पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई निर्णायक मोड़ पर: खेजड़ी–ओरण मुद्दे पर तीसरे दिन भी अनशन, सरकार से कानून की मांग
खेजड़ी, ओरण और गोचर भूमि को कानूनी संरक्षण देने की मांग को लेकर पर्यावरण प्रेमियों का अनशन तीसरे दिन भी जारी है। मंत्री केके विश्नोई समेत कई जनप्रतिनिधि वार्ता के लिए महापड़ाव स्थल पहुंचे हैं। आंदोलनकारी केवल आश्वासन नहीं, ठोस कानून की मांग पर अड़े हैं।
पर्यावरण प्रेमियों का अनशन तीसरे दिन भी जारी, अब आर-पार के मूड में आंदोलनकारी
महापड़ाव स्थल पर चल रहा पर्यावरण प्रेमियों का अनशन तीसरे दिन भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। खेजड़ी, ओरण और गोचर भूमि से जुड़े मुद्दों को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब सरकार के लिए एक गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बनता जा रहा है। अनशनकारियों का साफ कहना है कि यह लड़ाई किसी एक फैसले या आश्वासन की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ी है।
क्या है पूरा मामला?
राजस्थान के कई इलाकों में बीते वर्षों में औद्योगिक परियोजनाओं, खनन, सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों के नाम पर खेजड़ी के पेड़ों, ओरण (देवभूमि) और गोचर भूमि को नुकसान पहुंचाया गया है। पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि:
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खेजड़ी जैसे संरक्षित और जीवनदायी पेड़ों की कटाई की जा रही है
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ओरण भूमि, जो धार्मिक और पारंपरिक रूप से संरक्षित मानी जाती है, उसे राजस्व भूमि मानकर उपयोग में लाया जा रहा है
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गोचर भूमि कम होने से पशुपालन और ग्रामीण आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है
इन्हीं मुद्दों को लेकर आंदोलनकारियों ने महापड़ाव लगाकर अनशन शुरू किया है।

क्यों नहीं मान रहे आंदोलनकारी?
अनशन पर बैठे पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले कई आंदोलनों में सरकारें केवल “जांच करेंगे”, “कमेटी बनाएंगे” और “संवेदनशील हैं” जैसे आश्वासन देकर मामला ठंडा कर देती हैं, लेकिन ज़मीनी हालात नहीं बदलते।
इसी वजह से इस बार आंदोलनकारियों ने साफ शब्दों में कहा है—
“हमें आश्वासन नहीं, कानून चाहिए।”
उनकी मांग है कि:
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खेजड़ी, ओरण और गोचर भूमि को कानूनी संरक्षण दिया जाए
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किसी भी परियोजना से पहले ग्रामसभा और स्थानीय समुदाय की सहमति अनिवार्य हो
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पुराने मामलों में हुई कटाई और अतिक्रमण की जवाबदेही तय हो
आज की वार्ता क्यों अहम?
तीसरे दिन आज आंदोलन ने एक अहम मोड़ लिया, जब मंत्री केके विश्नोई, जसवंत विश्नोई और विधायक पब्बाराम व बिहारीलाल महापड़ाव स्थल पर पहुंचे। सरकार और आंदोलनकारियों के बीच वार्ता प्रस्तावित है, जिसे लेकर उम्मीद जताई जा रही है कि कोई ठोस रास्ता निकल सकता है।
हालांकि आंदोलनकारी इस बातचीत को लेकर सतर्क हैं। उनका कहना है कि यह केवल “सुनने की औपचारिकता” नहीं होनी चाहिए, बल्कि सरकार को लिखित और कानूनी मसौदे के साथ बातचीत के लिए आना चाहिए।
सरकार के सामने असली परीक्षा
यह आंदोलन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि सरकार की नीयत और प्राथमिकताओं की भी परीक्षा है। एक ओर विकास परियोजनाओं का दबाव है, तो दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समाज की आस्था व आजीविका का सवाल।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर सरकार ने इस बार भी सिर्फ आश्वासन देकर आंदोलन खत्म कराने की कोशिश की, तो यह मामला और व्यापक रूप ले सकता है। वहीं अगर ठोस कानूनी पहल होती है, तो यह सरकार के लिए एक सकारात्मक और दूरगामी फैसला साबित हो सकता है।
आगे क्या?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि:
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सरकार वार्ता के लिए किस तरह का मसौदा लेकर पहुंचती है
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क्या अनशनकारियों की “कानून” वाली मांग पर सहमति बनती है
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या फिर यह आंदोलन और तेज होकर सड़क से सदन तक पहुंचेगा
फिलहाल महापड़ाव स्थल पर माहौल तनावपूर्ण लेकिन उम्मीद भरा है। तीसरे दिन की यह बातचीत तय करेगी कि यह आंदोलन संवाद से सुलझेगा या संघर्ष और लंबा चलेगा।
Hindu Solanki 
