पीएम संसद से क्यों गायब रहे? ‘महिला सांसद हमला कर सकती थीं’ वाले बयान ने लोकतंत्र पर खड़े किए सवाल
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के उस बयान ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा कि विपक्ष की महिला सांसदों से संभावित हमले की खुफिया सूचना के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद नहीं आए। यह बयान न सिर्फ संसद की सुरक्षा व्यवस्था बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही और सत्ता के आत्मविश्वास पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
संसद, सुरक्षा और सियासत: असल कहानी क्या है?
जहाँ हर एक मिनट में देश का लाखों रुपया संसद पर खर्च होता है, जहाँ देश के सबसे बड़े फैसले लिए जाते हैं, वहीं अगर यह कहा जाए कि

“पीएम नरेंद्र मोदी संसद इसलिए नहीं आए क्योंकि विपक्ष की महिला सांसद उन पर हमला कर सकती थीं”
तो यह बयान हैरान करने वाला ही नहीं, शर्मनाक भी है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का यह कथन किसी चाय की दुकान की अफवाह नहीं है, बल्कि देश की सर्वोच्च विधायी संस्था से जुड़ा बयान है। सवाल उठता है—
अगर सच में ऐसा कोई “गुप्त खुफिया इनपुट” था, तो:
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क्या संसद भवन इतना असुरक्षित है?
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क्या सांसद अब लोकतांत्रिक प्रतिनिधि नहीं, संभावित हमलावर माने जा रहे हैं?
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और सबसे बड़ा सवाल—अगर प्रधानमंत्री संसद में सुरक्षित नहीं, तो आम नागरिक कहाँ सुरक्षित है?
56 इंच का सीना बनाम 3 महिला सांसद?

पिछले दस सालों में देश ने एक ही छवि देखी है—
“56 इंच का सीना, न डर, न झुकाव”
लेकिन आज सवाल यह है कि
क्या वही छवि तीन महिला सांसदों के नाम पर ढह गई?
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क्या यह मान लिया जाए कि लोकतांत्रिक विरोध अब “हमला” है?
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क्या सवाल पूछना, टोका-टाकी करना, नारे लगाना अब सुरक्षा खतरा बन गया है?
अगर ऐसा है, तो यह सिर्फ पीएम की सुरक्षा का मुद्दा नहीं, लोकतंत्र के सिकुड़ने का संकेत है।
संसद का अर्थ ही यही है—टकराव, सवाल, असहजता
संसद कोई पार्टी ऑफिस नहीं होती,
यह वह जगह है जहाँ:
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सरकार से तीखे सवाल होते हैं
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सत्ता असहज होती है
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और प्रधानमंत्री को जवाब देना पड़ता है
अगर असहज सवालों से बचने के लिए “सुरक्षा खतरे” का तर्क दिया जाएगा, तो कल को हर बहस को यही कहकर टाल दिया जाएगा।
महिला सांसदों को इस तरह पेश करना कितना खतरनाक?
महिला सांसद = संभावित हमलावर?
जब संसद के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति यह कहता है कि
“महिला सांसद हमला कर सकती थीं”
तो यह सिर्फ़ एक बयान नहीं होता, यह एक पूरी मानसिकता को वैधता देना होता है।
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महिला सांसद चुनी हुई जनप्रतिनिधि हैं
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वे सड़क से उठाकर लाई गई भीड़ नहीं
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उनके पास भी वही शपथ, वही संविधान, वही जिम्मेदारी है
उन्हें ख़तरे के प्रतीक की तरह पेश करना सीधा-सीधा:
महिला विरोधी
लोकतंत्र विरोधी
और संसद की गरिमा के ख़िलाफ़ है
अगर संसद में महिला सांसद ही “असुरक्षा” हैं…
तो फिर सवाल उठता है:
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संसद किसके लिए सुरक्षित है?
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क्या सत्ता से सवाल पूछना अब सिक्योरिटी थ्रेट बन गया है?
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क्या असहमति = हिंसा मान ली गई?
आज महिला सांसदों पर शक,
कल आम महिला प्रदर्शनकारी पर लाठी,
और परसों आम नागरिक पर “देशद्रोह”?
यह फिसलन भरा ढलान (slippery slope) है।
7 महिला सांसदों ने पीएम मोदी की कुर्सी घेरी
दरअसल, वर्षा गायकवाड़ के नेतृत्व में करीब 7 महिला सांसदों ने पीएम मोदी की कुर्सी घेर ली। एक बड़ा सा बैनर लेकर पीएम मोदी की कुर्सी को घेर लिया। वहीं वैल में खड़े कांग्रेस के बाकी सांसद प्लेकार्ड्स लहरा रहे थे। पीएम मोदी उस वक्त पार्लियामेंट में पहुंच चुके थे। अपने ऑफिस में बैठे थे। कांग्रेस के सांसदों की रणनीति थी कि जैसे ही मोदी सदन में आएं तो उन्हें अपनी सीट पर पहुंचने से रोका जाए। हालांकि उस समय स्पीकर की चेयर पर बैठी संध्या राय ने हंगामा करने वाले सांसदों को समझाने की कोशिश की। लेकिन हंगामा जारी रहा तो डेढ़ मिनट के भीतर ही संध्या राय ने लोकसभा की कार्यवाही कल तक के लिए स्थगित कर दी।

56 इंच का नैरेटिव और हक़ीक़त

सालों से कहा गया:
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मज़बूत नेता
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निडर प्रधानमंत्री
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लोहे की इच्छाशक्ति
तो फिर सवाल जायज़ है
तीन महिला सांसदों से डर?
अगर देश का प्रधानमंत्री:
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संसद में सवालों से बचता है
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विपक्ष से संवाद नहीं करता
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और सुरक्षा का बहाना लेकर अनुपस्थिति को正 ठहराया जाता है
तो यह ताक़त नहीं, असहजता का संकेत है।
महिला सांसदों की छवि का दीर्घकालिक नुकसान
इस तरह के बयान से:
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महिला नेताओं को “भावनात्मक, अस्थिर, ख़तरनाक” दिखाया जाता है
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राजनीति में महिलाओं की भागीदारी हतोत्साहित होती है
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समाज को गलत संदेश जाता है कि “महिला सत्ता में आई तो अराजकता होगी”
यह वही सोच है जो सदियों से कहती रही:
“औरतें सत्ता के लायक नहीं”
असली मुद्दा सुरक्षा नहीं, जवाबदेही है
अगर सच में खतरा था:
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FIR कहाँ है?
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इंटेलिजेंस इनपुट सार्वजनिक क्यों नहीं?
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महिला सांसदों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
क्योंकि सच यह है
खतरा शरीर को नहीं, सत्ता को था।
सवालों से, बहस से, जवाबदेही से।
महिला सांसदों को इस तरह पेश करना:
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लोकतंत्र को कमजोर करता है
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महिलाओं के सम्मान पर चोट करता है
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और सत्ता के डर को उजागर करता है
संसद बहस से चलती है,
डर से नहीं।
आज महिला सांसदों को खलनायक बताया गया,
कल आम जनता को बताया जाएगा।

इस बयान का एक और डरावना पहलू है—
महिला सांसदों को संभावित हमलावर के रूप में पेश करना।
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क्या यह महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को संदिग्ध बनाना नहीं है?
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क्या यह संकेत नहीं कि सत्ता आलोचना से इतनी असहज हो चुकी है कि उसे “खतरा” बता रही है?
यह सोच लोकतंत्र को नहीं, डर के माहौल को मजबूत करती है।
असल सवाल यही है
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क्या प्रधानमंत्री संसद से भाग रहे हैं या सवालों से?
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क्या सुरक्षा वाकई मुद्दा थी, या राजनीतिक जवाबदेही?
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और क्या देश को अब एक ऐसे लोकतंत्र की आदत डाल दी जा रही है जहाँ सत्ता सिर्फ मंचों पर बोले, संसद में नहीं?
यह बयान मामूली नहीं है
यह सिर्फ एक बयान नहीं,
यह स्वीकारोक्ति है कि सत्ता अब संसद से सहज नहीं है।
जहाँ हर मिनट जनता का पैसा जल रहा हो,
जहाँ जनता के सवालों का जवाब देना ज़िम्मेदारी हो—
वहाँ “कुछ भी हो सकता था” कहकर गैरहाज़िर रहना
शक्ति नहीं, कमजोरी दिखाता है।
आज सवाल 56 इंच के सीने का नहीं,
लोकतंत्र की रीढ़ का है।
और यह सवाल हर नागरिक को पूछना चाहिए।
Hindu Solanki 
