अफगानिस्तान: नया नियम, बंटा हुआ समाज और खत्म होती बराबरी , दुनिया चिंता में ?

अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा लागू किए गए नए Criminal Procedure Code ने न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नए कानून में जहां गरीब और आम नागरिकों के लिए सख्त सज़ाओं का प्रावधान किया गया है, वहीं Ulama और तालिबान से जुड़े धार्मिक वर्ग को कानूनी संरक्षण मिलता दिखाई दे रहा है। यह कोड कानून के सामने समानता के सिद्धांत को कमजोर करता है और अफगान समाज में वर्ग आधारित न्याय प्रणाली को बढ़ावा देता है।

अफगानिस्तान: नया नियम, बंटा हुआ समाज और खत्म होती बराबरी , दुनिया चिंता में ?

अफगानिस्तान: नया नियम, बंटा हुआ समाज और खत्म होती बराबरी

एक देश, चार दर्जे — और इंसान की कीमत पहचान से तय

अफगानिस्तान में तालिबान शासन के नए नियमों ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि पूरे समाज को नए सिरे से वर्गों, पहचान और हैसियत के आधार पर बाँटने की प्रक्रिया है।
इन नियमों के बाद अफगान समाज अब बराबरी के नागरिकों का समूह नहीं रहा, बल्कि चार अलग-अलग हिस्सों में बँट चुका है—जहाँ अधिकार, आज़ादी और इंसानी गरिमा हर वर्ग के लिए अलग तय है।

 पहला भाग: तालिबान और धार्मिक सत्ता का वर्ग

इस वर्ग में तालिबान के शीर्ष नेता, धार्मिक मौलवी और सत्ता से जुड़े लोग आते हैं।
इनके लिए कानून सख़्त नहीं, लचीला और सुविधाजनक है।

  • हथियार रखने और फैसले लेने की खुली छूट

  • कानून से लगभग ऊपर की स्थिति

  • आलोचना करने वालों को “इस्लाम विरोधी” घोषित करने की ताकत

  • सज़ा देने वाला भी वही, जज भी वही

यही वर्ग तय करता है कि कौन बोलेगा, कौन चुप रहेगा और किसे मिटा दिया जाएगा।

दूसरा भाग: आम पुरुष नागरिक

यह वर्ग देखने में सुरक्षित लगता है, लेकिन हकीकत में यह भी आधी आज़ादी वाला नागरिक वर्ग है।

  • नौकरी और शिक्षा पर धार्मिक निगरानी

  • सोशल मीडिया, लेखन और विचारों पर पाबंदी

  • विरोध करने पर जेल, कोड़े या जबरन गुमशुदगी

यह आज़ाद है—लेकिन सिर्फ़ तब तक, जब तक वह सत्ता से सवाल नहीं करता।

 तीसरा भाग: महिलाएँ — सबसे बड़ा लेकिन सबसे दबा हुआ वर्ग

नए नियमों के बाद महिलाएँ अफगान समाज का सबसे नियंत्रित और सबसे मौन वर्ग बना दी गई हैं।

  • उच्च शिक्षा लगभग समाप्त

  • नौकरी और सार्वजनिक जीवन से बाहर

  • बिना पुरुष संरक्षक के बाहर निकलना अपराध

  • कपड़े, आवाज़, चेहरा और मौजूदगी तक पर नियंत्रण

महिलाएँ अब नागरिक नहीं, बल्कि “नियंत्रित जिम्मेदारी” बना दी गई हैं।

 चौथा भाग: अल्पसंख्यक, आधुनिक सोच और असहमत आवाज़ें

यह सबसे असुरक्षित वर्ग है।

  • धार्मिक अल्पसंख्यक

  • पत्रकार, लेखक, कलाकार

  • मानवाधिकार कार्यकर्ता

  • आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा से जुड़े लोग

इनके लिए कानून साफ़ नहीं—सज़ा पहले से तय है
या तो देश छोड़ो, या चुप रहो—या मिट जाओ।

 नया नियम असल में क्या बदलता है?

तालिबान का नया सिस्टम नागरिक अधिकारों पर आधारित नहीं है, बल्कि—

धार्मिक पहचान
 लिंग
 विचारधारा

पर आधारित है।

मतलब:

  • सब बराबर नहीं

  • सबके लिए कानून एक नहीं

  • सबकी आवाज़ की कीमत अलग

भारत के लिए चेतावनी: क्यों ज़रूरी है यह सवाल?

यहीं से यह कहानी सिर्फ़ अफगानिस्तान की नहीं रहती।

भारत में भी कुछ समूह खुलेआम हिंदू राष्ट्र की माँग करते हैं।
यह सवाल जरूरी है—

 अगर भारत हिंदू राष्ट्र बना, तो कानून किस धर्म से बनेगा?
 क्या सभी नागरिक बराबर रहेंगे?
या फिर इतिहास की वही मनुस्मृति आधारित व्यवस्था लौटेगी?

जहाँ:

  • स्त्रियों के अधिकार सीमित होंगे

  • जाति जन्म से तय करेगी हैसियत

  • असहमति को “राष्ट्र विरोध” कहा जाएगा

  • धर्म सत्ता का औज़ार बन जाएगा

अफगानिस्तान बताता है कि
जब धर्म और सत्ता एक हो जाते हैं,
तो कानून नहीं चलता—डर चलता है।

दुनिया क्यों चिंतित है?

क्योंकि अफगानिस्तान आज सिर्फ़ एक देश नहीं है,
बल्कि एक चेतावनी है—

 कि जब लोकतंत्र की जगह धार्मिक वर्चस्व ले ले,
 जब कानून की जगह पहचान तय करे,
 और जब सवाल पूछना अपराध बन जाए—

तो समाज चार हिस्सों में टूट जाता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखा विरोध

दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों और पूर्व अफगान अधिकारियों ने इस कानून को मानवता के खिलाफ अपराध बताया है. संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत रिचर्ड बेनेट ने इसे ‘गहरा चिंताजनक’ बताया है और इसकी समीक्षा शुरू कर दी है. पूर्व अटार्नी जनरल मोहम्मद फरीद हमीदी का कहना है कि यह दस्तावेज सभी नागरिकों को अपराधी करार देने और उनकी गरिमा को चोट पहुंचाने जैसा है. दिसंबर 2025 में एक सार्वजनिक फांसी के बाद अब इस कानून का आना यह संकेत देता है कि तालिबान अपनी क्रूर नीतियों को कानूनी जामा पहनाकर डर का शासन और मजबूत करना चाहता है 

अफगानिस्तान का नया नियम सिर्फ़ एक कानून नहीं,
यह एक सोच है—

जहाँ इंसान की पहचान तय करती है
कि उसे जीने का कितना हक़ मिलेगा।

और जब समाज को धर्म, जाति, लिंग और विचारधारा में बाँटा जाए,
तो सबसे पहला शिकार बराबरी,
और आख़िरी शिकार इंसानियत होती है।