्रित एक वैकल्पिक दल के रूप में लॉन्च किया।

भाजपा से मतभेद और अलग राजनीतिक रास्ता

हनुमान बेनीवाल भाजपा में वरिष्ठ नेताओं के भ्रष्टाचार और व्यवहार संबंधी आरोपों को लेकर पहले ही असहज थे। इसी कारण उन्होंने पार्टी से दूरी बनाई और किसान आंदोलनों के ज़रिए अपनी राजनीतिक ताकत स्थापित करने की रणनीति अपनाई। नागौर, बारमेर और आसपास के जिलों में आयोजित उनकी बड़ी रैलियों ने ही RLP को जन्म दिया। बेनीवाल के पास भाजपा या कांग्रेस में रहकर मंत्री बनने के अवसर कई बार आए, लेकिन उन्होंने सत्ता की जगह सिद्धांत को चुना।

 कृषि कानूनों पर अलग रास्ता

2019 में भाजपा के साथ गठबंधन में रहकर लोकसभा चुनाव जीतने के बावजूद, 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में उन्होंने NDA से अलग होकर किसानों के हित में खड़े होने का निर्णय लिया। यह कदम उनकी राजनीतिक स्वतंत्रता और वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रमाण माना गया।

 बेनीवाल का राजनीतिक मिशन — तीन स्तरों पर रणनीति

  1. किसानों और ग्रामीण वर्ग को सशक्त प्रतिनिधित्व देना।
  2. RPSC, बजरी-रेत माफिया और शिक्षा जैसे मुद्दों पर जनआंदोलन खड़ा कर राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करना।
  3. स्वतंत्र पहचान बनाए रखते हुए रणनीतिक गठबंधन की गुंजाइश रखना।

बेनीवाल का बेबाक और मज़ाकिया अंदाज़ उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाता है, लेकिन यही तेवर कभी-कभी उनके खिलाफ भी माहौल तैयार कर देते हैं।

 लोकप्रियता के बावजूद संगठन की कमी

RLP ने किसानों और युवाओं की राजनीति को नई दिशा दी, परन्तु उसका प्रभाव अभी भी सीमित भूगोल तक ही रहा है। नागौर, जोधपुर, बाड़मेर और शेखावाटी के कुछ हिस्सों तक पार्टी का जनाधार मजबूत है, लेकिन पूरे राजस्थान में संगठनात्मक पैठ नहीं बन पाई। बड़े दलों के पास जहां बेहतर चुनाव प्रबंधन, संसाधन और जमीनी कार्यकर्ता हैं, वहीं RLP इन मामलों में पिछड़ जाती है।

 2018 की मजबूती और 2023 की चुनौतियां

2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कुछ सीटों पर मजबूत पकड़ बनाई थी, लेकिन 2023–24 के दौरान दलबदल, अंदरूनी विवाद और संगठनात्मक कमजोरी ने उसकी स्थिति कमजोर कर दी। नागौर में बेनीवाल का दबदबा निर्विवाद है, पर बाकी जिलों में स्थानीय जातीय समीकरण, पारंपरिक नेताओं का प्रभाव और गैर-जाट वोटों की कमी के कारण RLP सीमित होती गई। बारमेर में उमेदाराम बेनीवाल के पार्टी छोड़ने के बाद RLP की पकड़ और कमजोर हुई, जिससे उपचुनावों में भी नुकसान झेलना पड़ा।

 भविष्य की चुनौती — संगठन और रणनीति

कुल मिलाकर RLP एक ऐसी क्षेत्रीय शक्ति है जिसने किसानों और युवाओं के मुद्दों को नई पहचान दी, पर संगठन की कमी और रणनीतिक असंतुलन ने उसके विस्तार को रोका। हनुमान बेनीवाल की बेबाकी और ईमानदारी ने उन्हें जनता का नेता बनाया, लेकिन यही अंदाज कभी-कभी बड़े राजनीतिक गठबंधनों के साथ तालमेल में बाधा बनता है। भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि क्या बेनीवाल अपनी लोकप्रियता को संगठित ताकत में बदल पाते हैं या फिर RLP केवल एक सीमित क्षेत्रीय प्रभाव वाली पार्टी बनकर रह जाएगी।