‘धुरंधर 2’ ट्रेलर पर बहस: क्या बॉलीवुड के पास अब भी भारत-पाक और मारधाड़ के सिवा कोई नई कहानी नहीं?

‘धुरंधर 2’ के ट्रेलर ने रिलीज़ होते ही दर्शकों को दो हिस्सों में बांट दिया है। एक तरफ देशभक्ति और एक्शन के समर्थक हैं, तो दूसरी तरफ सवाल उठ रहे हैं कि क्या बॉलीवुड अब भी भारत-पाकिस्तान और युद्ध आधारित नैरेटिव से आगे नहीं बढ़ पाया है। सोशल मीडिया पर निर्देशक आदित्य धर की फिल्ममेकिंग सोच और सुरक्षित कमाई वाले सिनेमा पर तीखी बहस छिड़ गई है।

‘धुरंधर 2’ ट्रेलर पर बहस: क्या बॉलीवुड के पास अब भी भारत-पाक और मारधाड़ के सिवा कोई नई कहानी नहीं?

‘धुरंधर 2’ ट्रेलर पर बंटा दर्शकों का नज़रिया

क्या बॉलीवुड के पास अब भी वही पुराने युद्ध और राष्ट्रवाद के ही फॉर्मूले बचे हैं?

‘धुरंधर 2’ का ट्रेलर रिलीज़ होते ही सोशल मीडिया से लेकर फिल्मी गलियारों तक बहस तेज़ हो गई है। एक वर्ग जहां इसे “दमदार एक्शन” और “देशभक्ति से भरपूर” बता रहा है, वहीं बड़ी संख्या में दर्शक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या बॉलीवुड की रचनात्मक सोच अब भी भारत-पाकिस्तान, आतंकवाद और मार-धाड़ से आगे नहीं बढ़ पाई है?

ट्रेलर में तेज़ कट्स, भारी बैकग्राउंड म्यूज़िक, सीमा पार दुश्मन और राष्ट्रवाद से भरे संवाद—सब कुछ वही है, जो बीते एक दशक में बार-बार दोहराया जाता रहा है। दर्शकों का कहना है कि यह सिनेमा नहीं, बल्कि पहले से तय एक नैरेटिव का विस्तार ज्यादा लगता है।

सोशल मीडिया पर उठ रहे तीखे सवाल

ट्विटर (X), इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर कई यूज़र्स ने लिखा है कि जब हॉलीवुड स्पेस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइंस-फिक्शन और मानव भविष्य जैसे विषयों पर प्रयोग कर रहा है, तब बॉलीवुड अब भी सीमित राजनीतिक और सैन्य विषयों में उलझा हुआ क्यों है?

एक यूज़र ने लिखा—
“हर बार दुश्मन वही, कहानी वही, और हीरो वही। क्या यही सिनेमा की सीमा है?”

‘नैरेटिव सिनेमा’ या सिर्फ सुरक्षित कमाई का रास्ता?

फिल्म के निर्देशक आदित्य धर पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आलोचकों का आरोप है कि कुछ फिल्ममेकर अब सामाजिक-राजनीतिक नैरेटिव को सिनेमा के ज़रिये परोसने को ही सबसे सुरक्षित और मुनाफ़े वाला रास्ता मान चुके हैं।
उनका तर्क है कि जब भावनाएं भड़काने वाला कंटेंट बिकता है, तो जोखिम उठाने की ज़रूरत ही क्या है?

हालांकि, फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कुछ लोग इस आलोचना को “जरूरत से ज्यादा राजनीतिक” बताते हैं। उनका कहना है कि दर्शक जो देखना चाहता है, वही बनाया जा रहा है।

असली सवाल: दर्शक बदल चुका है, क्या सिनेमा भी बदलेगा?

फिल्म समीक्षकों का मानना है कि समस्या केवल ‘धुरंधर 2’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे हिंदी सिनेमा की रचनात्मक दिशा पर सवाल है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के दौर में दर्शक अब वैश्विक कंटेंट देख रहा है—जहां कहानी, कल्पना और तकनीक नई ऊंचाइयों पर हैं।

ऐसे में बार-बार वही राष्ट्रवाद बनाम दुश्मन वाला फॉर्मूला कब तक दर्शकों को बांधे रख पाएगा?

‘धुरंधर 2’ का ट्रेलर चाहे बॉक्स ऑफिस पर उत्सुकता पैदा करे या नहीं, लेकिन इसने एक जरूरी बहस जरूर छेड़ दी है—
क्या बॉलीवुड सच में कहानी कह रहा है, या सिर्फ सुरक्षित नैरेटिव बेच रहा है?

अब फैसला दर्शकों के हाथ में है।
तालियां या सवाल—कौन सा जवाब ज्यादा तेज़ होगा?