PM मोदी को गालियां दीं, फोटो पर जूते मारे, BJP के झंडे जलाए…क्या अब SC, ST, OBC को अपने हक के लिए सड़कों पर उतरना चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा UGC के नए प्रावधानों पर रोक लगाए जाने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में SC, ST और OBC वर्ग के छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। छात्र सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे।

PM मोदी को गालियां दीं, फोटो पर जूते मारे, BJP के झंडे जलाए…क्या अब SC, ST, OBC को अपने हक के लिए सड़कों पर उतरना चाहिए?

दिल्ली विश्वविद्यालय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा UGC के नए प्रावधानों पर रोक लगाए जाने के खिलाफ माहौल उबाल पर है। कैंपस में बड़ी संख्या में SC, ST और OBC समुदाय से जुड़े छात्र सड़कों पर उतर आए हैं, हाथों में तख्तियां, बैनर और संविधान की प्रस्तावना लिए, नारे लगाते हुए – “सामाजिक न्याय ज़िंदाबाद”, “आरक्षण हमारा अधिकार है”, “समानता नहीं, न्याय चाहिए”। विश्वविद्यालय की दीवारें और चौराहे संघर्ष के पोस्टरों से भर चुके हैं, और माहौल साफ बता रहा है कि यह केवल किसी एक नोटिफिकेशन या सर्कुलर के खिलाफ विरोध नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक न्याय के ढांचे पर हो रहे हमलों के खिलाफ एक संगठित प्रतिक्रिया है।

 विवाद क्या है?

UGC के नए प्रावधानों को लेकर बहस यह है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में SC, ST और OBC छात्रों को होने वाले जातिगत भेदभाव, बहिष्कार, मानसिक उत्पीड़न और संस्थागत हिंसा को रोकने के लिए कुछ नए नियम लागू किए गए थे – जैसे शिकायत निवारण समितियों को मजबूत करना, काउंसलिंग और सपोर्ट सिस्टम बढ़ाना, कैंपस में जाति आधारित उत्पीड़न के खिलाफ स्पष्ट प्रक्रियाएं तय करना। इन प्रावधानों का उद्देश्य था कि रोहित वेमुला, पायल तड़वी जैसे मामलों की त्रासदी दोबारा न दोहराई जाए। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने इन नए प्रावधानों पर रोक लगाई, तो छात्रों ने इसे सीधे-सीधे सामाजिक न्याय के खिलाफ कदम माना।

यही वजह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय सहित कई कैंपसों में SC, ST, OBC छात्र संगठनों ने इसे अपने अस्तित्व पर प्रहार की तरह लिया और सड़कों पर उतरने का फैसला किया। वे यह सवाल उठा रहे हैं कि जब कैंपसों में जातिगत गालियां, मानसिक उत्पीड़न, फेल कर देना, अलग-थलग कर देना, हॉस्टल और लैब में भेदभाव जैसी चीजें ज़िंदा हकीकत हैं, तो सुरक्षा के नए नियमों पर रोक किसके हित में है?

प्रदर्शन का माहौल: नारे, गुस्सा और दिशा

दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में छात्र संगठनों ने संयुक्त मोर्चा बनाकर मार्च निकाला। लड़कियां सबसे आगे, हाथों में प्लेकार्ड – “जाति के खिलाफ लड़ाई, जाति पीड़ितों पर नहीं”, “हम पढ़ने आए थे, मरने नहीं”, “कॉलेज, यूनिवर्सिटी – सबके लिए बराबर”। कई छात्र अपने गाउन/बैग पर संविधान की प्रस्तावना की कॉपी लगाए हुए दिखे, यह संदेश देते हुए कि उनकी लड़ाई किसी पार्टी के लिए नहीं, संविधान के लिए है

साथ ही, मंच से बार-बार यह बात कही जा रही है कि यह आंदोलन केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरे देश के SC, ST और OBC छात्रों को एकजुट होना पड़ेगा। कई वक्ताओं ने कहा कि जब नियम सामाजिक न्याय को थोड़ा भी मजबूत करते हैं, तो तत्काल कुछ ताकतें सक्रिय होकर उसे “अतिरेक”, “तुष्टिकरण”, “राजनीतिक खेल” बताने लगती हैं, और वहीं से विरोध की राजनीति शुरू हो जाती है।

“क्या अब SC, ST, OBC को अपने हक के लिए सड़कों पर उतरना चाहिए?”

यह सवाल आज केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक और ऐतिहासिक भी है।

क्यों उतरना जरूरी लगता है?

  1. सामाजिक न्याय खुद नहीं मिलता, छीना जाता है
    SC, ST और OBC समुदाय ने जो भी अधिकार पाए – आरक्षण, प्रमोशन में हिस्सा, शैक्षणिक संस्थानों में सीटें, SC/ST Atrocities Act, ये सब सड़क संघर्ष, आंदोलन और लंबी लड़ाई के बाद मिले, किसी ने इन्हें “खुशी से गिफ्ट” नहीं किया। यदि आज वे चुप रहेंगे, तो उनके अधिकार धीरे-धीरे कागज़ों तक सिमट जाएंगे।

  2. कैंपस में जातिगत हिंसा और मानसिक उत्पीड़न वास्तविक है
    यह कोई थ्योरी नहीं है। दलित और आदिवासी छात्रों की आत्महत्याओं, ड्रॉपआउट्स, चुप कराए गए विरोधों, अलग-थलग बैठने और “तू कोटे वाला है न” जैसी टिप्पणियों की लंबी सूची है। यदि नियमों पर रोक लगती है और समुदाय आवाज़ नहीं उठाता, तो संदेश यह जाता है कि पीड़ित समुदाय खुद भी इस हमले को लेकर गंभीर नहीं है

  3. सड़क पर उतरना लोकतंत्र का वैध तरीका है
    शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन, मार्च, बहिष्कार, मेमोरेंडम – यह सब संवैधानिक लोकतांत्रिक साधन हैं। बाबा साहब आंबेडकर ने खुद कहा था कि “संविधान ने हमें मताधिकार दिया है, लेकिन अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित संघर्ष जरूरी है।” ऐसे में यदि SC, ST, OBC छात्र अपने हक के लिए संगठित होकर सड़क पर उतरते हैं, तो यह बिल्कुल वैध है – बशर्ते आंदोलन संवैधानिक और अहिंसक रहे।

“सवर्णों ने बेवजह मुद्दा बनाकर मोदी को गालियां दीं, फोटो पर जूते मारे, BJP के झंडे जलाए…”

यह एक गंभीर और अलग स्तर का सवाल है। यहां दो बातें अलग-अलग समझना जरूरी हैं:

  1. किसी भी व्यक्ति की फोटो पर जूते मारना, जलाना, निजी गालियां देना – यह राजनीतिक विरोध का गिरा हुआ तरीका है, चाहे वह किसी भी समुदाय द्वारा, किसी भी नेता के खिलाफ किया जाए। यदि कुछ सवर्ण समूहों ने UGC प्रावधान या किसी अन्य मुद्दे पर प्रधानमंत्री की तस्वीर पर जूते मारे, BJP के झंडे जलाए, तो यह उनकी राजनीतिक अभिव्यक्ति का एक आक्रामक, प्रतीकात्मक रूप है, लेकिन इसे “मानक” बनाकर यह नहीं कहा जा सकता कि अब हर विरोध इसी स्तर पर हो।

  2. SC, ST, OBC की लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, व्यवस्था के खिलाफ है।
    दलित-बहुजन आंदोलन की ताकत हमेशा यह रही है कि उसने “व्यक्ति पूजा” या “व्यक्ति विरोध” की जगह संवैधानिक हक, सामाजिक न्याय और ढांचे में बदलाव पर जोर दिया। इसलिए यदि कोई कहे कि “वो लोग मोदी को गाली दे रहे हैं, झंडे जला रहे हैं, तो अब SC/ST भी यही करें”, तो यह रास्ता आंदोलन को नैतिक और वैचारिक रूप से कमजोर कर देगा।

आंदोलन की असली ताकत यह है कि वह कहे:

  • हम न संविधान जलाएंगे

  • न किसी की तस्वीर पर जूते मारेंगे

  • न किसी जाति/समूह को गाली देंगे

  • हम सिर्फ साफ, ठोस मांगें रखेंगे – “सामाजिक न्याय के प्रावधान वापस लाओ, SC/ST/OBC छात्रों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करो”

यहीं से आंदोलन ऊंचा बनता है, बदले की राजनीति से ऊपर उठता है।

“तो क्या SC, ST अपने हक के लिए सड़कों पर उतरेंगी?”

यदि इसे साफ शब्दों में कहें, तो:

  • हाँ, उतरना चाहिए – लेकिन समझदारी, संगठन और संविधान को हाथ में लेकर।

  • उतरना इसलिए नहीं कि “दूसरों ने गाली दी, हम भी देंगे”,

  • बल्कि इसलिए कि “हमारी पीढ़ियों ने जो हक खून-पसीने से पाए हैं, उन्हें कोई चुपचाप कमजोर न कर दे।”

क्यों यह लड़ाई ज़रूरी है?

  1. कैंपस में प्रतिनिधित्व की लड़ाई
    SC, ST, OBC छात्र यदि आज चुप रहेंगे, तो कल PhD सीटें, फैकल्टी पद, प्रमोशन, हॉस्टल आवंटन – सब में “मेरिट” के नाम पर उन्हें और पीछे धकेला जाएगा। सड़क पर उतरना, प्रेस कॉन्फ्रेंस करना, मेमोरेंडम देना – यह सब यह स्पष्ट संदेश देता है कि हम दिख रहे हैं, डरेंगे नहीं, चुप नहीं बैठेंगे।

  2. नैरेटिव बदलने की जरूरत
    अक्सर TV डिबेट और सोशल मीडिया पर यह नैरेटिव चलाया जाता है कि “आरक्षण वाले कमज़ोर हैं, उन्हें अतिरिक्त लाभ दिया जा रहा है, यह उल्टा भेदभाव है।” जब SC, ST, OBC युवा संगठित होकर बोलते हैं, अपने अनुभव बताते हैं, डेटा दिखाते हैं, तो समाज को एक दूसरी, ज़्यादा सच्ची तस्वीर मिलती है – कि आरक्षण, सुरक्षा और नियम किसी “कृपा” नहीं, बल्कि सदियों के अपमान और हिंसा के खिलाफ हल्का-सा बैलेंस हैं।

  3. आने वाली पीढ़ी के लिए जिम्मेदारी
    अगर आज की पीढ़ी के छात्र अपने हिस्से की लड़ाई नहीं लड़ेंगे, तो आने वाली पीढ़ी के पास न कैंपस में जगह होगी, न कॉलेज में सुरक्षा, न न्याय की उम्मीद। सड़कों पर उतरना केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए भी है जो अभी स्कूलों में हैं और आगे कॉलेजों में आएंगे।

आंदोलन की दिशा कैसी होनी चाहिए?

अगर SC, ST, OBC छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो आंदोलन की दिशा और भाषा बेहद महत्वपूर्ण होगी:

  • नारे – संविधान, आंबेडकर, फुले, पेरियार, बिरसा मुंडा की सोच पर आधारित हों

  • भाषा – तथ्य, तर्क और अनुभव पर आधारित हो, गाली-गलौज से दूर

  • मांगें – स्पष्ट, लिखित और व्यावहारिक:

    • UGC के प्रावधानों पर लगी रोक हटाओ

    • कैंपस में जाति आधारित उत्पीड़न पर कड़ा कानून और तंत्र लागू करो

    • SC/ST/OBC छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य, काउंसलिंग और सपोर्ट सिस्टम मजबूत करो

    • जो फैकल्टी/प्रशासनिक अधिकारी जातिगत उत्पीड़न में दोषी हों, उन पर त्वरित कार्रवाई हो

अगर आंदोलन अपनी नैतिक ऊंचाई बनाए रखेगा, तो न केवल न्यायालय, सरकार और UGC पर दबाव बनेगा, बल्कि पूरे समाज में यह संदेश जाएगा कि यह लड़ाई केवल आरक्षण की सीटों की नहीं, बराबरी की नहीं, बल्कि न्याय की है।

सवर्ण समाज की भूमिका क्या हो?

यह भी ज़रूरी है कि हर सवर्ण को एक ब्लॉक में रखकर “दुश्मन” न बनाया जाए। दो तरह के लोगों को अलग-अलग देखना होगा:

  1. वे जो सच में सामाजिक न्याय के खिलाफ हैं, हर कदम पर SC/ST/OBC के अधिकारों का विरोध करते हैं, “क्रीमी लेयर” से लेकर “आरक्षण खत्म करो” तक का जप करते हैं – इनसे वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष ज़रूरी है।

  2. वे सवर्ण छात्र, शिक्षक, नागरिक, जो सामाजिक न्याय के पक्ष में हैं, SC/ST/OBC के साथ खड़े हैं – उन्हें मित्र बनाना होगा, न कि दूर धकेलना।

सफल आंदोलन वही हैं जो नए साथी पैदा करते हैं, नए दुश्मन नहीं

 सड़कों पर उतरना कमजोरी नहीं, ताकत है – अगर उसे दिशा मिले

दिल्ली विश्वविद्यालय में शुरू हुआ विरोध केवल एक कैंपस की हलचल नहीं है, यह संकेत है कि SC, ST और OBC युवा अब अपने अधिकारों पर किसी भी तरह की चुपचाप कटौती स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

  • हाँ, उन्हें सड़कों पर उतरना चाहिए।

  • हाँ, उन्हें अपने हक के लिए नारे लगाने चाहिए।

  • हाँ, उन्हें अदालत, UGC और सरकार से सवाल पूछने का पूरा हक है।

लेकिन यह लड़ाई गालियों, फोटो पर जूते, झंडे जलाने की नहीं, बल्कि संविधान, डेटा, अनुभव और संगठित प्रतिरोध की होनी चाहिए।

जब SC, ST और OBC छात्र साफ शब्दों में, ऊंची आवाज़ में, लेकिन साफ-सुथरे लोकतांत्रिक तरीकों से कहते हैं – “हम भी इंसान हैं, हमें सम्मान चाहिए, सुरक्षा चाहिए, न्याय चाहिए” – तब समाज को न केवल उन्हें सुनना पड़ता है, बल्कि व्यवस्था को भी खुद को आईने में देखना पड़ता है।

यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत हो सकती है।