घर पाने के लिए भी रिश्वत? प्रधानमंत्री आवास योजना पर उठे गंभीर सवाल!

प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर राजस्थान की पंचायत समितियों में गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। शिकायत है कि बिना 10–20 हजार रुपये की रिश्वत दिए पात्र लाभार्थियों को किश्त का भुगतान नहीं किया जा रहा। गरीब परिवार महीनों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि गरीबों के अधिकार और शासन व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। राजस्थान सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है।

घर पाने के लिए भी रिश्वत? प्रधानमंत्री आवास योजना पर उठे गंभीर सवाल!

प्रधानमंत्री आवास योजना में रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप

पंचायत समितियों में बिना 10–20 हजार रुपये दिए नहीं मिल रही किश्त?
गरीब दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर, राजस्थान सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग**

प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) को देश के गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में गिना जाता है। इस योजना का उद्देश्य साफ था — हर गरीब परिवार के सिर पर पक्का मकान। लेकिन राजस्थान के कई इलाकों से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह इस उद्देश्य पर गहरे सवाल खड़े करती है।

स्थानीय स्तर पर लगातार यह शिकायत सामने आ रही है कि पंचायत समिति कार्यालयों में बिना 10 से 20 हजार रुपये की रिश्वत दिए, पात्र लाभार्थियों को योजना की किश्त का भुगतान नहीं किया जा रहा।
जिन गरीब परिवारों के नाम सूची में हैं, जिनके दस्तावेज पूरे हैं, वे महीनों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

गरीबों का कहना है कि:

“कागज पूरे हैं, सर्वे हो चुका है, मकान भी आधा बन गया… लेकिन किश्त तभी मिलेगी जब ‘पैसे ऊपर’ दिए जाएं।”

अगर ये आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि गरीबों के अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

 प्रधानमंत्री आवास योजना में रिश्वत का खेल?
 10–20 हजार बिना दिए किश्त नहीं!
 गरीब दफ्तरों में भटक रहा है
 योजना गरीबों के लिए या सिस्टम के लिए?
 राजस्थान सरकार से जांच की मांग

गरीब की पीड़ा: “घर चाहिए, भीख नहीं”

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिलने वाली किश्त गरीब परिवारों के लिए जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होती है।
कई परिवार:

  • कर्ज लेकर निर्माण शुरू करते हैं

  • मजदूरी करके ईंट-पत्थर जोड़ते हैं

  • सरकारी किश्त के भरोसे घर पूरा करने का सपना देखते हैं

लेकिन जब किश्त समय पर नहीं मिलती, तो:

  • निर्माण रुक जाता है

  • कर्ज बढ़ जाता है

  • गरीब मानसिक और आर्थिक दोनों रूप से टूट जाता है

ग्रामीण क्षेत्रों से यह भी आरोप हैं कि कुछ लाभार्थियों को तो साफ शब्दों में कहा जाता है —

“अगर पैसे नहीं दोगे, तो फाइल आगे नहीं बढ़ेगी।”

यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या गरीब को उसके हक के लिए भी रिश्वत देनी पड़ेगी?

सबसे बड़ा सवाल: सरकार और प्रशासन को पता क्यों नहीं?

यह पूरा मामला एक-दो कर्मचारियों तक सीमित नहीं लगता।
अगर पंचायत समिति स्तर पर बार-बार ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं, तो सवाल उठता है कि:

  • क्या प्रशासन को इस स्थिति की जानकारी नहीं है?

  • या जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही?

  • क्या सिस्टम के भीतर ही भ्रष्टाचार को संरक्षण मिल रहा है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर:

  • जिन लाभार्थियों को किश्त मिल चुकी है

  • उनसे खुले तौर पर पूछा जाए कि

    • भुगतान कितने समय में हुआ?

    • किन हालात में हुआ?

    • क्या किसी तरह का लेन-देन हुआ?

तो सच्चाई अपने आप सामने आ जाएगी।

सरकारी नौकरी और गरीब का शोषण?

सबसे चिंताजनक आरोप यह है कि
सरकारी नौकरी में बैठे कुछ लोग ही गरीबों से पैसे मांग रहे हैं।

यह वही सरकारी नौकरी है:

  • जिसे जनता की सेवा के लिए माना जाता है

  • जो संविधान और कानून की शपथ पर चलती है

अगर वही कर्मचारी गरीब से:

  • योजना की किश्त के बदले रिश्वत मांगें

  • और मजबूरी का फायदा उठाएं

तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि नैतिक पतन भी है।

राजस्थान सरकार से सीधा निवेदन

इस पूरे मामले में ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों की मांग है कि:

  •  पंचायत समिति स्तर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए

  •  लाभार्थियों के बयान दर्ज किए जाएं

  •  भुगतान प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए

  •  दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों और बिचौलियों पर कड़ी कार्रवाई हो

  •  यह सुनिश्चित किया जाए कि गरीब को उसका हक बिना किसी दबाव और रिश्वत के मिले

क्योंकि प्रधानमंत्री आवास योजना दान नहीं, बल्कि गरीब का अधिकार है।

यह सिर्फ शिकायत नहीं, सिस्टम की परीक्षा है

प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े ये आरोप सिर्फ एक योजना की बात नहीं हैं,
बल्कि यह पूरे शासन तंत्र की परीक्षा हैं।

अगर समय रहते:

  • इन शिकायतों की जांच नहीं हुई

  • दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई

तो यह संदेश जाएगा कि
गरीब का शोषण करने वालों को कोई डर नहीं।

अब सवाल यही है—
क्या राजस्थान सरकार इन आरोपों को गंभीरता से लेगी,
या गरीब यूं ही पंचायत समितियों के चक्कर काटता रहेगा?