खेजड़ी कटाई पर हरीश चौधरी का बड़ा सवाल: 30 हजार रुपये प्रति पेड़ किसे मिल रहे हैं? सरकार और कंपनियों की भूमिका पर संदेह

पश्चिमी राजस्थान में खेजड़ी कटाई को लेकर हरीश चौधरी ने बड़ा सवाल उठाया है। 30 हजार रुपये प्रति पेड़ का भुगतान किसे मिल रहा है? क्या निजी कंपनियां सरकार के संरक्षण में राज्य वृक्ष की बलि दे रही हैं? पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

खेजड़ी कटाई पर हरीश चौधरी का बड़ा सवाल: 30 हजार रुपये प्रति पेड़ किसे मिल रहे हैं? सरकार और कंपनियों की भूमिका पर संदेह

खेजड़ी कटाई पर हरीश चौधरी का सवाल: सच्चाई क्या है और शक क्यों गहराता है?

पश्चिमी राजस्थान में खेजड़ी की कटाई कोई नई घटना नहीं है, लेकिन जब  कांग्रेस नेता  हरीश चौधरी खुले मंच से यह कहें कि

“30 हजार रुपये प्रति पेड़ दिए जा रहे हैं, ये पैसा किनको मिल रहा है और कौन इस महापाप में शामिल है”
तो यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं रह जाता — यह सिस्टम पर सीधा आरोप बन जाता है।

क्या वाकई खेजड़ी काटी जा रही है?

हाँ, यह एक कड़वी सच्चाई है कि:

  • सौर ऊर्जा परियोजनाओं

  • पावर ट्रांसमिशन लाइन

  • औद्योगिक कॉरिडोर

  • निजी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट

के नाम पर पश्चिमी राजस्थान में खेजड़ी सहित अन्य स्थानीय पेड़ों की कटाई हुई है
कई मामलों में इसे “रीलोकेशन” या “अनुमति” का जामा पहनाया गया।

30 हजार रुपये प्रति पेड़ — हकीकत या राजनीतिक अतिशयोक्ति?

सरकारी नियमों के अनुसार:

  • पेड़ काटने पर कंपनसेशन/कम्पेन्सेटरी पेमेंट का प्रावधान होता है

  • यह राशि सीधे:

    • खातेदार किसान

    • भूमि स्वामी

    • या सरकारी खाते
      में जानी चाहिए

लेकिन सवाल यह है:

  • क्या पैसा वास्तव में किसान तक पहुंच रहा है?

  • क्या पंचायत, पटवारी, वन विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बिचौलिया सिस्टम बन गया है?

यहीं से संदेह जन्म लेता है।
क्योंकि ज़मीनी स्तर पर कई किसान कहते हैं:

“पेड़ हमारा था, जमीन हमारी थी, पर पैसा पूरा नहीं मिला।”

क्या निजी कंपनियां सरकार के साथ मिलकर ये सब कर रही हैं?

यह कहना कि “सरकार और कंपनियां मिलकर” काम कर रही हैं — आरोप है, फैसला नहीं।
लेकिन इतना तय है कि:

  • बिना सरकारी अनुमति कोई कंपनी एक भी पेड़ नहीं काट सकती

  • हर कटाई के पीछे प्रशासनिक मंजूरी होती है

  • वन विभाग की भूमिका निर्णायक होती है

इसलिए अगर बड़े पैमाने पर खेजड़ी कट रही है,
तो सवाल सरकार से ही उठेगा — चाहे सत्ता किसी की भी हो।

खेजड़ी सिर्फ पेड़ नहीं, पहचान है

खेजड़ी:

  • राजस्थान का राज्य वृक्ष है

  • बिश्नोई समाज की आस्था का केंद्र है

  • मरुस्थलीय पर्यावरण की रीढ़ है

  • पशुपालन और स्थानीय जीवन का आधार है

सिर्फ पैसों के लिए इसे काटना
आर्थिक सौदा नहीं, सांस्कृतिक अपराध माना जाएगा।

खेजड़ी का इतिहास: राजस्थान की आत्मा 

 मरुस्थल में जीवन का आधार

राजस्थान जैसे शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र में खेजड़ी (Prosopis cineraria) वह पेड़ है जिसने सदियों से रेगिस्तान को रहने लायक बनाया।
जहाँ पानी कम, बारिश अनिश्चित और ज़मीन बंजर हो — वहाँ खेजड़ी ने:

  • मिट्टी को बांधा

  • नमी को बचाया

  • खेती को सहारा दिया

  • पशुपालन को जीवित रखा

इसीलिए इसे मरुस्थल का “कल्पवृक्ष” कहा जाता है।

 प्राचीन ग्रंथों में खेजड़ी

खेजड़ी का उल्लेख वैदिक काल से मिलता है।
ऋग्वेद और आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसे “शमी वृक्ष” कहा गया है।

  • दशहरा पर शमी पूजन की परंपरा

  • पांडवों द्वारा शस्त्र छिपाने की कथा

  • युद्ध और विजय का प्रतीक

ये सभी खेजड़ी से जुड़े धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ हैं।

 खेजड़ी और बिश्नोई समाज का बलिदान

राजस्थान के इतिहास का सबसे गौरवशाली अध्याय 1730 का खेजड़ली कांड है।

  • स्थान: खेजड़ली गांव, जोधपुर

  • 363 बिश्नोई पुरुष-महिलाओं-बच्चों ने

  • खेजड़ी बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए

अमर वाक्य:

“सिर साटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण”
(पेड़ बचे तो सिर कटना भी सस्ता है)

यह विश्व का पहला पर्यावरण आंदोलन माना जाता है —
चिपको आंदोलन से 200 साल पहले।

 खेती, पशु और रोज़मर्रा का जीवन

खेजड़ी सिर्फ खड़ी रहने वाला पेड़ नहीं है, यह काम करने वाला पेड़ है।

  • सांगरी: राजस्थान का पारंपरिक सुपरफूड

  • पत्तियाँ: पशुओं का पौष्टिक चारा

  • छाया: गर्मी में जीवनदान

  • लकड़ी: सीमित उपयोग, पर कभी अंधाधुंध कटाई नहीं

किसान खेत में खेजड़ी को काटता नहीं, पालता है

 पर्यावरणीय महत्व

वैज्ञानिक रूप से भी खेजड़ी अनमोल है:

  • नाइट्रोजन फिक्स करता है → मिट्टी उपजाऊ

  • रेगिस्तानी तूफानों को रोकता है

  • जलवायु संतुलन बनाए रखता है

  • सूखे में भी हरा रहने वाला वृक्ष

इसीलिए 1983 में राजस्थान सरकार ने इसे राज्य वृक्ष घोषित किया।

 आज खतरे में पहचान

आज वही खेजड़ी:

  • सड़क, बिजली, सोलर और खनन परियोजनाओं की भेंट

  • निजी कंपनियों के “मुआवज़ा मॉडल” के तहत कट रही

  • कानून की ढील और निगरानी की कमी से गायब हो रही

यह सिर्फ पेड़ की कटाई नहीं,
राजस्थान की पहचान पर कुल्हाड़ी है।

 सवाल जो इतिहास पूछता है

  • जिस पेड़ के लिए लोग मर गए, क्या उसे पैसों में तौला जा सकता है?

  • विकास जरूरी है, पर क्या बिना खेजड़ी के राजस्थान बचेगा?

  • सरकार राज्य वृक्ष की रक्षा नहीं करेगी तो कौन करेगा?

खेजड़ी अतीत है, वर्तमान है और भविष्य भी।
अगर खेजड़ी खत्म हुई, तो
राजस्थान सिर्फ नक्शे में बचेगा —
संस्कृति, खेती और पहचान में नहीं।

भाजपा सरकार पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

क्योंकि:

  • सरकार की ओर से स्पष्ट आंकड़े सामने नहीं आए

  • किस जिले में कितनी खेजड़ी कटी — सार्वजनिक रिपोर्ट नहीं

  • कितनी कंपनियों को अनुमति मिली — पारदर्शिता नहीं

  • पैसा किसे मिला — कोई ऑडिट नहीं

इसी चुप्पी से सवाल पैदा होता है:

क्या सरकार नींद में है?
या सत्ता के नशे में यह सब “विकास” मानकर अनदेखा किया जा रहा है?

सवाल जायज़ हैं, जवाब ज़रूरी हैं

यह कहना कि सब कुछ फर्जी है — गलत होगा।
यह कहना कि सब कुछ ठीक है — उससे भी बड़ा झूठ होगा।

सच शायद बीच में है:

  • कहीं नियमों का पालन हुआ

  • कहीं आंख मूंद ली गई

  • और कहीं पैसों का खेल चला

अब ज़रूरत है:

  • स्वतंत्र जांच की

  • जिलेवार कटाई रिपोर्ट की

  • कम्पनसेशन का सार्वजनिक ऑडिट

  • और दोषियों पर कार्रवाई की

क्योंकि अगर खेजड़ी बची नहीं,
तो आने वाली पीढ़ी यह नहीं पूछेगी कि
“किसकी सरकार थी”
बल्कि पूछेगी —
“तुम सब चुप क्यों थे?”