बाड़मेर-जैसलमेर में शिक्षा संकट:आखिर क्यूं बच्चे छोड़ रहे है पढाई , आइये जानते हैं पूरी कहानी ..........
बाड़मेर और जैसलमेर में शिक्षा की स्थिति गंभीर होती जा रही है। सांसद द्वारा लोकसभा में साझा आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में इन दोनों जिलों में 26.44% बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी। गरीबी, सूखा, पलायन, स्कूलों की दूरी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और सामाजिक कारण इसके प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। सीमावर्ती और रेगिस्तानी इलाकों में शिक्षा तक पहुंच आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह रिपोर्ट ड्रॉपआउट के पीछे की असल वजहों, जमीनी हालात और भविष्य पर पड़ने वाले असर की पड़ताल करती है।
बाड़मेर-जैसलमेर में 5 वर्षों में 26.44% बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी: दर कितनी गंभीर और क्यों?
पश्चिम राजस्थान के बाड़मेर और जैसलमेर जैसे सीमावर्ती और रेगिस्तानी इलाकों में शिक्षा का परिदृश्य गम्भीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। लोकसभा में सूचीबद्ध एक तारांकित प्रश्न के जवाब में सांसद द्वारा साझा आंकड़ों के अनुसार पिछले पाँच वर्षों में इन दोनों जिलों में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की दर लगभग 26.44% तक पहुंच गई है—एक चेतावनी जो शिक्षा नीति और सामाजिक प्रगति के लिए गंभीर संकेत देता है।
भूगोल और सामाजिक संरचना — एक चुनौती
बाड़मेर और जैसलमेर, दोनों ही गहरे थार रेगिस्तान का हिस्सा हैं, जहां बुनियादी सामाजिक एवं आर्थिक संभवताएँ अन्य जिलों की तुलना में कम हैं।

ऐसे इलाकों में स्कूलों तक पहुंच, यातायात, संसाधन और परिवारों की आर्थिक मजबूरियाँ, बच्चों के नियमित अध्ययन में रुकावट बनते हैं। उदाहरण के तौर पर, बहुत से गांवों के छात्रों को स्कूल आने-जाने के लिए रेगिस्तान की कठिन रेत और लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे स्कूल छोड़ना आसान विकल्प बन जाता है।

सूखा, गरीबी और पलायन का असर
पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों में सूखे की स्थिति अक्सर कृषि और पशुपालन पर निर्भर समुदायों की आय को प्रभावित करती है। बाड़मेर में हाल के वर्षों में सूखे की वजह से कई परिवारों को अपने गांवों से पलायन करना पड़ा, जिससे बच्चे पढ़ाई के बजाय घर-परिवार के लिए काम करने या जीविका कमाने को मजबूर हुए हैं। इससे ड्रॉपआउट दर में वृद्धि का एक बड़ा कारण बनता है।

संस्थागत और अवसंरचना चुनौतियाँ
इन जिलों में न केवल परीक्षा परिणामों के अनुसार छात्रों का प्रदर्शन पिछड़े ज़िलों से बेहतर रहा है; ताजा माध्यमिक और 12वीं की बोर्ड रिपोर्ट में बाड़मेर और जैसलमेर के छात्रों ने औसतन अच्छे प्रतिशत हासिल किए हैं, लेकिन यह सिर्फ पढ़ाई जारी रखने वाले छात्र हैं, ड्रॉपआउट का आकलन वहां के बाकी बच्चों में अधिक है।
स्थानीय स्कूलों में बरसात, कैंपस सुरक्षा, इमारत की मरम्मत और सुविधाओं की कमी जैसी बुनियादी अवसंरचना की समस्याओं पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। राजस्थान हाईकोर्ट भी राज्य के कई स्कूलों की जर्जर स्थिति पर रिपोर्ट माँग चुका है, जिससे स्पष्ट होता है कि शिक्षा बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कमजोर हो रही है।
आर्थिक कारण और सामाजिक बाधाएं
ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की आय मुख्यतः खेती-पशुपालन और अस्थिर कामों पर निर्भर होती है। जब परिवार भूखे पेट संघर्ष में होते हैं, तब बच्चे पढ़ाई छोड़कर मजदूरी, खेती या अन्य कामों में लग जाते हैं — खासकर किशोरों में यह दर काफी बढ़ जाती है। इसी तरह, सामाजिक अवधारणाएँ जैसे लड़कियों के लिए पढ़ाई के बजाय घरेलू जिम्मेदारियाँ या विवाह को प्राथमिकता देना भी ड्रॉपआउट दर पर प्रभाव डालते हैं।

साक्षरता के फायदे बनाम वास्तविकता
जहाँ बोर्ड परिणाम यह दिखाते हैं कि बाड़मेर और जैसलमेर के कुछ छात्र उत्कृष्ट अंक प्राप्त करते हैं, वहीं वास्तविकता यह है कि बहुत सारे बच्चे पढ़ाई में हिस्सा नहीं ले रहे हैं या बीच में ही छोड़ देते हैं। यह विषमता संकेत देती है कि शिक्षा की गुणवत्ता और निरंतरता के बीच भारी अंतर है।
सांसद की चिंता और प्रशासनिक प्रतिक्रियाएँ

सांसद के बयान ने यह स्पष्ट किया है कि ड्रॉपआउट दर सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि शिक्षा नीति, रोजगार, सामाजिक विकास और भविष्य की मानव पूँजी पर बड़ा प्रभाव डालने वाला संकेत है। शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन को अब न सिर्फ़ स्कूल खोले रखने बल्कि बच्चों को पढ़ाई तक जोड़ने के लिए विशेष योजनाएँ लागू करने की आवश्यकता है।

बाड़मेर और जैसलमेर जैसे जिलों में विद्यार्थियों के बीच पढ़ाई छोड़ने की दर 26.44% तक पहुँच जाना केवल शैक्षणिक समस्या नहीं है — यह सामाजिक-आर्थिक, भौगोलिक, पारिवारिक और प्रशासनिक मुद्दों से जुड़ा बहुआयामी संकट है।
जहाँ कुछ छात्रों की बोर्ड प्रदर्शन अच्छी है, वहीं दूसरी ओर बहुत से बच्चे शिक्षा जारी नहीं रख पा रहे — यह संकेत है कि पाठशाला-तक पहुँच, स्कूल सुविधाएँ, आर्थिक सहयोग, सामाजिक जागरूकता और नीति-स्थर पर योगदान को संतुलित करने की आवश्यकता है।
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