3 महीने में 4 करोड़ दर्शक, बॉक्स ऑफिस पर ‘चांदी ही चांदी’ — लेकिन क्या यही देश की प्राथमिकता है? भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य पर बहस क्यों ज़रूरी?
भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, निजी शिक्षा का महंगा होता बोझ और अस्पतालों में इलाज का बढ़ता खर्च आम आदमी की रीढ़ तोड़ रहा है। यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे स्कूल और अस्पताल सिस्टम की नाकामी देश के भविष्य पर सीधा असर डाल रही है और क्यों यह मुद्दा चुनावी बहस से गायब होता जा रहा है।
3 महीने में 4 करोड़ दर्शक, बॉक्स ऑफिस पर ‘चांदी ही चांदी’ — लेकिन क्या यही देश की प्राथमिकता है?
पिछले तीन महीनों में सिनेमाघरों तक पहुंचे करीब 4 करोड़ दर्शकों ने बॉलीवुड के चेहरे पर फिर से रौनक लौटा दी है। कोविड के बाद जिस इंडस्ट्री को “डूबती नाव” कहा जा रहा था, वही इंडस्ट्री आज टिकट खिड़की पर लंबी कतारों और हाउसफुल बोर्ड के साथ खड़ी दिख रही है। मल्टीप्लेक्स हों या सिंगल स्क्रीन, बड़े बजट की कुछ फिल्मों ने ऐसा माहौल बनाया कि ट्रेड एनालिस्ट इसे “बॉलीवुड की नई चांदी” कह रहे हैं।
लेकिन इस चमक के पीछे कुछ असहज सवाल भी खड़े हैं—
क्या जनता वाकई इतनी ‘फ्री’ है कि हर कुछ हफ्तों में सिनेमाघरों में उमड़ पड़े?
या फिर सिर्फ वही फिल्में चल रही हैं, जिनका नैरेटिव सत्ता, राजनीति या किसी खास विचारधारा के इर्द-गिर्द बुना गया है?

आंकड़े क्या कहते हैं
फिल्म ट्रेड से जुड़े जानकारों के मुताबिक, इस साल की शुरुआत में रिलीज़ हुई गिनी-चुनी फिल्मों ने:
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पहले 90 दिनों में करोड़ों टिकट बिकवाए
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थिएटर ऑक्युपेंसी को 40–60% तक पहुंचाया
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ओटीटी के दौर में भी बड़े पर्दे की वापसी का दावा मजबूत किया
लेकिन इसी दौरान दर्जनों छोटी, सामाजिक, प्रयोगात्मक या गैर-राजनीतिक फिल्में या तो:
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चुपचाप रिलीज़ हुईं
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या पहले हफ्ते में ही सिनेमाघरों से गायब हो गईं
यानी दर्शक बढ़े हैं, लेकिन विकल्प नहीं।
क्या हर फिल्म चल रही है? जवाब—नहीं
यह कहना गलत होगा कि बॉलीवुड की हर फिल्म कमाल कर रही है। हकीकत यह है कि:
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सिर्फ वही फिल्में चल रही हैं, जिनके साथ एक तेज़ नैरेटिव जुड़ा है
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जिनमें देशभक्ति, राजनीति, सत्ता से टकराव या किसी “सच को उजागर करने” का दावा हो
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जिनका प्रचार विवाद, बहस और सोशल मीडिया ट्रेंड से गर्माया गया हो
इसके उलट:
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बेरोज़गारी
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महंगाई
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किसानों, युवाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर बनी फिल्में
दर्शकों को खींचने में नाकाम रहीं।
सवाल जनता से भी है
यह सवाल सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री से नहीं, दर्शकों से भी है।
जब देश में:
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युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हों
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पढ़े-लिखे लोग प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक से परेशान हों
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किसान कर्ज और मौसम से जूझ रहा हो
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शहरों में महंगाई रिकॉर्ड तोड़ रही हो

तो क्या हमारी सामूहिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा
सिर्फ सिनेमाघरों में ताली बजाने और सीटियां मारने में खर्च हो जाना चाहिए?
यहां मुद्दा फिल्म देखने का नहीं है—
मुद्दा है चयन का।
सिनेमा: आईना या ध्यान भटकाने का जरिया?
इतिहास गवाह है कि सिनेमा:
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समाज का आईना भी रहा है
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और कई बार सत्ता के लिए सबसे आसान ध्यान-भटकाने का साधन भी
जब दर्शक:
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कठिन सवालों से बचकर
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तैयार नैरेटिव वाली कहानियों में शरण लेने लगते हैं
तो असली मुद्दे पर्दे के बाहर ही छूट जाते हैं।
तो देश आगे कैसे बढ़ेगा?
देश आगे तब बढ़ेगा जब:
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नागरिक मनोरंजन और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए
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सिनेमा सिर्फ भावनाएं न भड़काए, सवाल भी उठाए
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दर्शक हर हिट को “सच” और हर फ्लॉप को “बेकार” मानना बंद करें
फिल्में देखना गलत नहीं,
लेकिन सिर्फ वही देखना, जो हमें सोचने से रोक दे—खतरनाक ज़रूर है।
आख़िरी सवाल
अगर 3 महीने में 4 करोड़ लोग सिनेमा देखने निकल सकते हैं,
तो क्या उतनी ही ताकत से वे:
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बेरोज़गारी पर सवाल पूछ सकते हैं?
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शिक्षा और स्वास्थ्य पर बहस कर सकते हैं?
बॉलीवुड की चांदी चमक रही है, इसमें शक नहीं।
लेकिन क्या इस चमक में हम अपने असली मुद्दे खो तो नहीं रहे?
यही सवाल आज सबसे ज़रूरी है।

भारत में अगर कोई समस्या चुपचाप हर घर में घुस चुकी है, हर युवा के सपनों को कुतर रही है और फिर भी चुनावी नारों, टीवी डिबेट और सोशल मीडिया ट्रेंड्स में पीछे धकेल दी जाती है—तो वह है बेरोज़गारी।
यह कोई आंकड़ों का खेल भर नहीं है,
यह पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।
पढ़ाई पूरी, भविष्य अधूरा
आज का भारतीय युवा पहले से ज़्यादा पढ़ा-लिखा है।
डिग्रियां हैं, कोर्स हैं, स्किल्स हैं—
लेकिन नौकरी नहीं है।
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इंजीनियर चपरासी की भर्ती भर रहे हैं
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पोस्ट ग्रेजुएट डेटा एंट्री की तलाश में हैं
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पीएचडी धारक गेस्ट फैकल्टी या कॉन्ट्रैक्ट पर जूझ रहे हैं
यह सिर्फ “जॉब नहीं मिली” की कहानी नहीं,
यह सम्मान, आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य के टूटने की कहानी है।
प्रतियोगी परीक्षाएं या किस्मत की परीक्षा?
सरकारी नौकरी आज भी करोड़ों युवाओं का सपना है,
लेकिन हकीकत यह है कि:
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एक सीट पर लाखों आवेदन
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पेपर लीक
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रिजल्ट में देरी
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भर्ती रद्द
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और सालों तक अदालतों में लटके मामले
एक युवा 22 की उम्र में तैयारी शुरू करता है,
30 का होते-होते भी “अगली वैकेंसी” का इंतज़ार करता रह जाता है।
इस दौरान उसकी ज़िंदगी रुक जाती है।

निजी सेक्टर: अस्थायी नौकरी, स्थायी डर
निजी सेक्टर को अक्सर समाधान बताया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि:
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कॉन्ट्रैक्ट जॉब्स बढ़ रही हैं
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जॉब सिक्योरिटी घट रही है
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10–12 घंटे काम, लेकिन वेतन सीमित
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छंटनी (Layoff) अब सामान्य शब्द बन चुका है
आज नौकरी मिलना उतना मुश्किल नहीं,
जितना नौकरी बचा पाना।
गांव से शहर तक—बेरोज़गारी का दायरा
यह समस्या सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं:
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गांवों में खेती से आमदनी घट रही है
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मनरेगा जैसे विकल्प जीवनरेखा बने हुए हैं वो बंद ही रहते है हर समय
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शहरों में माइग्रेशन बढ़ रहा है, लेकिन काम उतना नहीं, न लोगो के पास कोई स्किल
नतीजा—
शहरों में झुग्गियां बढ़ती हैं,
गांवों में खाली हाथ लौटते युवा।

मानसिक स्वास्थ्य: अनदेखा असर
बेरोज़गारी का सबसे खतरनाक पहलू है इसका मानसिक असर:
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डिप्रेशन
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आत्मग्लानि
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पारिवारिक दबाव
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आत्महत्या के मामले
लेकिन इस पर न तो गंभीर बहस होती है,
न ही इसे “राष्ट्रीय संकट” की तरह ट्रीट किया जाता है।
सवाल वही है…
जब करोड़ों लोग:
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फिल्मों की रिलीज़ डेट जानते हैं
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बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर बहस करते हैं
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ट्रेंडिंग नैरेटिव में डूब जाते हैं
तो क्या वही ऊर्जा:
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बेरोज़गारी पर सवाल पूछने में लग सकती है?
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नीति, शिक्षा, उद्योग और रोजगार मॉडल पर चर्चा में लग सकती है?
बेरोज़गारी सिर्फ युवाओं की नहीं, देश की समस्या है
क्योंकि बेरोज़गार युवा मतलब:
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कमजोर अर्थव्यवस्था
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बढ़ती असमानता
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सामाजिक असंतोष
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और भविष्य में अस्थिरता
अगर आज सवाल नहीं पूछे गए,
तो कल कीमत बहुत भारी होगी।
आख़िरी बात
बेरोज़गारी कोई साइड इश्यू नहीं है।
यह भारत का सबसे बड़ा मेन इश्यू है।
सवाल यह नहीं कि
“क्या बेरोज़गारी है?”
शिक्षा और स्वास्थ्य पर बहस कर सकते हैं?
भारत में स्कूल-अस्पतालों का गिरता स्तर — एक बड़ा, असहज सवाल

भारत अगर सच में “विश्वगुरु” बनने का सपना देख रहा है, तो सबसे पहले उसे दो बुनियादी स्तंभों की हालत देखनी होगी—शिक्षा और स्वास्थ्य।
क्योंकि जिस देश के स्कूल कमजोर हों और अस्पताल मजबूर हों, वहां तरक्की के दावे सिर्फ पोस्टर और भाषण बनकर रह जाते हैं।
यह बहस जरूरी है।
और हां, अब टाली नहीं जा सकती।
शिक्षा: डिग्रियां बढ़ीं, सीख घटती गई
आज भारत में स्कूल और कॉलेजों की संख्या पहले से कहीं ज्यादा है, लेकिन सवाल ये है—
क्या शिक्षा की गुणवत्ता भी उतनी ही बेहतर हुई?
सरकारी स्कूलों की हालत
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कई स्कूलों में शिक्षक कम, छात्र ज्यादा
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एक ही शिक्षक कई कक्षाएं संभालता है
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लैब, लाइब्रेरी और खेल मैदान सिर्फ कागज़ों में
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डिजिटल शिक्षा की बातें, लेकिन गांवों में इंटरनेट और बिजली तक नहीं

नतीजा—
गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चे शुरुआत से ही पिछड़ जाते हैं।
निजी स्कूल: शिक्षा या बिज़नेस?
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भारी फीस
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किताब, यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट सब महंगा
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माता-पिता EMI में पढ़ाई करवा रहे हैं
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लेकिन पढ़ाई का स्तर अक्सर “रट्टा सिस्टम” तक सीमित
यह शिक्षा नहीं,
मार्क्स और रैंक की फैक्ट्री बनती जा रही है।
उच्च शिक्षा का संकट
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कॉलेजों में कोर्स पुराने
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इंडस्ट्री से कोई तालमेल नहीं
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डिग्री मिलती है, स्किल नहीं
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इसी कारण पढ़ा-लिखा युवा बेरोज़गार घूम रहा है
आज सवाल यह नहीं कि बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं,
सवाल यह है कि क्या वे काम के लायक बन रहे हैं?

स्वास्थ्य: इलाज महंगा, भरोसा सस्ता
अब बात करें अस्पतालों की—
जहां इंसान सबसे ज्यादा असहाय होता है।
सरकारी अस्पताल
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मरीजों की भीड़
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डॉक्टर और नर्स की कमी
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दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ती हैं
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बेड, मशीन, टेस्ट—सबकी कमी
गरीब आदमी इलाज के लिए आता है,
लेकिन लाइन में खड़े-खड़े ही थक जाता है।
निजी अस्पताल: इलाज या लूट?
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ICU का बिल सुनते ही परिवार घबरा जाता है
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बिना पूछे महंगे टेस्ट
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बीमा है तो और ज्यादा खर्च
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डॉक्टर पर भरोसा कम, सिस्टम पर शक ज्यादा
इलाज अब ज़रूरत नहीं,
लक्ज़री बनता जा रहा है।
स्वास्थ्य सिर्फ शरीर नहीं होता
मानसिक स्वास्थ्य आज सबसे बड़ा अनदेखा संकट है:
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डिप्रेशन
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एंग्जायटी
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आत्महत्या के बढ़ते मामले
लेकिन:
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सरकारी अस्पतालों में काउंसलर नहीं
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स्कूलों में मेंटल हेल्थ पर बात नहीं
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समाज में इसे “कमजोरी” समझा जाता है
बड़ा सवाल यही है
जब:
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शिक्षा कमजोर होती है
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स्वास्थ्य महंगा होता है
तो आम आदमी क्या करे?
और देश कैसे आगे बढ़े?
क्या:
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मंदिर-मस्जिद
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फिल्मों का बॉक्स ऑफिस
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टीवी डिबेट की चीख-चिल्लाहट
इनसे ज्यादा ज़रूरी नहीं है:
स्कूल में पढ़ाई और अस्पताल में इलाज?
शिक्षा और स्वास्थ्य: चुनावी मुद्दा क्यों नहीं?
हर सरकार कहती है—
“हमने बहुत काम किया है।”
लेकिन ज़मीनी हकीकत कहती है—
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स्कूलों में शिक्षक खाली पद
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अस्पतालों में स्ट्रेचर पर इलाज
तो सवाल उठाना अपराध क्यों बन गया?
आख़िरी बात
शिक्षा और स्वास्थ्य कोई सुविधा नहीं,
संवैधानिक अधिकार हैं।
अगर हम इन पर सवाल नहीं पूछेंगे,
तो आने वाली पीढ़ियां हमसे सवाल पूछेंगी।
अब बहस जरूरी है।
अब सवाल जरूरी हैं।
क्योंकि यह मुद्दा किसी पार्टी का नहीं—देश का है।
Hindu Solanki 
