आख़िर दिल्ली में क्यों ग़ायब हो रहे हैं लोग? हर दिन दर्जनों लापता, महिलाएं-बच्चे सबसे ज़्यादा प्रभावित
दिल्ली में लापता लोगों की संख्या लगातार चिंता बढ़ा रही है। पुलिस आंकड़ों के मुताबिक राजधानी में हर दिन औसतन 25 से 50 लोग गायब हो रहे हैं, जिनमें सबसे बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है। मानव तस्करी, पलायन, घरेलू विवाद, रोज़गार की तलाश और सुरक्षा में खामियां इसके पीछे बड़े कारण बताए जा रहे हैं। यह रिपोर्ट दिल्ली में बढ़ते मिसिंग मामलों के आंकड़े, संभावित वजहें, पुलिस की कार्रवाई और सिस्टम की चुनौतियों को विस्तार से सामने रखती है।
दिल्ली के “गायब मामले” : हर रोज़ 27–54 लोग लापता, महिलाओं और बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा
नई दिल्ली — राजधानी दिल्ली में लोगों का अचानक गायब होना अब सिर्फ सोशल मीडिया का ट्रेंड नहीं रहा — यह पुलिस डेटा और सख़्त रिपोर्टों में स्पष्ट रूप से दर्ज हो रहा है।
दिल्ली पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक, 2026 के पहले पख़वाड़े में यानी 1–15 जनवरी तक करीब 807 लोग लापता दर्ज हुए, जिसमें लगभग 509 महिलाएं और लड़कियाँ शामिल हैं। यानी औसतन हर दिन लगभग 54 लोग लापता हो रहे हैं।
पहले की रिपोर्टों के हिसाब से भी यह एक पुरानी समस्या है। 2015 से अब तक राजधानी से लगभग 2.5 लाख से अधिक लोग लापता हो चुके हैं, जिनमें 56% से अधिक महिलाएँ हैं, और हजारों मामलों में आज भी किसी का पता नहीं चल पा रहा है।
दिल्ली पुलिस के ज़ोनल Integrated Police Network (ZIPNET) से प्रकाशित डेटा में यह भी पता चला है कि Outer North और अन्य जिलों में गायब व्यक्तियों की संख्या बहुत अधिक है, और उनमेंसे बड़ी संख्या महिलाओं और किशोरियों की है।

किस तरह के लोग गायब हो रहे हैं?
पुलिस और मीडिया रिपोर्टों से सामने आने वाले मुख्य ट्रेंड यह हैं:
महिलाएँ और लड़कियाँ (सबसे अधिक)
आंकड़ों में गायब हुए लोगों में महिलाएँ और लड़कियाँ एक बड़ी संख्या हैं। जनवरी तक लगभग दो-तिहाई लापता लोगों में यह वर्ग शामिल था — यह सुरक्षा से जुड़ी गम्भीर चिंता का विषय है।
बच्चे और किशोर भी शामिल
807 लापता लोगों में से 191 नाबालिग मामले थे। इनमें से बड़े हिस्से का आज भी पता नहीं चल सका है।
वयस्क पुरुष भी लापता हो रहे हैं
वयस्कों में भी कई लोग गायब हैं — इन मामलों का कारण अक्सर घर से दूर जाना, सामाजिक कारण या मानसिक दबाव भी बताया जाता है।
क्या यह सिर्फ़ “डेटा” है या वास्तविक चिंता?
दिल्ली पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि वह कुछ मामलों में लोगों को ट्रेस कर पा रही है। उदाहरण के लिए “Operation Milap” के तहत पुलिस ने कुछ गायब लोगों को उनके परिवारों से मिलाया है।
लेकिन बड़ी संख्या में लोग आज भी अनट्रेस्ड हैं — खासकर महिलाओं और बच्चों के— जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या सिर्फ़ एलिमेंटरी अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक एवं सुरक्षा चुनौतियों का संकेत है।

क्या गायब होने के पीछे कोई बड़े कारण हैं?
विशेषज्ञों और उपलब्ध स्रोतों के आधार पर मुख्य संभावित वजहें यह मानी जा रही हैं:
मानव तस्करी और अपहरण का जोखिम
दिल्ली जैसे बड़े शहर में मानव तस्करी, खासकर महिलाओं और बच्चों के मामलों में, हमेशा से समस्या रही है। डेटा भी यही संकेत देता है कि इस श्रेणी में केस अधिक हैं।
पलायन और रोज़गार के लिए अकेला नगर जाना
कई युवा बेहतर अवसरों की तलाश में अकेले शहर आते हैं, और बाद में फ़िर परिवार से संपर्क टूट जाता है। ऐसी परिस्थितियों को अनिश्चितता और सुरक्षा जोखिम के रूप में देखा जाता है।
घर से अपने निर्णय पर निकल जाना
कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनमें किशोर या महिलाएँ अपने परिवार की अनुमति के बिना शहर में रहने का निर्णय लेती हैं, जो बाद में missing रिपोर्ट बन जाते हैं।
एक उदाहरण में पाँच लड़कियाँ “बेहतर अवसरों” की तलाश में दिल्ली आईं, जिन्हें पुलिस ने 24 घंटे में सुरक्षित उनके परिवारों को सौंप दिया।
समन्वय और डेटा सिस्टम की चुनौतियाँ
ZIPNET जैसे पोर्टल मौजूद हैं, लेकिन केंद्र और राज्य के बीच डेटा साझा करने में चुनौतियाँ हैं, जिससे कई मामलों में सूचना आदान-प्रदान में देरी होती है।
मानसिक स्वास्थ्य, घरेलू विवाद और आत्म निर्णय
कुछ गायब होने के मामलों में कारण मनोरोग, घरेलू समस्याएं या अन्य व्यक्तिगत चुनौतियाँ भी देखी जाती हैं — कुछ मामलों में FIR या पोस्टमार्टम तक नहीं हो पाती।

क्या यह समस्या सिर्फ 2026 की शुरुआत की है?
नहीं। यह समस्या पुरानी है।
2025 में भी दिल्ली में लगभग 24,508 लोग गायब हुए थे, जिनमें महिलाएँ बड़ी संख्या में थीं, और कई मामलों का समाधान अभी भी लंबित है।
एक दशक के डेटा के अनुसार कई लाख लोग लापता हुए हैं, और कुछ हजार आज भी उनके बारे में कोई जानकारी नहीं है।
पुलिस क्या कर रही है?
दिल्ली पुलिस लगातार OPERATION MILAP जैसे अभियानों के तहत खोज और मिलान अभियान चला रही है, जिसमें कुछ missing लोगों को परिवारों से जोड़ा गया है।
सामान्य प्रथाएँ शामिल हैं:
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CCTV फुटेज जांच
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रेलवे/बस स्टैंड पर पूछताछ
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यातायात और बस/टैक्सी जांच
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आस-पास के अस्पताल/स्मॉल होटल रिकॉर्ड चेक
लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि सिस्टम में तकनीकी निवेश, खोज एल्गोरिदम और पब्लिक वैबल डेटा की कमी भी समस्या का एक बड़ा कारण है।
क्या दिल्ली असुरक्षित होने लगी है?
आंकड़े जो लगातार सामने आ रहे हैं, वे साफ संकेत देते हैं कि राजधानी में लापता व्यक्तियों के मामलों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ी है।
महिलाओं, बच्चियों और किशोरियों का अनुपात अधिक होना सुरक्षा में बड़े फासले की तरफ़ इशारा करता है — घर से निकलने, रोजगार खोजने या शहर की भीड़-भाड़ में खो जाने जैसे सामाजिक कारणों के अलावा अपराध या ट्रैफिकिंग का जोखिम भी नहीं नज़रअंदाज़ किया जा सकता।
क्या समाधान है?
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं:
ZIPNET सहित डेटाबेस को सार्वजनिक, realtime और AI-आधारित बनाना
हर missing person पर राष्ट्रीय स्तर पर alert system लागू करना
महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित/संचार केंद्र स्थापित करना
समुदाय-आधारित समर्थन कार्यक्रम और शिक्षा
दिल्ली में लोगों का हर दिन गायब होना अब सिर्फ शहर का ट्रेंडिंग डेटा नहीं है —
यह एक व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक समस्या बन चुका है।
जहाँ कुछ मामलों में पुलिस और परिवार सफलता से मिलान कर रहे हैं, वहीं हज़ारों अभी भी लापता हैं, और यह आंकड़ा सुरक्षा, ट्रैफिकिंग, सामाजिक अनिश्चितता और सिस्टम चुनौतियों का द्योतक है।
Hindu Solanki 
