अंता उपचुनाव की हार और भाजपा का नोटिस: क्या जीतने वाला सही और हारने वाला दोषी?
राजस्थान की अंता विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद भाजपा प्रत्याशी रहे मोरपाल सुमन की वायरल चिट्ठी पर पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इस घटनाक्रम ने भाजपा के भीतर आंतरिक लोकतंत्र, अनुशासन और हार के बाद उठने वाले सवालों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। क्या चुनाव जीतने वाला ही सही होता है और हारने वाला सवाल उठाए तो अनुशासनहीन?
अंता उपचुनाव की हार, चिट्ठी और नोटिस:
क्या भाजपा में जीत सच की पहचान है और हार सवाल बन जाती है?
राजस्थान की अंता विधानसभा सीट से उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे मोरपाल सुमन की वायरल चिट्ठी पर पार्टी नेतृत्व का सख्त रुख सामने आया है। प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पार्टी के भीतर सच का मूल्य परिणामों से तय होता है?
मोरपाल सुमन को नोटिस में उनके कृत्य को अनुशासनहीनता करार दिया गया है और तीन दिन के भीतर लिखित जवाब देने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा सिर्फ नोटिस तक सीमित नहीं है—बल्कि उस सोच पर केंद्रित है, जिसमें हारने वाला प्रत्याशी असहज सवाल पूछे तो वह दोषी बन जाता है।
हार के बाद सवाल, जीत के बाद मौन?
मोरपाल सुमन ने अंता उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा, लेकिन नतीजों में वे तीसरे स्थान पर रहे। हार के बाद उन्होंने पार्टी नेतृत्व को लिखे पत्र में कई गंभीर आरोप लगाए—
टिकट की देरी, आंतरिक विरोध, वरिष्ठ नेताओं की निष्क्रियता और यहां तक कि चुनाव पर्यवेक्षक की भूमिका पर भी सवाल।
यह वही बातें हैं जो अक्सर चुनावी हार के बाद बंद कमरों में कही जाती हैं, लेकिन सार्वजनिक तौर पर शायद ही सामने आती हैं।
यहीं से सवाल उठता है—
अगर यही मोरपाल सुमन चुनाव जीत जाते, तो क्या उनकी चिट्ठी “फीडबैक” मानी जाती या फिर “अनुशासनहीनता”?

पार्टी में सच की कीमत: जीत बनाम हार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय दलों में एक अलिखित नियम लंबे समय से चला आ रहा है—
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जीतने वाला नेता सही माना जाता है
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हारने वाला नेता असुविधाजनक हो जाता है
अगर प्रत्याशी जीतता है, तो संगठन की हर रणनीति सफल कही जाती है।
लेकिन वही प्रत्याशी हार जाए और संगठन की कमियों पर उंगली उठाए, तो सवाल उठाने वाला ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
मोरपाल सुमन का मामला इसी मानसिकता का उदाहरण बनता जा रहा है।
आरोपों की गंभीरता और जवाबदेही का सवाल
चिट्ठी में जिन नेताओं और पदाधिकारियों पर आरोप लगाए गए, वे कोई छोटे नाम नहीं हैं।
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की टीम से लेकर, राज्य मंत्री से जुड़े नाम, पूर्व विधायक और मौजूदा विधायकों तक—
ये सभी भाजपा संगठन का अहम हिस्सा हैं।
ऐसे में सवाल यह भी है कि
क्या पार्टी इन आरोपों की जांच करेगी या सिर्फ पत्र लिखने वाले को दंडित कर मामला खत्म कर दिया जाएगा?
अगर आरोप गलत हैं, तो तथ्य सामने लाए जाने चाहिए।
और अगर सही हैं, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए।
नोटिस से आगे की राजनीति
प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का नोटिस संगठनात्मक अनुशासन की दृष्टि से सही ठहराया जा सकता है,
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अनुशासन और आत्ममंथन के बीच की रेखा बेहद पतली होती है।
अगर हर हार के बाद उठे सवालों को अनुशासनहीनता कहकर दबा दिया गया,
तो संगठन के भीतर वास्तविक सुधार की गुंजाइश कहां बचेगी?

हार का सच और जीत का शोर
अंता उपचुनाव की यह कहानी अब सिर्फ एक सीट की हार नहीं रही।
यह उस राजनीतिक संस्कृति पर सवाल बन गई है,
जहां जीत सब कुछ जायज कर देती है
और हार सच बोलने की सजा बन जाती है।
अब देखना यह है कि
भाजपा इस मामले को सिर्फ अनुशासन का मुद्दा मानकर बंद करती है
या फिर इसे संगठन के भीतर झांकने का मौका बनाती है।
क्योंकि लोकतंत्र में
सवाल हारने वाला ही नहीं,
जीतने वाला भी जवाबदेह होता है।
Hindu Solanki 
