क्या राजस्थान के असल मुद्दे हाशिये पर चले गए? भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर विधानसभा के बाहर सियासी संग्राम
राजस्थान विधानसभा के बाहर भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, कांग्रेस सचेतक रफीक खान और गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम के बीच हुई यह नोकझोंक सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। बीजेपी जहां इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक जीत बता रही है, वहीं कांग्रेस ने इसे देश के हितों से समझौता बताया। लेकिन सवाल यह है कि जब राजस्थान बेरोज़गारी, भर्तियों की देरी, किसानों की समस्याओं और महंगाई से जूझ रहा है, तब राज्य के जनप्रतिनिधि केंद्र के मुद्दों पर सियासत क्यों कर रहे हैं? क्या विधानसभा के बाहर हो रही यह बहस जनता के असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की रणनीति है? पूरी रिपोर्ट में पढ़िए राजनीतिक टकराव के पीछे की असली तस्वीर।
राजस्थान विधानसभा के बाहर सियासी टकराव, लेकिन क्या असल मुद्दे भटक गए?
जयपुर।
राजस्थान विधानसभा के बाहर बुधवार को जो नज़ारा दिखा, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि सही मुद्दों पर सही मंच पर बात कर रहे हैं? भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हुई तीखी बहस अब केवल विधानसभा परिसर तक सीमित नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके वीडियो के ज़रिए आम जनता तक भी पहुंच गई है।
इस बहस में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, कांग्रेस सचेतक रफीक खान और गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम आमने-सामने नजर आए। बातचीत इतनी उग्र हो गई कि इसे ‘अनकट’ बहस कहा जाने लगा। बीजेपी जहां इस ट्रेड डील को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक और आर्थिक सफलता बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे देश के हितों के खिलाफ एक समझौता करार दे रही है।

सवाल ट्रेड डील का नहीं, प्राथमिकताओं का है
भारत–अमेरिका ट्रेड डील जैसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बहस लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि राजस्थान विधानसभा के बाहर यह बहस क्यों और किस मकसद से?
राजस्थान आज जिन समस्याओं से जूझ रहा है, वे किसी से छिपी नहीं हैं—
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सरकारी भर्तियों में देरी और विवाद
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बेरोज़गारी से परेशान युवा
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किसानों की उपज के सही दाम और सिंचाई संकट
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महंगाई और कानून-व्यवस्था के सवाल
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शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति
इन मुद्दों पर न तो वैसी तीखी बहस दिखती है और न ही वैसा राजनीतिक जोश, जैसा केंद्र सरकार की ट्रेड डील को लेकर देखने को मिला।
विधानसभा के बाहर राजनीति, जनता के मुद्दे अंदर ही रह गए

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस राज्य की बजाय राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश ज्यादा लगती है। विधानसभा परिसर के बाहर कैमरों के सामने हुई यह नोकझोंक जनता के बीच संदेश तो पहुंचा रही है, लेकिन समाधान कहीं नजर नहीं आता।
विडंबना यह है कि राजस्थान के जनप्रतिनिधि केंद्र की नीतियों पर मुखर हैं, लेकिन जब बात राज्य के युवाओं की नौकरी, किसानों की फसल या आम आदमी की जेब पर पड़ रहे बोझ की आती है, तो वही तेवर नजर नहीं आते।
सोशल मीडिया बनाम ज़मीनी हकीकत
बहस का वीडियो वायरल होना इस बात का संकेत है कि राजनीति अब नीतियों से ज्यादा वायरल कंटेंट पर केंद्रित होती जा रही है। तीखे संवाद, ऊंची आवाज़ और आरोप-प्रत्यारोप—सब कुछ है, लेकिन आम आदमी की ज़िंदगी में इससे क्या बदलेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं।
जनता पूछ रही है सवाल
राजस्थान की जनता आज यह जानना चाहती है कि—
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क्या विधानसभा के बाहर केंद्र की बहस करना राज्य की समस्याओं से ध्यान हटाने का तरीका है?
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क्या जनप्रतिनिधियों का समय और ऊर्जा उन मुद्दों पर नहीं लगनी चाहिए, जिनका असर सीधे प्रदेश की जनता पर पड़ता है?
लोकतंत्र में बहस जरूरी है, लेकिन बहस का विषय और मंच दोनों सही हों, तभी उसका मतलब निकलता है। वरना यह सियासी शोर बनकर रह जाती है, जिसमें आवाज़ तो होती है, पर दिशा नहीं।
आखिर में सवाल वही है—
राजस्थान के जनप्रतिनिधि केंद्र की राजनीति में उलझे रहेंगे या राज्य की ज़मीनी सच्चाइयों पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाएंगे?
इसका जवाब आने वाला समय देगा, लेकिन फिलहाल जनता जवाब का इंतज़ार कर रही है। लेकिन
एक तरफ गांवों, कस्बों और शहरों में खेजड़ी, ओरण, गोचर, स्कूल व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और OMR सीट घोटाले जैसे मुद्दों को लेकर जनता बेचैन है, वहीं दूसरी तरफ राज्य के जनप्रतिनिधि सदन और विधानसभा के बाहर भारत की विदेश नीति पर बहस करने में अधिक व्यस्त नजर आ रहे हैं।
विदेश नीति पर चर्चा करना निस्संदेह एक महत्वपूर्ण विषय है। संसद में राहुल गांधी के भाषण से जुड़ा विवाद हो या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका—इन विषयों पर विमर्श लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्य की विधानसभा और जनप्रतिनिधियों की पहली प्राथमिकता वही नहीं होनी चाहिए, जिसके लिए जनता ने उन्हें चुना है?

खेजड़ी और ओरण पर आंदोलन, लेकिन राजनीति में खामोशी
आज प्रदेश में खेजड़ी और ओरण को लेकर दो बड़े जन आंदोलन चल रहे हैं। झुंझनू जिले में करीब 60 हजार पेड़ों की कटाई के खिलाफ लोग सड़कों पर हैं। यह केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है, बल्कि आजीविका, परंपरा और भावनात्मक जुड़ाव का मुद्दा भी है। बावजूद इसके, विपक्ष की ओर से सरकार को इस मसले पर घेरने की कोई ठोस और संगठित कोशिश नजर नहीं आती।
सवाल उठता है—क्या सदन में इन मुद्दों पर कभी विशेष चर्चा की मांग हुई? क्या ध्यानाकर्षण प्रस्ताव या शून्यकाल में इन पर गंभीरता से बात की गई? जवाब तलाशने पर निराशा ही हाथ लगती है।

मुद्दे बदलते ही बदल जाता है तेवर
दिलचस्प यह है कि जब कांग्रेस नेताओं पर कार्रवाई होती है, जिलों की सीमा परिवर्तन का मामला आता है और हेमाराम चौधरी के समर्थन में खड़ा होना हो, माफी कांड पर धरना देना हो या इंदिरा गांधी पर दिए गए अविनाश गहलोत के बयान को लेकर विवाद खड़ा करना हो—तब विपक्ष की सक्रियता अचानक चरम पर पहुंच जाती है।
इन विषयों पर राजनीतिक बयानबाज़ी और सड़क से सदन तक हंगामा इस तरह होता है, मानो यही प्रदेश की सबसे बड़ी समस्याएं हों। लेकिन जैसे ही बात स्कूलों की बदहाल स्थिति, बेरोज़गारी, भर्ती घोटालों या कानून व्यवस्था की आती है, एक अजीब सी चुप्पी छा जाती है।
क्या सदन जनता के मुद्दों से कटता जा रहा है?

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। विधानसभा केवल राजनीतिक बयानबाज़ी का मंच नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं को आवाज़ देने का सबसे मजबूत संवैधानिक मंच है। अगर यहां भी जमीनी मुद्दे प्राथमिकता नहीं बन पा रहे, तो फिर आम नागरिक कहां जाए?
व्यंग्य में कहा जा रहा है कि शायद सदन की कैंटीन की चाय इतनी सस्ती और मीठी है कि सत्ता और विपक्ष दोनों को एक ही टेबल पर बैठा देती है। मतभेद मंच पर दिखते हैं, लेकिन जनता से जुड़े सवालों पर एक अनकही सहमति बन जाती है—चुप रहने की।
राजनीति बनाम जिम्मेदारी
राजस्थान की जनता आज यह सवाल पूछ रही है कि क्या उसके जनप्रतिनिधि सच में उसके लिए लड़ रहे हैं या फिर राजनीतिक सुविधा के अनुसार मुद्दे चुन रहे हैं? विदेश नीति पर बहस ज़रूरी है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है उन मुद्दों पर बोलना, जिनका सीधा असर गांव, खेत, स्कूल और घरों पर पड़ता है।
अगर सदन में खेजड़ी, ओरण, गोचर, शिक्षा और रोजगार जैसे सवालों को प्राथमिकता नहीं मिली, तो यह केवल विपक्ष की विफलता नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक विमर्श की कमजोरी मानी जाएगी।
जनता ने प्रतिनिधि चुने हैं—प्रवक्ता नहीं। अब देखना यह है कि यह आवाज़ सदन तक कब और कैसे पहुंचेगी।

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