जनता के पैसों से चलता है संसद का हंगामा! एक दिन में 9 करोड़ खर्च, काम शून्य- राहुल गांधी को नहीं बोलने दिया गया, आज प्रधानमंत्री मोदी का भाषण रुका.........

संसद का हर दिन जनता के करोड़ों रुपये खर्च करता है, लेकिन जब कार्यवाही हंगामे में ठप हो जाए तो सवाल उठना लाज़मी है। जानिए संसद चलाने का असली खर्च, कामकाज में रुकावट और लोकतंत्र पर इसका असर।

जनता के पैसों से चलता है संसद का हंगामा! एक दिन में 9 करोड़ खर्च, काम शून्य- राहुल गांधी को नहीं बोलने दिया गया, आज प्रधानमंत्री मोदी का भाषण रुका.........
संसद में मोदी

संसद में हंगामा, भाषण ठप और सवालों के घेरे में लोकतंत्र

 राहुल गांधी को नहीं बोलने दिया गया, आज प्रधानमंत्री मोदी का भाषण रुका—तो संसद आखिर चल किसके लिए रही है?

नई दिल्ली।
लोकसभा एक बार फिर हंगामे का अखाड़ा बन गई। सत्ता पक्ष और विपक्ष के तीखे टकराव के बीच संसद का वह दृश्य सामने आया, जिसने देश की लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजेपी का दावा है कि विपक्ष की महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी को घेर लिया, जिसके चलते वे सदन में अपना भाषण नहीं दे पाए।

बीजेपी ने इस घटना को संसदीय मर्यादा का उल्लंघन बताते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का कहना है कि यह केवल विरोध नहीं, बल्कि संसद को ठप करने की साजिश है। वहीं विपक्ष इसे सरकार द्वारा लगातार आवाज़ दबाने के जवाब में उठाया गया विरोध बता रहा है।

विरोध की राजनीति या बदले की राजनीति?

दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले तक यही आरोप विपक्ष लगा रहा था—कि राहुल गांधी को सदन में बोलने नहीं दिया गया, उनकी बात बीच में रोकी गई और उनके माइक बंद किए गए। उस वक्त सत्ता पक्ष चुप था या इसे “नियमों के तहत कार्रवाई” बता रहा था।

आज तस्वीर उलट है। प्रधानमंत्री मोदी बोलने खड़े हुए, लेकिन हंगामे के कारण उनका भाषण नहीं हो सका। ऐसे में सवाल यह उठता है—
क्या संसद अब मुद्दों पर चर्चा का मंच नहीं, बल्कि बदले की राजनीति का मैदान बन चुकी है?

जनता के पैसों से चलने वाला सदन, लेकिन काम ठप

लोकसभा और राज्यसभा की हर मिनट की कार्यवाही पर जनता का पैसा खर्च होता है। संसद के स्थगन से हर दिन करोड़ों रुपये का नुकसान होता है। इसके बावजूद लगातार हंगामा, नारेबाजी और वेल में पहुंचकर प्रदर्शन आम होता जा रहा है।

सवाल सीधा है—
क्या सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर जनता के टैक्स के पैसों को बर्बाद कर रहे हैं?

देश में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे गंभीर मुद्दे मौजूद हैं, लेकिन संसद में चर्चा इन पर कम और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर ज्यादा हो रही है।

संसद का कामकाज लोकतंत्र का मूल आधार है, लेकिन जब सदन में बहस नहीं चलती, चर्चाएँ रुक जाती हैं और हंगामा चलता रहता है, तो इसके व्यापारिक और आर्थिक परिणाम भी होते हैं — वह भी सीधे टैक्सपेयर यानी जनता के पैसों पर।

सरकार के पुराने आँकड़ों के अनुसार वर्तमान संसदीय खर्च परंपरागत रूप से विकसित हुआ है कि
संसद एक मिनट में लगभग ₹2.5 लाख के करीब खर्च होता है।

इस आंकड़े में सिर्फ सांसदों का वेतन ही शामिल नहीं है, बल्कि
 सांसदों और स्टाफ का वेतन-सम्मान
 संसद भवन का रखरखाव
 सुरक्षा और प्रशासनिक खर्च
 बिजली-पानी जैसी आधारभूत सुविधाएँ
 तकनीकी संसाधन और भोजन
 कर्मियों की भत्ते और यात्रा खर्च
जैसी तमाम चीज़ें शामिल मानी जाती हैं।

 जैसा खर्च, वैसा काम नहीं — कितना महंगा पड़ता है?

अगर हम सत्र के औसत छह घंटों (लगभग 360 मिनट) के हिसाब से देखें, तो इसका मतलब हुआ —
360 मिनट × ₹2,50,000 = लगभग ₹9 करोड़
यानि एक ही दिन की संसद कार्यवाही पर लगभग 9 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं।

यह एक कंज़र्वेटिव अनुमान है — क्योंकि
 यह पुराना दर है (2012-13 के डेटा पर आधारित),
 आज महंगाई और प्रशासनिक खर्च इस दर को और ऊपर कर सकता है।

 जब कार्यवाही रुकती है तो क्या होता है?

दरअसल, सिर्फ खर्च होना ही नहीं बल्कि लापता कार्य घंटों का नुकसान भी एक बड़ा मुद्दा बनता है।

पुरानी रिपोर्ट्स के अनुसार, सिर्फ एक मानसून सत्र के दौरान —
राज्यसभा ने 816 मिनट के काम को गंवाया
लोकसभा ने 1026 मिनट कमजोर कार्य किया
जिसका टैक्सपेयर को नुकसान ₹23 करोड़ से अधिक के करीब बताया गया था।

यह केवल तीन दिनों की स्थिति में ही हुआ — अगर यह लंबा सत्र होता, तो राष्ट्रीय खज़ाने पर प्रभाव और गंभीर होता।

 जनता के पैसों का सीधा नुकसान

जब संसद में हंगामा, स्थगन या बार-बार बहस रुक जाती है, तो इसका मतलब होता है कि

सांसदों को वेतन, भत्ते और सुविधाएँ जारी रहती हैं
सुरक्षा, तकनीकी स्टाफ और संसदीय खर्च चलते रहते हैं
लेकिन कामकाजी घंटे घटते हैं
विधान निर्माण, नीति समीक्षा और जवाबदेही बाधित होती है

और फिर भी खर्च कम नहीं होता।

 क्या संसद का काम ‘महत्वपूर्ण’ कार्यों पर होना चाहिए?

संसद का काम सिर्फ हंगामा करना नहीं है —
सांसदों के सवालों का जवाब लेना
 कानून पास करना
 देश की अर्थव्यवस्था-निति पर बहस करना
 बजट, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा

ये सब लोकतंत्र के मूल काम हैं। लेकिन मुश्किल तब होती है, जब कार्यवाही रुकती है और संसद केवल बहसों के विवादों में उलझ जाती है — जबकि उसके खर्च में कोई कमी नहीं आती

महिला सांसदों का विरोध: संदेश क्या है?

बीजेपी का आरोप है कि विपक्ष की महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री की कुर्सी को घेर लिया। विपक्ष का तर्क है कि जब बार-बार उनकी आवाज़ दबाई जाती है, तो विरोध का यही रास्ता बचता है।

यह दृश्य प्रतीकात्मक जरूर है, लेकिन यह भी दिखाता है कि संसद में संवाद की जगह टकराव ने ले ली है। लोकतंत्र संवाद से चलता है, घेराव और अवरोध से नहीं।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा नुकसान किसका?

इस पूरे घटनाक्रम में जीत किसी की नहीं हो रही।
न सत्ता पक्ष की, न विपक्ष की।
हार सिर्फ लोकतंत्र की हो रही है—और उसके साथ उस आम नागरिक की, जिसने अपने प्रतिनिधियों को सदन में भेजा है ताकि वे उसकी बात रखें, न कि एक-दूसरे को बोलने से रोकें।

आज सवाल राहुल गांधी को बोलने न देने का था, आज सवाल प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का है। कल किसी और का होगा। लेकिन अगर यह सिलसिला चलता रहा, तो संसद केवल हंगामे की इमारत बनकर रह जाएगी।

 संसद चलेगी या राजनीति?

देश यह जानना चाहता है कि संसद कब चलेगी।
बहस कब होगी।
सवाल कब पूछे जाएंगे।
और जवाब कब मिलेंगे।

अगर सत्ता और विपक्ष दोनों ही अपनी-अपनी राजनीति में उलझे रहेंगे, तो लोकतंत्र का मंच जनता की नजरों में अपनी विश्वसनीयता खो देगा।

संसद किसी एक पार्टी की नहीं, पूरे देश की है।
और अगर वहां बोलने का हक ही छीना जाता रहा, तो सवाल सिर्फ भाषण का नहीं रहेगा—सवाल लोकतंत्र के भविष्य का होगा।