4 पन्नों के सुसाइड नोट में पुलिस-SOG पर गंभीर आरोप - जयपुर में सस्पेंड लेक्चरर की आत्महत्या:
जयपुर के महेश नगर में सस्पेंड लेक्चरर मनोहर भादू ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली। चार पन्नों के सुसाइड नोट में उन्होंने पुलिस और SOG को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया। इस घटना ने सिस्टम और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जयपुर में सस्पेंड लेक्चरर की आत्महत्या: 4 पन्नों के सुसाइड नोट ने पुलिस-एसओजी पर खड़े किए गंभीर सवाल
जयपुर।
राजस्थान की राजधानी जयपुर से बुधवार शाम एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने न सिर्फ पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए, बल्कि पूरे सरकारी सिस्टम की संवेदनशीलता को भी कठघरे में ला खड़ा किया है। महेश नगर इलाके में सस्पेंड चल रहे लेक्चरर मनोहर भादू ने चलती ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली।
लेकिन यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं थी। मरने से पहले मनोहर भादू द्वारा लिखा गया चार पन्नों का सुसाइड नोट अब इस मामले को एक गंभीर संस्थागत सवाल में बदल चुका है।
“मैं मरा नहीं हूं, मेरी इरादतन हत्या की गई है”

सुसाइड नोट में मनोहर भादू ने बेहद कठोर शब्दों में पुलिस और एसओजी (स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप) पर आरोप लगाए हैं। उन्होंने लिखा—
“मैं मरा नहीं हूं, पुलिस नाम की चीज ने मेरी इरादतन हत्या कर डाली है।”
यह वाक्य सिर्फ एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस मानसिक दबाव की तस्वीर है, जिसमें वह लंबे समय से जी रहा था।
क्या था मनोहर भादू का संघर्ष?
परिजनों और सूत्रों के मुताबिक, मनोहर भादू पिछले काफी समय से एक मामले में जांच का सामना कर रहे थे, जिसके चलते उन्हें निलंबित कर दिया गया था।
आरोप है कि:
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उन्हें बार-बार पूछताछ के लिए बुलाया गया
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मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया
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सामाजिक और पेशेवर छवि को नुकसान पहुंचा
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और न्यायिक प्रक्रिया के बजाय दबाव की राजनीति हावी रही
मनोहर के करीबी लोगों का कहना है कि वह खुद को बेगुनाह बताते रहे, लेकिन सिस्टम के भीतर उनकी सुनवाई नहीं हुई।
4 पन्नों का सुसाइड नोट: सिस्टम के लिए चार्जशीट?
पुलिस को घटनास्थल से जो सुसाइड नोट मिला है, वह सिर्फ भावनात्मक दस्तावेज नहीं, बल्कि कई सवालों से भरी एक चार्जशीट की तरह देखा जा रहा है। नोट में:
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जांच एजेंसियों के व्यवहार पर सवाल
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मानसिक उत्पीड़न का जिक्र
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सम्मान और आत्मसम्मान टूटने की बात
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और न्याय न मिलने की पीड़ा
खुलकर सामने आई है।
सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं है
यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है—
क्या एक इंसान के लिए सब कुछ छोड़ देना इतना आसान होता है?
या फिर हालात ऐसे बना दिए जाते हैं कि उसके पास कोई विकल्प ही नहीं बचता?
अगर कोई पढ़ा-लिखा, शिक्षक जैसे जिम्मेदार पेशे से जुड़ा व्यक्ति इस हद तक टूट सकता है, तो आम आदमी की स्थिति क्या होगी?
सिस्टम की चुप्पी और जिम्मेदारी
अब तक पुलिस और एसओजी की ओर से औपचारिक बयान तो आया है, लेकिन सुसाइड नोट में लगाए गए आरोपों पर स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है।
सवाल यह भी है कि:
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क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच होगी?
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क्या जिन अधिकारियों पर आरोप लगे हैं, उन्हें जांच से अलग रखा जाएगा?
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या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
मनोहर भादू की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना है, जो जांच के नाम पर इंसान को तोड़ देता है, लेकिन जवाबदेही से बच निकलता है।
आज सवाल यह नहीं है कि मनोहर ने आत्महत्या क्यों की।
सवाल यह है कि क्या हमारा सिस्टम किसी इंसान को जीने लायक हालात देने में असफल हो गया है?
और अगर हां—
तो अगला मनोहर कौन होगा?
Hindu Solanki 
