भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर संसद के बाहर विपक्ष का हंगामा, किसानों के भारत बंद को समर्थन

भारत-अमेरिका संभावित व्यापार समझौते के खिलाफ कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने संसद भवन के मकर द्वार के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। किसान संगठनों द्वारा बुलाए गए भारत बंद को भी विपक्ष का समर्थन मिला। विपक्ष का आरोप है कि प्रस्तावित ट्रेड डील से किसानों, छोटे उद्योगों और भारत की ऊर्जा नीति पर असर पड़ सकता है। वहीं सरकार का कहना है कि कोई भी निर्णय राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा। इस मुद्दे ने संसद से सड़क तक सियासी बहस तेज कर दी है।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर संसद के बाहर विपक्ष का हंगामा, किसानों के भारत बंद को समर्थन

नई दिल्ली 

भारत-अमेरिका संभावित व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने संसद भवन परिसर में मकर द्वार के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। उनका आरोप है कि प्रस्तावित समझौते से देश के किसानों, छोटे उद्योगों और तेल आयात नीति पर असर पड़ सकता है। इसी मुद्दे पर किसान संगठनों ने “भारत बंद” का आह्वान किया, जिसे विपक्षी दलों ने समर्थन दिया।

विपक्ष का कहना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में देश के दीर्घकालिक हित सर्वोपरि होने चाहिए। प्रदर्शन के दौरान कई नेताओं ने सवाल उठाया कि क्या भारत की ऊर्जा और व्यापार नीतियां बाहरी दबाव में तय होंगी? कुछ नेताओं ने तीखा बयान देते हुए कहा—“देश आज़ाद इसलिए नहीं हुआ था कि कोई बाहरी ताकत तय करे कि हम किस देश से तेल खरीदें और किससे नहीं।”

हालांकि, सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से कोई समझौता नहीं करेगा और हर निर्णय राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा। सरकार का तर्क है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के दौर में बड़े व्यापारिक समझौते निवेश, निर्यात और तकनीकी सहयोग बढ़ाने के लिए जरूरी होते हैं।

विरोध के मुख्य बिंदु

विपक्ष और किसान संगठनों की आपत्तियां तीन प्रमुख मुद्दों पर केंद्रित हैं:

  1. कृषि क्षेत्र पर असर – आशंका जताई जा रही है कि यदि अमेरिकी कृषि उत्पादों को अधिक पहुंच दी गई तो भारतीय किसानों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।

  2. तेल आयात नीति – कुछ नेताओं का कहना है कि भारत की ऊर्जा खरीद नीति स्वतंत्र होनी चाहिए और किसी एक देश के दबाव में बदलाव नहीं होना चाहिए।

  3. छोटे उद्योगों पर प्रभाव – MSME क्षेत्र को लेकर भी चिंता जताई जा रही है कि सस्ती विदेशी वस्तुओं से घरेलू उद्योग प्रभावित हो सकते हैं।

किसान संगठनों ने बंद के समर्थन में कई राज्यों में धरना-प्रदर्शन किए। हालांकि, बंद का असर क्षेत्रवार अलग-अलग रहा। कुछ जगह बाजार आंशिक रूप से बंद रहे, तो कई शहरों में सामान्य गतिविधियां जारी रहीं।

सरकार का पक्ष

सरकार के प्रवक्ताओं ने कहा कि अभी किसी अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं और वार्ताएं जारी हैं। उनका कहना है कि भारत पहले भी कई देशों के साथ व्यापार समझौते कर चुका है और हर बार राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी गई है।

ऊर्जा नीति पर सरकार का स्पष्ट रुख रहा है कि भारत विविध स्रोतों से तेल खरीदता है ताकि कीमतों और आपूर्ति में संतुलन बना रहे। अधिकारियों का कहना है कि वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों में संतुलित कूटनीति और आर्थिक साझेदारी दोनों जरूरी हैं।

क्या है बड़ा सवाल?

इस पूरे विवाद के बीच असली प्रश्न यह है कि वैश्विक व्यापार और रणनीतिक साझेदारी के दौर में भारत अपनी स्वायत्तता कैसे बनाए रखे? क्या बड़े देशों के साथ समझौते आर्थिक मजबूती का रास्ता हैं, या वे घरेलू हितों को चुनौती दे सकते हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी ट्रेड डील का मूल्यांकन केवल राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि आर्थिक आंकड़ों और दीर्घकालिक लाभ-हानि के आधार पर होना चाहिए। समझौते में यदि किसानों और छोटे उद्योगों के लिए सुरक्षा प्रावधान शामिल हों, तो जोखिम कम किया जा सकता है।

विपक्ष ने मांग की है कि प्रस्तावित समझौते के सभी बिंदुओं को संसद में रखा जाए और व्यापक चर्चा कराई जाए। किसान संगठन भी पारदर्शिता और लिखित आश्वासन चाहते हैं।

सरकार की ओर से संकेत है कि बातचीत जारी रहेगी और अंतिम निर्णय व्यापक हितों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा।

सवाल अभी भी बहस का विषय है—क्या यह समझौता भारत की आर्थिक ताकत बढ़ाएगा या घरेलू क्षेत्रों पर दबाव डालेगा? इसका जवाब आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा, जब वार्ताओं का ठोस खाका सामने आएगा।