“अगर आप पैसे वाले हैं तो कानून आपकी जेब में है !.......कानपुर लैंबोर्गिनी कांड: 6 लोगों को टक्कर मारने के आरोपी को 7 घंटे में जमानत, रिमांड क्यों नहीं मिली?

कानपुर में तेज रफ्तार लैंबोर्गिनी से 6 लोगों को टक्कर मारने के आरोपी को 7 घंटे में जमानत मिल गई। पुलिस की 14 दिन की रिमांड अर्जी कोर्ट ने खारिज की। जानिए पूरा मामला और कानूनी पहलू।

“अगर आप पैसे वाले हैं तो कानून आपकी जेब में है !.......कानपुर लैंबोर्गिनी कांड: 6 लोगों को टक्कर मारने के आरोपी को 7 घंटे में जमानत, रिमांड क्यों नहीं मिली?

लैंबोर्गिनी कांड: 7 घंटे में जमानत, सवालों के घेरे में जांच और सिस्टम

“अगर आप पैसे वाले हैं तो कानून आपकी जेब में है…”—कानपुर के चर्चित लैंबोर्गिनी कांड के बाद सोशल मीडिया पर यही भावना तेजी से उभर रही है। मामला उस वक्त और गरमाया जब तेज रफ्तार लेम्बोर्गिनी से 6 लोगों को टक्कर मारने के आरोपी अरबपति कारोबारी के बेटे शिवम मिश्रा को गिरफ्तारी के करीब 7 घंटे के भीतर जमानत मिल गई।

क्या हुआ कोर्ट में?

पुलिस ने कोर्ट में 14 दिन की रिमांड मांगी। लेकिन जज ने पूछा—रिमांड क्यों चाहिए? जांच अधिकारी कथित तौर पर ठोस वजह नहीं बता पाए। नतीजा: रिमांड अर्जी खारिज।
आरोपी की ओर से कहा गया कि वह जांच में सहयोग करेगा, गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा और न ही धमकाएगा। 20 हजार रुपये का बेल बॉन्ड भरने के बाद उसे रिहा कर दिया गया।

पुलिस का पक्ष

पुलिस ने दावा किया कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा था। सूचना मिली थी कि वह एंबुलेंस से निकलकर खुद को छिपाने की कोशिश कर रहा है, इसलिए गुरुवार सुबह 8 बजे घर के सामने से गिरफ्तार किया गया।

फिर इसका मतलब क्या निकले?

भावनात्मक प्रतिक्रिया और कानूनी प्रक्रिया—दोनों अलग चीजें हैं। कुछ अहम बिंदु समझना जरूरी है:

  1. जमानत अधिकार है, सजा नहीं
    कानून के तहत, जब तक अपराध गंभीर श्रेणी (जैसे गैर-जमानती/सख्त धाराएं) में न हो या पुलिस ठोस कारण न दे, अदालत जमानत दे सकती है। जमानत का मतलब बरी होना नहीं है—मुकदमा चलता रहेगा।

  2. रिमांड के लिए ठोस आधार जरूरी
    पुलिस को दिखाना होता है कि हिरासत में पूछताछ क्यों जरूरी है—जैसे साक्ष्य बरामदगी, साजिश की कड़ी, डिजिटल डेटा रिकवरी आदि। अगर यह स्पष्ट न हो, तो अदालत रिमांड नहीं देती।

  3. ‘पैसा बनाम प्रक्रिया’ की धारणा
    हाई-प्रोफाइल मामलों में त्वरित जमानत से अक्सर यह संदेश जाता है कि प्रभाव काम कर रहा है। लेकिन अदालत का फैसला रिकॉर्ड पर रखे गए तथ्यों और दलीलों पर आधारित होता है। सवाल यह है—क्या पुलिस की तैयारी कमजोर थी?

  4. जांच की कसौटी अब शुरू
    असली परीक्षा आगे है—सीसीटीवी, स्पीड एनालिसिस, मेडिकल रिपोर्ट, फॉरेंसिक, गवाहों के बयान। अगर जांच मजबूत हुई, तो कानून अपना रास्ता बनाएगा।

बड़ा सवाल: सिस्टम पर भरोसा कैसे कायम रहे?

ऐसे मामलों में पारदर्शिता बेहद जरूरी है।

  • क्या आरोप तय होंगे?

  • क्या चार्जशीट समय पर दाखिल होगी?

  • क्या पीड़ितों को न्याय मिलेगा?

जनता का भरोसा सिर्फ सख्त बयानबाजी से नहीं, बल्कि ठोस और निष्पक्ष जांच से बनता है। जमानत मिलना अंतिम फैसला नहीं है—यह मुकदमे की शुरुआत है।

लेकिन यह भी सच है कि जब हाई-प्रोफाइल आरोपी जल्दी राहत पाते हैं, तो आम लोगों के मन में सवाल उठते हैं। अब नजर इस पर रहेगी कि जांच कितनी पेशेवर और निष्पक्ष होती है—क्योंकि कानून की असली ताकत अदालत के अंतिम फैसले में दिखती है, न कि शुरुआती सनसनी में।