भारतीय न्यायपालिका में SC/ST/OBC का प्रतिनिधित्व: कड़वी सच्चाई

भारतीय न्यायपालिका में SC, ST और OBC वर्गों का प्रतिनिधित्व अब भी बेहद सीमित है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक सामाजिक समावेशन की स्थिति क्या है, आंकड़ों और तथ्यों के साथ जानिए इस रिपोर्ट में।

भारतीय न्यायपालिका में SC/ST/OBC का प्रतिनिधित्व: कड़वी सच्चाई

भारतीय न्यायपालिका में SC/ST/OBC का प्रतिनिधित्व: कड़वी सच्चाई

सुप्रीम कोर्ट में SC/ST/OBC का प्रतिनिधित्व (2023-2026)

वर्तमान स्थिति (2025 के अंत तक)

सुप्रीम कोर्ट में कुल 33 जजों में से:

  • ब्राह्मण समुदाय: कम से कम 12 जज (36.4%)

  • अन्य सवर्ण समुदाय (बनिया, बंगाली कायस्थ, राजपूत): लगभग 8 जज

  • कुल सवर्ण हिंदू: 60% से अधिक

SC/ST/OBC का प्रतिनिधित्व:

  • SC (दलित) जज: केवल 1 जज (जस्टिस बी.आर. गवई के रिटायरमेंट के बाद)

  • ST (आदिवासी) जज: 0 (शून्य)

  • OBC जज: लगभग 5 जज

  • कुल SC/ST/OBC: केवल 12.1%

जनसंख्या बनाम प्रतिनिधित्व का भयानक अंतर

समुदाय भारत में जनसंख्या सुप्रीम कोर्ट में प्रतिनिधित्व अंतर
ब्राह्मण 5% 36.4% +31.4%
SC (दलित) 16.6% (2011) 3% (1 जज) -13.6%
ST (आदिवासी) 8.6% (2011) 0% -8.6%
OBC 44% (लगभग) 15% (5 जज) -29%
SC+OBC+ST 60.53% 12.1% -48.4%

 कॉलेजियम सिस्टम: प्रतिनिधित्व की असफलता

2018-2023: हाई कोर्ट नियुक्तियों में भेदभाव

5 साल में हाई कोर्ट में नियुक्तियां:

  • कुल नियुक्तियां: सैकड़ों

  • SC/ST/OBC से: केवल 17%

  • सवर्ण समुदाय से: 83%

सुप्रीम कोर्ट: ST प्रतिनिधित्व का इतिहास

1950-2026 (76 साल) में:

  • कुल ST जज: केवल 1 (जस्टिस एच.के. सेमा, 2002-2008

  • वर्तमान में: 0 (शून्य)

यह इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि ST समुदाय भारत की 8.6% आबादी है ।

SC (दलित) प्रतिनिधित्व का पतन

1980-2010: हमेशा कम से कम 1 दलित जज थे

2010 के बाद: नियुक्तियां नगण्य

2019-2026: केवल 2 नियुक्तियां

  • जस्टिस बी.आर. गवई

  • जस्टिस सी.टी. रविकुमार

2025 के अंत: जस्टिस गवई के रिटायरमेंट के बाद केवल 1 दलित जज बचे ।

 SC/ST/OBC के खिलाफ प्रमुख फैसले

अब आपके मुख्य सवाल का जवाब: किन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST/OBC के अधिकारों को कमजोर किया?

1. इंदिरा साहनी केस (1992): क्रीमी लेयर का जहर

मामला: इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (मंडल आयोग केस)

बेंच: 9 जजों की संवैधानिक पीठ

फैसला: 16 नवंबर 1992

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने OBC के लिए 27% आरक्षण को बरकरार रखा

  • लेकिन "क्रीमी लेयर" (Creamy Layer) की अवधारणा लागू की

SC/ST/OBC के खिलाफ कैसे?

क्रीमी लेयर का मतलब:

  • यदि OBC परिवार की आय एक निश्चित सीमा से अधिक है

  • या सरकारी नौकरी में उच्च पद पर है

  • तो उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा

समस्या:

  • यह ऐतिहासिक भेदभाव को नजरअंदाज करता है

  • आर्थिक स्थिति ≠ सामाजिक स्वीकृति

  • एक अमीर OBC को भी जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है

बेंच की संरचना:

  • अधिकांश सवर्ण जज

  • कोई ST जज नहीं

  • बहुत कम SC/OBC जज

2. जरनैल सिंह केस (2018): SC/ST में भी क्रीमी लेयर?

मामला: जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता

फैसला: 2018

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति (Promotion) में SC/ST आरक्षण पर सवाल उठाए

  • कोर्ट ने कहा: क्रीमी लेयर सिद्धांत SC/ST पर भी लागू हो सकता है

विवाद:

  • यह संविधान के अनुच्छेद 16(4A) के खिलाफ था

  • SC/ST के संवैधानिक अधिकार पर हमला माना गया

3. E.V. चिन्नैया केस (2023): SC में वर्गीकरण पर रोक

मामला: E.V. Chinnaiah बनाम आंध्र प्रदेश राज्य

फैसला: 2023

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने SC के भीतर उप-वर्गीकरण को असंवैधानिक घोषित किया

  • यानी, SC समुदाय को आगे विभाजित नहीं किया जा सकता

SC/ST के खिलाफ कैसे?

  • कुछ SC उप-जातियां दूसरों से अधिक पिछड़ी हैं

  • उन्हें अतिरिक्त संरक्षण की जरूरत थी

  • लेकिन कोर्ट ने मना कर दिया

4. पंजाब राज्य बनाम डाविंदर सिंह (2020): पदोन्नति में आरक्षण पर हमला

मामला: पंजाब राज्य बनाम डाविंदर सिंह

फैसला: 2020

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण के लिए:

    • सरकार को "quantifiable data" (मापने योग्य आंकड़े) देने होंगे

    • यह साबित करना होगा कि SC/ST का "inadequate representation" (अपर्याप्त प्रतिनिधित्व) है

SC/ST के खिलाफ कैसे?

  • यह बोझ SC/ST पर डालता है

  • आरक्षण को संवैधानिक अधिकार से "अनुमति" बना देता है

  • कई राज्यों ने पदोन्नति में आरक्षण रोक दिया

5. नगराज केस (2006): आरक्षण पर शर्तें

मामला: एम. नगराज बनाम भारत संघ

फैसला: 2006

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति में SC/ST आरक्षण के लिए:

    • "Backwardness" (पिछड़ापन) साबित करना होगा

    • "Inadequate representation" साबित करना होगा

    • "Efficiency" (दक्षता) पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए

SC/ST के खिलाफ कैसे?

  • SC/ST का पिछड़ापन ऐतिहासिक तथ्य है, बार-बार साबित करने की जरूरत क्यों?

  • यह आरक्षण को अस्थायी बना देता है

6. सुब्रमण्यम स्वामी केस (2020): SC/ST Act को कमजोर करना

मामला: डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ

फैसला: 2020

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 में संशोधन की अनुमति दी

  • कोर्ट ने कहा: तत्काल गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए

  • Preliminary inquiry (प्रारंभिक जांच) जरूरी

SC/ST के खिलाफ कैसे?

  • इससे अत्याचार के मामलों में देरी होती है

  • अपराधियों को बचने का मौका मिलता है

  • SC/ST को न्याय मिलना कठिन हो जाता है

संसद की प्रतिक्रिया:

  • संसद ने 2018 में संशोधन पारित किया

  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा

  • तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान बहाल किया

7. स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम G. किरण (2026): आरक्षण में रिलैक्सेशन का मुद्दा

मामला: Union of India बनाम G. Kiran & Ors

फैसला: 6 जनवरी 2026

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

    • यदि SC/ST/OBC उम्मीदवार ने किसी भी स्तर पर रिलैक्सेशन (छूट) ली है

    • तो उन्हें General Category में नहीं गिना जाएगा

SC/ST/OBC के खिलाफ कैसे?

  • यह मेरिट को संकीर्ण रूप से परिभाषित करता है

  • आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को दोहरी मार:

    • या तो आरक्षण लो और General में शामिल न हो

    • या आरक्षण छोड़ो (जो असंभव है)

8. राजस्थान राज्य बनाम राजत यादव (2025): मेरिटोक्रेसी का मिथक

मामला: Rajasthan High Court बनाम Rajat Yadav

फैसला: 19 दिसंबर 2025

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

    • SC/ST/OBC उम्मीदवार जो General cut-off से अधिक अंक लाते हैं

    • उन्हें General Category में गिना जाना चाहिए

    • बिना किसी रिलैक्सेशन के

विवाद:

पक्ष में तर्क:

  • यह "मेरिट" को बढ़ावा देता है

  • SC/ST/OBC को General में भी मौका मिलता है

विपक्ष में तर्क:

  • यह आरक्षण के कोटे को खाली कर देता है

  • SC/ST/OBC सीटें कम हो जाती हैं

  • सामाजिक न्याय का उद्देश्य विफल होता है

9. 2026 UGC Equity Regulations पर रोक (28-29 जनवरी 2026)

मामला: विनीत जिंदल व अन्य बनाम UGC

फैसला: 28-29 जनवरी 2026

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने UGC Equity Regulations 2026 पर रोक लगा दी

  • ये नियम रोहित वेमुला और पायल तड़वी की आत्महत्याओं के बाद बनाए गए थे

  • नियम शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए थे

SC/ST/OBC के खिलाफ कैसे?

  • रोहित वेमुला (SC) और पायल तड़वी (ST) की दर्दनाक मौतों के बावजूद

  • सुप्रीम कोर्ट ने नियमों को "अस्पष्ट और दुरुपयोग योग्य" कहा

  • 2012 के कमजोर नियम फिर से लागू कर दिए

CJI की टिप्पणी:

"क्या हम जातिविहीन समाज से पीछे जा रहे हैं?"

लेकिन:

  • जातिगत भेदभाव अभी भी व्याप्त है

  • रोहित वेमुला और पायल तड़वी भुला दिए गए?

10. 2024 सब-क्लासिफिकेशन केस: SC/ST में भी क्रीमी लेयर

मामला: सब-क्लासिफिकेशन केस (7-जज बेंच)

फैसला: 1 अगस्त 2024

क्या हुआ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दी

  • जस्टिस बी.आर. गवई (एकमात्र दलित जज) ने कहा:

    • SC/ST में भी "क्रीमी लेयर" लागू हो सकता है

    • हालांकि OBC से अलग मानदंड होने चाहिए

SC/ST के खिलाफ कैसे?

संविधान की मूल मंशा:

  • SC/ST आरक्षण सामाजिक भेदभाव के लिए है, आर्थिक नहीं

  • क्रीमी लेयर आर्थिक मानदंड है

खतरा:

  • आज उप-वर्गीकरण

  • कल पूर्ण क्रीमी लेयर

  • परसों आरक्षण की समाप्ति?

 SC/ST/OBC के पक्ष में फैसले (तुलना के लिए)

1. इंदिरा साहनी (1992): OBC आरक्षण को बरकरार रखा

  • 27% OBC आरक्षण को संवैधानिक माना

  • हालांकि क्रीमी लेयर का जहर मिला दिया

2. 2018 SC/ST Act संशोधन को बरकरार रखा (2020)

  • संसद के 2018 संशोधन को वैध माना

  • तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान बहाल

3. 103वें संविधान संशोधन (EWS आरक्षण) को बरकरार रखा (2022)

  • 10% EWS आरक्षण को वैध माना

  • लेकिन यह SC/ST/OBC के हिस्से से नहीं काटा गया

 हाई कोर्ट में भी कम प्रतिनिधित्व

2025 की रिपोर्ट (सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी)

कुल 221 हाई कोर्ट जजों में से:

  • SC (दलित): केवल 15 जज (6.8%)

  • ST (आदिवासी): डेटा नहीं (बहुत कम)

  • OBC: 32 जज (14.5%)

  • General Category: 90 जज (40.7%)

महिला प्रतिनिधित्व:

  • कुल 28 महिला जज (12.7%)

  • SC महिला: केवल 1 (आंध्र प्रदेश HC)

  • ST महिला: केवल 2 (मणिपुर और गुवाहाटी HC

 राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की 2013 रिपोर्ट

National Commission for Scheduled Castes (NCSC) ने 2013 में कहा था:

"उच्च न्यायपालिका सदियों से समाज के उन्हीं वर्गों से आती रही है जो सबसे अधिक 'age-old social prejudices' (पुरानी सामाजिक पूर्वाग्रहों) से संक्रमित हैं।"

रिपोर्ट ने चेतावनी दी:

  • जजों का अंतर्निहित जातिगत पूर्वाग्रह उनके फैसलों को प्रभावित कर सकता है

  • "सामाजिक संघर्ष" के माहौल में, यदि जज अपने समुदाय की भावनाओं को साझा करते हैं, तो न्याय प्रभावित होगा

 रोहित वेमुला और पायल तड़वी: भुला दिए गए शहीद?

रोहित वेमुला (2016)

  • जाति: SC (दलित)

  • संस्थान: हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी

  • कारण: जातिगत भेदभाव, फैलोशिप रोकी गई, हॉस्टल से निकाला गया

  • परिणाम: आत्महत्या (17 जनवरी 2016)

पायल तड़वी (2019)

  • जाति: ST (आदिवासी) + मुस्लिम

  • संस्थान: BYL नायर हॉस्पिटल, मुंबई (मेडिकल छात्रा)

  • कारण: सीनियर डॉक्टरों द्वारा जातिगत और धार्मिक उत्पीड़न

  • परिणाम: आत्महत्या (22 मई 2019)

2019 में PIL

  • याचिकाकर्ता: राधिका वेमुला (रोहित की मां) और आबेदा सलीम तड़वी (पायल की मां)

  • मांग: शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ कड़े कानून

2026 में क्या हुआ?

  • UGC ने नए नियम बनाए

  • सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी

  • रोहित और पायल की मांएं फिर से निराश

 कौन से जज SC/ST/OBC से हैं?

वर्तमान सुप्रीम कोर्ट (2025-26)

SC (दलित) जज:

  1. जस्टिस सी.टी. रविकुमार (एकमात्र, जस्टिस गवई के रिटायरमेंट के बाद)

ST (आदिवासी) जज:

  • कोई नहीं

OBC जज (लगभग 5):

  • जस्टिस सूर्य कांत (CJI तक)

  • अन्य (नाम सार्वजनिक डेटा में स्पष्ट नहीं)

महिला जज:

  • जस्टिस बी.वी. नागरत्ना (एकमात्र, 33 में से)

 सारांश तालिका: SC/ST/OBC के खिलाफ प्रमुख फैसले

केस साल मुद्दा SC/ST/OBC पर प्रभाव
इंदिरा साहनी 1992 OBC आरक्षण क्रीमी लेयर लागू
एम. नगराज 2006 पदोन्नति में आरक्षण पिछड़ापन और inadequacy साबित करने का बोझ
जरनैल सिंह 2018 SC/ST में क्रीमी लेयर SC/ST आरक्षण पर हमला
सुब्रमण्यम स्वामी 2020 SC/ST Act तत्काल गिरफ्तारी रोकी
पंजाब राज्य vs डाविंदर सिंह 2020 पदोन्नति आरक्षण Quantifiable data की शर्त
E.V. चिन्नैया 2023 SC में उप-वर्गीकरण SC के भीतर बंटवारे पर रोक
सब-क्लासिफिकेशन 2024 SC/ST में क्रीमी लेयर SC/ST में भी क्रीमी लेयर की संभावना
राजत यादव 2025 General में गिनती आरक्षित कोटा खाली होने का खतरा
G. किरण 2026 रिलैक्सेशन और General रिलैक्सेशन लेने पर General से बाहर
UGC Equity Regulations 2026 जातिगत भेदभाव रोकना रोहित-पायल के लिए बने नियम रोके गए

 क्यों ऐसे फैसले आते हैं?

कारण 1: सवर्ण वर्चस्व वाली बेंच

तथ्य:

  • 36.4% ब्राह्मण जज (जनसंख्या 5%)

  • 60% से अधिक सवर्ण हिंदू

  • केवल 12.1% SC/ST/OBC (जनसंख्या 60.53%)

परिणाम:

  • सवर्ण जजों के सामाजिक अनुभव अलग हैं

  • उन्होंने जातिगत भेदभाव नहीं झेला

  • "मेरिट" और "दक्षता" को अमूर्त समझते हैं

कारण 2: कॉलेजियम का गुप्त तरीका

समस्या:

  • जजों की नियुक्ति जजों द्वारा होती है

  • कोई पारदर्शिता नहीं

  • कोई सामाजिक विविधता का मानदंड नहीं

सरकार की बेबसी:

"सरकार किसी को हाई कोर्ट जज नहीं बना सकती जिसे हाई कोर्ट कॉलेजियम/सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अनुशंसित नहीं किया।"

कारण 3: "Social Prejudices" (सामाजिक पूर्वाग्रह)

NCSC 2013 रिपोर्ट:

  • उच्च न्यायपालिका "age-old social prejudices से संक्रमित"

  • "सामाजिक संघर्ष" के माहौल में पूर्वाग्रह फैसलों को प्रभावित करते हैं

कारण 4: "मेरिटोक्रेसी का मिथक"

सवर्ण जजों के लिए:

  • "मेरिट" = केवल परीक्षा अंक

  • "दक्षता" = तकनीकी कौशल

लेकिन वे भूल जाते हैं:

  • सामाजिक पूंजी (Social Capital): सवर्णों को घर से ही अंग्रेजी, कानूनी भाषा, नेटवर्किंग मिलती है

  • ऐतिहासिक वंचना: SC/ST/OBC को सदियों से शिक्षा से वंचित रखा गया

  • समानता ≠ न्याय: समान अवसर तभी न्यायपूर्ण है जब शुरुआती स्थिति समान हो

 विपरीत विचार: क्या सभी फैसले गलत हैं?

न्यायिक दृष्टिकोण

कुछ लोग तर्क देते हैं कि:

1. क्रीमी लेयर जरूरी है:

  • अमीर OBC/SC/ST को आरक्षण की जरूरत नहीं

  • सीमित संसाधनों को सबसे पिछड़ों तक पहुंचाना चाहिए

प्रति-तर्क:

  • जातिगत भेदभाव आर्थिक नहीं, सामाजिक है

  • अमीर दलित को भी "चमार" कहकर अपमानित किया जाता है

2. पदोन्नति में आरक्षण "दक्षता" प्रभावित करता है:

  • वरिष्ठ पदों पर योग्यता जरूरी है

प्रति-तर्क:

  • "योग्यता" का मानदंड पक्षपातपूर्ण हो सकता है

  • SC/ST/OBC को समान अवसर मिले, तो वे भी उतने ही सक्षम हैं

3. आरक्षण "अस्थायी" होना चाहिए:

  • संविधान ने इसे 10 साल के लिए कहा था

प्रति-तर्क:

  • जातिगत भेदभाव अभी भी मौजूद है (रोहित वेमुला, पायल तड़वी)

  • जब तक भेदभाव है, आरक्षण जरूरी है

  कड़वी सच्चाई

तथ्य

  1. प्रतिनिधित्व में भारी असमानता:

    • 60.53% जनसंख्या (SC/ST/OBC) का केवल 12.1% प्रतिनिधित्व

    • 5% जनसंख्या (ब्राह्मण) का 36.4% प्रतिनिधित्व

  2. कॉलेजियम सिस्टम विफल:

    • कोई पारदर्शिता नहीं

    • सामाजिक विविधता की अनदेखी

    • 2018-2023: हाई कोर्ट में केवल 17% SC/ST/OBC नियुक्तियां

  3. SC/ST/OBC के खिलाफ फैसले:

    • क्रीमी लेयर (इंदिरा साहनी, 1992)

    • पदोन्नति में शर्तें (नगराज 2006, डाविंदर सिंह 2020)

    • SC/ST Act कमजोर (सुब्रमण्यम स्वामी 2020)

    • UGC नियम रोके (2026)

    • SC/ST में क्रीमी लेयर की संभावना (2024)

  4. रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मांएं अब भी न्याय की प्रतीक्षा में

क्या यह "सवर्ण न्यायपालिका" का पूर्वाग्रह है?

डेटा यही कहता है:

  • जब बेंच में 36.4% ब्राह्मण हों (जनसंख्या 5%)

  • और केवल 3% SC (जनसंख्या 16.6%)

  • और 0% ST (जनसंख्या 8.6%)

  • तो फैसले किसके हित में होंगे?

NCSC 2013 की चेतावनी सही साबित हुई:

"सामाजिक पूर्वाग्रहों से संक्रमित न्यायपालिका, सामाजिक संघर्ष में पक्षपातपूर्ण फैसले दे सकती है।"

 आगे का रास्ता: क्या करना चाहिए?

1. न्यायिक नियुक्ति आयोग (Judicial Appointments Commission)

  • कॉलेजियम सिस्टम खत्म करो

  • पारदर्शी चयन प्रक्रिया लागू करो

  • आयोग में SC/ST/OBC सदस्य अनिवार्य करो

2. आरक्षण की मांग

  • न्यायपालिका में भी आरक्षण लागू हो

  • SC: 16.6%, ST: 8.6%, OBC: 27%

3. डेटा पारदर्शिता

  • सभी जजों का जाति, धर्म, लिंग डेटा सार्वजनिक करो

  • सुप्रीम कोर्ट 2018 से हाई कोर्ट डेटा इकट्ठा कर रहा है, सार्वजनिक करो

4. संवैधानिक संशोधन

  • अनुच्छेद 16(4A) को मजबूत करो

  • पदोन्नति में आरक्षण को न्यायिक समीक्षा से मुक्त करो

5. जन-आंदोलन

  • रोहित वेमुला, पायल तड़वी को याद रखो

  • न्यायिक विविधता की मांग करो

  • "Judiciary for All, Not Just Upper Castes" का नारा बुलंद करो

: यह आंकड़े और फैसले कड़वी सच्चाई हैं। भारतीय न्यायपालिका में SC/ST/OBC का प्रतिनिधित्व नगण्य है, और कई फैसले उनके संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करते हैं। जब तक न्यायपालिका सामाजिक रूप से विविध नहीं होगी, तब तक सच्चा न्याय असंभव है।