आप मुझे नहीं रोक सकते…’ विधानसभा में हरिश चौधरी का सख्त संदेश, बाड़मेर-बालोतरा की राजनीति में बढ़ी खाई............

राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस विधायक हरिश चौधरी के बयान ने बाड़मेर-बालोतरा की राजनीति को फिर से गरमा दिया है। जिला पुनर्गठन, बायतू क्षेत्र की राजनीति और के.के. विश्नोई फैक्टर को लेकर सत्ता की मंशा पर सवाल उठे हैं। क्या प्रशासनिक फैसला राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश है—यह बहस अब सड़क से सदन तक पहुंच चुकी है।

आप मुझे नहीं रोक सकते…’ विधानसभा में हरिश चौधरी का सख्त संदेश, बाड़मेर-बालोतरा की राजनीति में बढ़ी खाई............

“आप रोक नहीं सकते…” — विधानसभा में हरिश चौधरी का बयान और बाड़मेर-बालोतरा की बदलती राजनीति की पूरी कहानी

राजस्थान विधानसभा के भीतर  जो कहा गया, वह सिर्फ एक वाक्य नहीं था।
वह एक पूरे क्षेत्र की राजनीतिक पीड़ा, अस्मिता और प्रतिरोध का स्वर था।

कांग्रेस विधायक और पूर्व मंत्री हरिश चौधरी ने जब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की ओर मुखातिब होकर कहा—

“भजनलाल जी… आपने बाड़मेर और बालोतरा को अलग कर दिया,
लेकिन मुझे विधानसभा आने से नहीं रोक सकते।
आप आज मुख्यमंत्री हैं,
पहले भी कई मुख्यमंत्री आए और गए हैं।
जो बायतू की जनता चाहेगी—वही होगा।”

तो सदन के भीतर सन्नाटा नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश गूंज रहा था

यह बयान सिर्फ सत्ता-विपक्ष की नोकझोंक नहीं था।
यह बाड़मेर-बालोतरा क्षेत्र की उस राजनीति का खुला अध्याय है,
जिसे पिछले कुछ प्रशासनिक फैसलों, जातीय गणनाओं और सत्ता संतुलन ने नए सिरे से गढ़ा है।

बाड़मेर-बालोतरा विभाजन: प्रशासनिक फैसला या राजनीतिक इंजीनियरिंग?

बालोतरा को जिला बनाना काग़ज़ों में एक प्रशासनिक निर्णय था,
लेकिन ज़मीन पर इसे हमेशा एक राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा गया।

बाड़मेर राजस्थान का सबसे बड़ा जिला रहा है—
भौगोलिक रूप से भी,
और राजनीतिक रूप से भी।

जब बालोतरा को अलग जिला बनाया गया,
तो सवाल सिर्फ सुविधाओं का नहीं था,
सवाल था—

किसका प्रभाव घटेगा,
और किसका बढ़ेगा?

यहीं से कहानी में प्रवेश होता है
के.के. विश्नोई की राजनीति का।

के.के. विश्नोई फैक्टर: बायतू से बालोतरा तक सत्ता की रेखा

के.के. विश्नोई,
गुड़ामालानी से विधायक,
और विश्नोई समाज में मजबूत पकड़ रखने वाले नेता।

बाड़मेर और बालोतरा के बीच सीमांकन को लेकर हालिया बदलावों ने के.के. विश्नोई को चर्चा के केंद्र में ला दिया 
  • प्रशासनिक फेरबदल: गुड़ामालानी और धोरीमन्ना उपखंडों को बाड़मेर से हटाकर बालोतरा जिले में शामिल किया गया है। विश्नोई ने इसे जनता की सुविधा के लिए किया गया "छोटा प्रशासनिक सुधार" बताया है।
  • बायतू फैक्टर: बायतू विधानसभा क्षेत्र (जहाँ से हरीश चौधरी विधायक हैं) को पुनः बाड़मेर का हिस्सा बनाए रखने और अन्य क्षेत्रों के बालोतरा में विलय पर विश्नोई और कांग्रेस नेताओं के बीच तीखी राजनीतिक नोकझोंक देखी गई है।
  • शक्ति प्रदर्शन: हाल ही में जिलों के नए सीमांकन के बाद विश्नोई ने जोधपुर से बाड़मेर तक एक भव्य रोड शो किया, जिसे बालोतरा क्षेत्र में उनके बढ़ते राजनीतिक वर्चस्व और शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।

वहीँ बायतू, बालोतरा, सिवाना और आस-पास का इलाका
केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं है,
यह राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र है।

बालोतरा जिला बनने के बाद—

  • प्रशासनिक कार्यालय

  • पुलिस, राजस्व, विकास योजनाएँ

  • और सत्ता का दैनिक संपर्क

बाड़मेर से खिसककर बालोतरा चला गया।

इसका सीधा असर पड़ा—

  • बायतू की राजनीति पर

  • और हरिश चौधरी जैसे नेताओं के पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र पर

यही वह बिंदु है,
जहां हरिश चौधरी का बयान सिर्फ भावनात्मक नहीं,
बल्कि रणनीतिक बन जाता है।

हरिश चौधरी बनाम सत्ता का केंद्रीकरण

हरिश चौधरी कोई नए नेता नहीं हैं।
वे ग्रामीण राजनीति, किसान आंदोलनों और संगठनात्मक संघर्ष से निकले नेता हैं।

उनकी राजनीति का आधार रहा है—

  • ज़मीन से जुड़ाव

  • क्षेत्रीय अस्मिता

  • और सत्ता से सीधी टक्कर

जब वे कहते हैं—

“मुझे विधानसभा आने से नहीं रोक सकते”

तो इसका अर्थ केवल व्यक्तिगत नहीं है।
यह एक संकेत है कि—

प्रशासनिक पुनर्गठन के ज़रिये
राजनीतिक आवाज़ों को सीमित करने की कोशिशें
अब खुलकर सामने आ रही हैं।

बायतू-बालोतरा-बाड़मेर: एक क्षेत्र, तीन सत्ता केंद्र

आज पश्चिमी राजस्थान की राजनीति तीन ध्रुवों में बंटी दिखाई देती है—

बालोतरा के जिला बनने से
बायतू का प्रशासनिक झुकाव बदल गया।

और यही वह बिंदु है
जहां राजनीति “विकास” से हटकर
प्रभाव और नियंत्रण की लड़ाई बन जाती है।

क्या यह जनता को बाँटने की राजनीति है?

हरिश चौधरी का सवाल यही है—

अगर जिलों का पुनर्गठन
जनता की सुविधा के लिए है,
तो—

  • निर्णय में जनता की भागीदारी क्यों नहीं?

  • स्थानीय प्रतिनिधियों की सहमति क्यों नहीं?

  • और असहमति को “विरोध” क्यों माना जा रहा है?

जब वे कहते हैं—

“जो बायतू की जनता चाहेगी, वही होगा”

तो यह सीधा संकेत है कि
जनता और सत्ता के बीच दूरी बढ़ रही है।

भजनलाल शर्मा सरकार की चुप्पी और दिल्ली फैक्टर

इस पूरे विवाद में
राज्य सरकार की ओर से
कोई स्पष्ट राजनीतिक संवाद नहीं दिखता।

बल्कि यह धारणा गहराती जा रही है कि—

  • फैसले जयपुर से कम

  • और दिल्ली से ज़्यादा तय हो रहे हैं

यही कारण है कि
विपक्ष बार-बार यह सवाल उठा रहा है—

क्या राजस्थान के क्षेत्रीय निर्णय
राज्य की ज़रूरतों से तय हो रहे हैं
या केंद्रीय राजनीतिक संतुलन से?

“CM आते-जाते रहते हैं”— यह सिर्फ तंज नहीं

हरिश चौधरी का यह वाक्य—

“आप आज मुख्यमंत्री हैं, पहले भी कई आए और गए”

राजस्थान की राजनीतिक स्मृति को छूता है।

यह याद दिलाता है कि—

  • सत्ता स्थायी नहीं होती

  • लेकिन क्षेत्रीय अस्मिता स्थायी होती है

और जब सत्ता
क्षेत्रीय भावनाओं को नज़रअंदाज़ करती है,
तो इतिहास गवाह है—
राजनीति करवट लेती है।

 बाड़मेर-बालोतरा की राजनीति का भविष्य

आने वाले समय में—

  • बायतू और बालोतरा का समीकरण

  • के.के. विश्नोई की राजनीतिक दिशा

  • और हरिश चौधरी जैसे नेताओं का जनाधार

राजस्थान की पश्चिमी राजनीति को नई दिशा देगा।

यह लड़ाई
सिर्फ विधानसभा की नहीं है।

यह लड़ाई है—

  • क्षेत्र बनाम सत्ता

  • जनता बनाम प्रशासनिक फैसले

  • और ज़मीन की राजनीति बनाम फ़ाइलों की राजनीति

हरिश चौधरी का विधानसभा बयान
एक चेतावनी है।

यह सत्ता को याद दिलाता है कि—

राजनीति नक्शों से नहीं,
जनता की इच्छा से चलती है।

और अगर बाड़मेर-बालोतरा की राजनीति को
सिर्फ प्रशासनिक निर्णय मानकर
नज़रअंदाज़ किया गया,

तो यह मुद्दा
आने वाले चुनावों में
सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन सकता है।