अध्यापक भर्ती 2022 लेवल-2 हिंदी: एक भर्ती, दो मेरिट! रिवाइज रिजल्ट के बावजूद क्यों भटक रहे योग्य अभ्यर्थी?

अध्यापक भर्ती 2022 (लेवल-2 हिंदी) में रिवाइज परिणाम 2025 जारी होने के बाद भी नई मेरिट लागू नहीं होने से विवाद गहरा गया है। ज्यादा अंक पाने वाले अभ्यर्थी चयन से बाहर, कम अंक वाले बने हुए हैं। सरकार और RSSB की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

अध्यापक भर्ती 2022 लेवल-2 हिंदी: एक भर्ती, दो मेरिट! रिवाइज रिजल्ट के बावजूद क्यों भटक रहे योग्य अभ्यर्थी?

अध्यापक भर्ती 2022 (लेवल-2 हिंदी):

एक भर्ती, दो मेरिट और सैकड़ों सवाल

रिवाइज रिजल्ट के बावजूद क्यों नहीं मिली न्याय की गारंटी?

अध्यापक भर्ती 2022 (लेवल-2 हिंदी) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस भर्ती को लेकर अभ्यर्थियों में असंतोष अब सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक खुलकर सामने आ रहा है। सवाल सीधा है — जब 2025 में रिवाइज परिणाम जारी हो चुका है, तो फिर उसी के आधार पर नियुक्तियाँ क्यों नहीं?

क्या है पूरा मामला?

वर्ष 2023 में राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड (RSSB) ने लेवल-2 हिंदी भर्ती का परिणाम जारी कर नियुक्तियाँ दे दीं। लेकिन बाद में सामने आया कि उत्तर कुंजी में गंभीर त्रुटियाँ थीं। कई प्रश्नों के उत्तर गलत पाए गए, जिस पर अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद, 2025 में भर्ती का रिवाइज परिणाम जारी हुआ। इस संशोधित परिणाम में चौंकाने वाली स्थिति सामने आई—

  • कई पूर्व चयनित अभ्यर्थियों के अंक घट गए

  • वहीं बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के अंक 5 से 7 तक बढ़ गए

  • नई मेरिट सूची में कई ऐसे नाम ऊपर आ गए, जिन्हें पहले बाहर कर दिया गया था

सबसे बड़ा सवाल:

जब नई मेरिट बनी, तो उसे लागू क्यों नहीं किया गया?

अभ्यर्थियों का आरोप है कि—

  • कम अंक वाले पहले से चयनित अभ्यर्थी आज भी प्रक्रिया में बने हुए हैं

  • जबकि ज्यादा अंक पाने वाले अभ्यर्थियों को नियुक्ति से वंचित रखा गया है

  • यानी एक ही भर्ती, एक ही विषय, लेकिन दो अलग-अलग मेरिट से चयन

यह स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक भ्रम पैदा करती है, बल्कि समानता के अधिकार (Article 14) पर भी सवाल खड़े करती है।

“यह सिर्फ नौकरी का नहीं, मानसिक उत्पीड़न का मामला है”

अभ्यर्थियों का कहना है कि पिछले दो वर्षों से वे एक अनिश्चितता में जी रहे हैं।
एक तरफ रिवाइज रिजल्ट में उनका नाम ऊपर आता है, दूसरी तरफ सरकार और विभाग उस मेरिट को लागू ही नहीं करते।

अभ्यर्थियों का आरोप है कि—

  • यह सामाजिक और मानसिक उत्पीड़न है

  • पिछली सरकार के कार्यकाल में हुए पेपर लीक, गलत उत्तर कुंजी और जल्दबाजी में दी गई नियुक्तियों का खामियाजा अब योग्य उम्मीदवार भुगत रहे हैं

  • जो गलती सिस्टम की थी, उसकी सजा अभ्यर्थियों को दी जा रही है

सरकार और RSSB से सीधे सवाल

  1. जब हाईकोर्ट के आदेश पर रिवाइज परिणाम जारी हुआ, तो नई मेरिट को लागू क्यों नहीं किया गया?

  2. क्या कम अंक पाने वाले अभ्यर्थियों को बनाए रखना योग्यता के साथ धोखा नहीं है?

  3. क्या सरकार किसी कानूनी उलझन से डर रही है या फिर यह सिर्फ प्रशासनिक उदासीनता है?

  4. क्या एक भर्ती में दो मेरिट लागू करना भविष्य की भर्तियों के लिए खतरनाक मिसाल नहीं बनेगा?

चुप्पी क्यों?

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि—

  • न तो शिक्षा विभाग ने अब तक कोई स्पष्ट नीति बताई है

  • न ही RSSB ने यह साफ किया है कि अंतिम मेरिट कौन-सी मानी जाएगी

यह चुप्पी संदेह को और गहरा करती है।

क्या हमारा सरकारी तंत्र इतना फेल हो गया है?
दुर्भाग्य से कई मामलों में जवाब हाँ की तरफ झुकता दिख रहा है।

सरकार गरीब और मध्यम वर्ग के लिए आख़िरी सहारा होती है। सरकारी नौकरी सिर्फ रोज़गार नहीं, बल्कि

  • सम्मान

  • स्थिरता

  • परिवार की सुरक्षा
    का भरोसा होती है।

लेकिन जब

  • एक ही भर्ती में दो-दो मेरिट बनें,

  • ज़्यादा अंक वाला दर-दर भटके और

  • कम अंक वाला सिस्टम की कृपा से टिक जाए,

तो सवाल सिर्फ भर्ती का नहीं रहता… पूरे सिस्टम की नीयत और क्षमता पर उठता है।

सिस्टम कहां फेल हो रहा है?

  • लापरवाह एजेंसियां: गलत उत्तर कुंजी, अधूरी जांच, जल्दबाज़ी में नियुक्तियाँ

  • जवाबदेही का अभाव: गलती हो जाए तो न माफी, न कार्रवाई

  • अदालत के आदेशों की आधी पालना: रिजल्ट बदला, पर मेरिट लागू नहीं

  • गरीब अभ्यर्थी सबसे ज़्यादा पिसता है: न पैसा, न पहुंच, न लंबी कानूनी लड़ाई की ताकत

सबसे बड़ा सवाल

अगर सरकार न्यायपूर्ण भर्ती तक नहीं करवा पा रही,
तो वह उस युवा से क्या उम्मीद रखे जो
सालों पढ़ता है,
उम्र निकाल देता है,
और अंत में कह दिया जाता है — “सिस्टम ऐसा ही है”?

यह सिर्फ भर्ती नहीं, भरोसे का संकट है

आज सवाल ये नहीं कि
“किसकी सरकार थी?”
या
“कौन सा बोर्ड ज़िम्मेदार है?”

सवाल ये है
क्या सरकार अब भी गरीब की सबसे बड़ी उम्मीद है,
या फिर वो भी एक ऐसी व्यवस्था बन चुकी है
जहां न्याय नहीं, सिर्फ इंतज़ार मिलता है?

अगर आज सवाल नहीं पूछे गए,
तो कल यही सिस्टम हर घर के बच्चे को तोड़ेगा।


ये सवाल पूछना बगावत नहीं — लोकतंत्र का हक़ है।

अगर अभ्यर्थियों के आरोप तथ्यात्मक हैं, तो यह मामला केवल एक भर्ती का नहीं रह जाता —
यह योग्यता, न्याय और सिस्टम की विश्वसनीयता का सवाल बन जाता है।

सरकार को तय करना होगा—
 या तो वह रिवाइज मेरिट को पूरी तरह लागू करे
 या फिर स्पष्ट रूप से बताए कि आखिर किस आधार पर चयन हो रहा है

क्योंकि लोकतंत्र में न्याय में देरी भी अन्याय ही मानी जाती है।

अगर नेताओं की वोटिंग के बाद भी

  • नतीजे जानबूझकर देर से जारी किए जाएं,

  • कभी “तकनीकी कारण” बताकर रोक लगा दी जाए,

  • या जीतने के बाद भी विधायक बनने न दिया जाए,

तो उन्हें भी वही दर्द महसूस होगा
जो आज आम युवा, गरीब और मेहनती अभ्यर्थी झेल रहा है।

तब क्या होगा?

  • तब समझ आएगा कि अनिश्चितता क्या होती है

  • तब पता चलेगा कि सिस्टम की देरी कैसे ज़िंदगी रोक देती है

  • तब एहसास होगा कि “सब्र रखो” कहना कितना आसान और झेलना कितना मुश्किल है

आज हाल ये है कि

  • नेता जीतते ही शपथ की तारीख जान लेते हैं

  • लेकिन अभ्यर्थी सालों तक रिजल्ट की एक लाइन का इंतज़ार करता है

असली सवाल

क्या लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने तक ही जवाबदेह है?
या फिर
रिजल्ट, चयन और न्याय—सब पर एक जैसा नियम होना चाहिए?

अगर सिस्टम सिर्फ नीचे वालों पर सख़्त
और ऊपर वालों पर नरम रहेगा,
तो नाराज़गी गुस्से में बदलेगी—
और गुस्सा कभी अच्छा संकेत नहीं होता।

न्याय अगर सबके लिए एक जैसा नहीं,
तो व्यवस्था पर भरोसा कैसे बचेगा?