उत्तरलाई के पास स्कूल वैन हादसा: निजी स्कूल के बच्चों से भरी ईको वैन पलटी, एक दर्जन बच्चे सवार

उत्तरलाई क्षेत्र के पास एक निजी स्कूल के बच्चों से भरी ईको वैन अनियंत्रित होकर पलट गई। हादसे के वक्त वैन में करीब एक दर्जन बच्चे सवार थे। घटना के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों को प्राथमिक उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। हादसे ने एक बार फिर स्कूल वाहनों की सुरक्षा और प्रशासन की निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

उत्तरलाई के पास स्कूल वैन हादसा: निजी स्कूल के बच्चों से भरी ईको वैन पलटी, एक दर्जन बच्चे सवार

उत्तरलाई के पास स्कूल वैन हादसा: निजी स्कूल के बच्चों से भरी ईको वैन पलटी, मचा हड़कंप

बाड़मेर | उत्तरलाई

उत्तरलाई क्षेत्र के पास आज  उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब एक निजी स्कूल के बच्चों से भरी ईको वैन अनियंत्रित होकर सड़क किनारे पलट गई। वैन में करीब एक दर्जन बच्चे सवार थे, जो रोज़ाना की तरह स्कूल जा रहे थे।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वैन की रफ्तार तेज थी और सड़क पर अचानक संतुलन बिगड़ने से वाहन पलट गया। हादसे के बाद बच्चों की चीख-पुकार सुनकर आसपास के ग्रामीण और राहगीर तुरंत मौके पर पहुंचे और बच्चों को बाहर निकाला।

बच्चों में दहशत, अभिभावकों में गुस्सा

हादसे में कुछ बच्चों को हल्की चोटें आई हैं, जिन्हें प्राथमिक उपचार के लिए नजदीकी अस्पताल ले जाया गया। राहत की बात यह रही कि किसी भी बच्चे को गंभीर चोट नहीं आई, लेकिन घटना ने स्कूल वाहनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सूचना मिलते ही अभिभावक भी मौके और अस्पताल पहुंचे। कई अभिभावकों ने आरोप लगाया कि निजी स्कूल प्रबंधन बच्चों की सुरक्षा को लेकर लापरवाह है और बिना तय मानकों के वाहनों का संचालन किया जा रहा है।

ओवरलोडिंग और लापरवाही की आशंका

स्थानीय लोगों का कहना है कि ईको वैन में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया गया था। स्कूल वैन में न तो स्पीड कंट्रोल का ध्यान रखा गया और न ही सुरक्षा मानकों का पालन किया गया।

पुलिस ने मौके पर पहुंचकर वैन को कब्जे में लिया और ड्राइवर से पूछताछ शुरू कर दी है। प्रारंभिक जांच में तेज रफ्तार और वाहन संतुलन बिगड़ने को हादसे का कारण माना जा रहा है।

बार-बार हो रही घटनाएं, सवाल वही

यह कोई पहली घटना नहीं है। जिले में पहले भी कई बार स्कूल वाहनों की लापरवाही सामने आ चुकी है, लेकिन हर हादसे के बाद जांच और चेतावनी तक ही मामला सीमित रह जाता है।

अब सवाल यह है कि—
क्या किसी बड़े हादसे का इंतज़ार किया जा रहा है?
और क्या बच्चों की जान की कीमत पर ही स्कूलों की मनमानी चलेगी?

छोटी स्कूल वैन का बढ़ता चलन: बच्चों की सुरक्षा या सस्ता जोखिम?

राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में निजी स्कूलों द्वारा छोटी वैन और ईको जैसे वाहनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। यह चलन स्कूल प्रबंधन के लिए भले ही सुविधाजनक और सस्ता हो, लेकिन बच्चों की सुरक्षा के लिहाज़ से यह एक गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

हाल के महीनों में सामने आए कई सड़क हादसों में यह बात साफ हुई है कि छोटी वैनें स्कूल परिवहन के लिए न तो सुरक्षित हैं और न ही मानकों के अनुरूप।

क्यों बढ़ रहा है छोटी वैन का इस्तेमाल?

स्कूल प्रबंधन से जुड़े लोगों की मानें तो बड़ी बसों की तुलना में छोटी वैन:

  • सस्ती होती हैं

  • ईंधन कम खपत करती हैं

  • संकरी गलियों में आसानी से चल जाती हैं

  • ड्राइवर रखना आसान होता है

लेकिन इसी “सुविधा” की कीमत बच्चे चुका रहे हैं।

क्षमता से ज्यादा बच्चे, सुरक्षा शून्य

ज़मीनी हकीकत यह है कि:

  • 7–8 सीटर वैन में 12–15 बच्चे ठूंस दिए जाते हैं

  • अधिकतर वैन में सीट बेल्ट नहीं होती

  • बच्चों के लिए कोई सेफ्टी ग्रिल या गार्ड नहीं

  • कई वैन बिना परमिट और फिटनेस के दौड़ रही हैं

हादसे के समय यही लापरवाही जानलेवा साबित होती है।

हादसे क्यों ज्यादा होते हैं?

विशेषज्ञों और ट्रैफिक पुलिस अधिकारियों के अनुसार, छोटी वैन से हादसे ज्यादा होने के प्रमुख कारण हैं:

  1. वाहन का हल्का वजन
    टक्कर या अचानक ब्रेक में वैन आसानी से पलट जाती है।

  2. स्पीड कंट्रोल की कमी
    अधिकतर वैन में स्पीड गवर्नर नहीं लगे होते।

  3. अनुभवहीन ड्राइवर
    कई जगह ड्राइवर के पास स्कूल वाहन चलाने का अनुभव या प्रशिक्षण नहीं होता।

  4. मेंटेनेंस की अनदेखी
    ब्रेक, टायर और सस्पेंशन की नियमित जांच नहीं होती।

नियम हैं, लेकिन पालन कौन कराए?

मोटर वाहन नियमों के अनुसार:

  • स्कूल वाहनों का पीला रंग

  • “School Van” का स्पष्ट बोर्ड

  • फिटनेस सर्टिफिकेट

  • ड्राइवर का पुलिस सत्यापन

  • ओवरलोडिंग पर सख्त कार्रवाई

ये सभी नियम कागज़ों में मौजूद हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनका पालन बेहद कमजोर है।

अभिभावकों की मजबूरी

कई अभिभावक जानते हैं कि छोटी वैन सुरक्षित नहीं है, फिर भी वे मजबूरी में बच्चों को इन्हीं वाहनों से भेजते हैं। कारण साफ है—

  • स्कूल बस की सुविधा नहीं

  • निजी विकल्प महंगे

  • प्रशासनिक निगरानी की कमी

बड़ा सवाल

हर हादसे के बाद जांच के आदेश होते हैं, नोटिस दिए जाते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है।

सवाल यह है—
क्या स्कूल प्रबंधन बच्चों की जान से समझौता करता रहेगा?
और क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा?

बच्चों की सुरक्षा किसी भी व्यवस्था से ऊपर होनी चाहिए।
वरना छोटी वैनों का यह चलन, किसी दिन बड़ी त्रासदी में बदल सकता है।