क्या ट्रंप वाकई भारत को धमका रहे थे? या फिर ‘टैरिफ जीत’ का नैरेटिव ज़मीनी हकीकत से अलग है?
क्या भारत ने टैरिफ वॉर में अमेरिका और यूरोपीय संघ दोनों को मात दे दी है, या फिर जीत का नैरेटिव हकीकत से आगे निकल गया है? ट्रंप की धमकियों, EU-India FTA और मोदी सरकार की चुप्पी पर उठते सवाल।
क्या ट्रंप वाकई भारत को धमका रहे थे?
या फिर ‘टैरिफ जीत’ का नैरेटिव ज़मीनी हकीकत से अलग है?
अंतरराष्ट्रीय मंच पर इन दिनों एक दिलचस्प कहानी सुनाई जा रही है—कि भारत ने अमेरिका और यूरोपीय संघ, दोनों मोर्चों पर “टैरिफ वॉर” जीत ली है। दावा किया जा रहा है कि एक तरफ यूरोपीय संघ के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) फाइनल हो गया और दूसरी तरफ अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर लगने वाला टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया।
लेकिन सवाल यह है—क्या यह पूरी तस्वीर है, या अधूरी कहानी को जीत का जामा पहनाया जा रहा है?
ट्रंप की धमकी या रणनीतिक बयानबाज़ी?

डोनाल्ड ट्रंप का नाम आते ही आक्रामक बयान याद आते हैं। टैरिफ हो, NATO हो या चीन—ट्रंप पहले धमकी देते हैं, फिर सौदेबाज़ी करते हैं। भारत के मामले में भी यही पैटर्न दिखता है।
लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या 50% टैरिफ वास्तव में लागू हुआ था, या यह सिर्फ बातचीत में दबाव बनाने की रणनीति थी?
अब तक अमेरिकी ट्रेड नोटिफिकेशन या USTR (United States Trade Representative) की किसी आधिकारिक अधिसूचना में भारत पर 50% टैरिफ लागू होने की स्पष्ट पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में “18% पर लाने” का दावा राजनीतिक बयान तो हो सकता है, लेकिन कानूनी-व्यापारिक तथ्य अभी धुंधले हैं।
EU-India FTA: फाइनल या फिर फास्ट-ट्रैक?

यूरोपीय संघ और भारत के बीच FTA की बातचीत 2007 से चल रही है। कई दौर टूटे, कई बार शुरू हुए।
हाल के महीनों में यह जरूर माना जा रहा है कि बातचीत ने रफ्तार पकड़ी है, लेकिन “27 देशों का बाजार भारत की मुट्ठी में” जैसे दावे अभी भी डिप्लोमैटिक ओवरस्टेटमेंट लगते हैं।
EU की अपनी जटिल शर्तें हैं—लेबर लॉ, पर्यावरण मानक, डेटा प्रोटेक्शन और कार्बन टैक्स। इन सब पर अंतिम सहमति के बिना FTA को “फाइनल” कहना जल्दबाज़ी नहीं तो और क्या है?
तो फिर मोदी चुप क्यों हैं?

अगर यह वाकई ऐतिहासिक जीत है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद खुलकर क्यों नहीं बोल रहे?
यह वही मोदी हैं जो छोटे से छोटे कूटनीतिक संकेत को भी वैश्विक उपलब्धि के तौर पर पेश करने में पीछे नहीं रहते।
तो क्या वजह है कि इस पूरे मसले पर सीधा, स्पष्ट और दस्तावेज़ों के साथ बयान नहीं आया?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि—
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अमेरिका के साथ बातचीत अभी भी वर्क-इन-प्रोग्रेस है
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EU के साथ समझौता सैद्धांतिक सहमति के स्तर पर है, न कि कानूनी अंतिम रूप में
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और ट्रंप की बयानबाज़ी को सरकार जानबूझकर नजरअंदाज कर रही है, ताकि रिश्ते और न बिगड़ें
‘साइलेंट डिप्लोमेसी’ या जवाब से बचने की रणनीति?
सरकार इसे “साइलेंट डिप्लोमेसी” कह सकती है, लेकिन आलोचक पूछ रहे हैं—
क्या यह चुप्पी आत्मविश्वास की है, या अनिश्चितता की?
क्या भारत सच में शर्तें तय कर रहा है, या फिर बड़े देशों के दबाव के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है?
अंतिम में यही सवाल है की ये - जीत का दावा या अधूरी सच्चाई?
भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है—इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन जब तक—
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टैरिफ कटौती के आधिकारिक नोटिफिकेशन
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और EU-India FTA का अंतिम दस्तावेज
सार्वजनिक नहीं होता, तब तक “दो मोर्चों पर जीत” का दावा राजनीतिक नैरेटिव ज्यादा और कूटनीतिक तथ्य कम लगता है।
सवाल अब भी कायम है—
क्या ट्रंप भारत को धमका रहे थे, या सिर्फ शोर मचा रहे थे?
और क्या सरकार सवालों से बचने के लिए चुप है, या सच में कोई बड़ा दांव खेला जा रहा है?
सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है—और वही सामने आना अभी बाकी है।
Hindu Solanki 
