राजनीति और जनता का बँटवारा: वैचारिक संघर्ष से व्यक्तिगत विद्वेष तक - कार्यकर्ता क्यों लड़ते-मरते हैं?
राजनीति में वैचारिक संघर्ष की जगह व्यक्तिगत विद्वेष ने ले ली है। धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर जनता का बँटवारा और कार्यकर्ताओं की त्रासदी - जानिए पूरा सच।
राजनीति और जनता का बँटवारा: वैचारिक संघर्ष से व्यक्तिगत विद्वेष तक का सफर
भूमिका: कार्यकर्ता क्यों लड़ते-मरते हैं?
राजनीति का असली मतलब क्या है? क्या यह सिर्फ सत्ता हासिल करने का खेल है, या समाज को दिशा देने का माध्यम? क्या नेताओं के बीच की लड़ाई सिद्धांतों की है, या सिर्फ कुर्सी की? और सबसे बड़ा सवाल—जब नेता आपस में लड़ते हैं, तो उनके कार्यकर्ता क्यों खून बहाते हैं?
आज की राजनीति में एक खतरनाक प्रवृत्ति बढ़ी है: वैचारिक मतभेदों की जगह व्यक्तिगत विद्वेष ने ले ली है। नेताओं के अहंकार की लड़ाई में साधारण कार्यकर्ता पिस रहे हैं, और जनता—जिसके नाम पर यह सब हो रहा है—वह सबसे बड़ी कीमत चुका रही है।
यह लेख उसी बँटवारे की कहानी है। उस राजनीति की, जो कभी समाज को जोड़ने का साधन थी, आज समाज को तोड़ने का हथियार बन चुकी है।
राजनीति का मूल उद्देश्य: विचारधारा या सत्ता?

आदर्श राजनीति क्या होती है?
राजनीति का आदर्श स्वरूप विचारों का संघर्ष है। एक पक्ष कहता है—"समाज में समानता होनी चाहिए, सरकार को गरीबों की मदद करनी चाहिए।" दूसरा पक्ष कहता है—"बाज़ार को खुला छोड़ दो, व्यक्तिगत स्वतंत्रता ही विकास की कुंजी है।"
यह स्वस्थ बहस है। यह जनता को विकल्प देती है। लोग सोचते हैं, समझते हैं, और फिर चुनाव करते हैं।
लेकिन आज की राजनीति इससे कोसों दूर है।
वर्तमान राजनीति: व्यक्ति पूजा और अहंकार का खेल
आज की राजनीति में:
-
विचारधाराएँ धुंधली हो चुकी हैं
-
नेताओं की व्यक्तिगत छवि सब कुछ है
-
पार्टियाँ परिवारों की जागीर बन गई हैं
-
विरोधी को दुश्मन माना जाता है, प्रतिद्वंद्वी नहीं
कांग्रेस हो या बीजेपी, सपा हो या बसपा, टीएमसी हो या डीएमके—हर पार्टी का एक चेहरा, एक परिवार, एक सुप्रीमो। विचारधारा कहीं खो गई है। जो बचा है, वह है व्यक्ति की महिमा और विरोधियों के प्रति नफरत।
जनता का बँटवारा: धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर
विभाजन की राजनीति: सबसे आसान हथियार
जब विचारधारा कमजोर हो, तो राजनीति को टिकाए रखने के लिए जनता को बाँटना सबसे आसान तरीका है।
भारतीय राजनीति में बँटवारे के मुख्य आधार:
1. धर्म के नाम पर
-
हिंदू बनाम मुसलमान
-
मंदिर-मस्जिद विवाद
-
"वोट बैंक" की राजनीति
-
धार्मिक भावनाओं को भड़काना
नतीजा: समाज में नफरत, दंगे, हिंसा। और नेता? चुनाव जीतकर आराम से सत्ता में।
2. जाति के नाम पर
-
ओबीसी, दलित, सवर्ण, आदिवासी—हर कोई अलग खेमे में
-
आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक हथियार
-
जातिगत गठबंधन और समीकरण
-
"जाति की गणित" में विकास गायब
नतीजा: जाति की दीवारें और ऊँची होती गईं। आपसी नफरत बढ़ती गई।
3. क्षेत्रीयता के नाम पर
-
उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत
-
शहरी बनाम ग्रामीण
-
भाषा के नाम पर टकराव
-
राज्यों के बीच संसाधनों की खींचतान
नतीजा: राष्ट्रीय एकता कमजोर, क्षेत्रवाद मजबूत।
4. आर्थिक वर्ग के नाम पर
-
अमीर बनाम गरीब
-
"लखपति बनाम करोड़पति" की बहस
-
किसान बनाम उद्योगपति
-
मजदूर बनाम पूँजीपति
नतीजा: वर्ग संघर्ष को हवा दी जाती है, लेकिन असली आर्थिक सुधार नहीं होते।
बँटवारे की असली वजह: सत्ता की भूख

यह सब जानबूझकर किया जाता है। क्योंकि:
-
एकजुट जनता खतरनाक होती है—वह सवाल पूछती है
-
बँटी हुई जनता कमजोर होती है—वह सिर्फ अपनी पहचान की लड़ाई लड़ती है
-
विभाजन से वोट मिलते हैं, विकास से नहीं
इसीलिए चुनाव के समय मंदिर-मस्जिद, जाति की गणित, और धार्मिक नारे गूँजते हैं। विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य की बात गायब हो जाती है।
कार्यकर्ता: राजनीति के सबसे बड़े शिकार
कार्यकर्ता कौन हैं?
कार्यकर्ता वे लोग हैं जो:
-
पार्टी के लिए जान लगा देते हैं
-
चुनाव में घर-घर जाकर वोट माँगते हैं
-
रैलियों में भीड़ जुटाते हैं
-
नेता के एक इशारे पर धरने-प्रदर्शन करते हैं
-
कभी-कभी विरोधियों से हाथापाई में घायल या मारे जाते हैं
लेकिन बदले में उन्हें क्या मिलता है?
-
न नौकरी, न पैसा, न सम्मान
-
सिर्फ भावनात्मक लगाव और "पार्टी का सिपाही" होने का गर्व
व्यक्तिगत विद्वेष में फँसे कार्यकर्ता
जब दो नेताओं के बीच व्यक्तिगत दुश्मनी होती है, तो:
-
उनके कार्यकर्ता एक-दूसरे को दुश्मन मानने लगते हैं
-
गली-मोहल्ले में मारपीट होती है
-
सोशल मीडिया पर गाली-गलौज
-
कभी-कभी हत्याएँ तक हो जाती हैं
उदाहरण:
-
बंगाल में TMC बनाम BJP के बीच कार्यकर्ताओं की हत्याएँ
-
उत्तर प्रदेश में सपा बनाम बसपा के कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें
-
केरल में CPM बनाम RSS के बीच राजनीतिक हिंसा
सवाल यह है: क्या ये कार्यकर्ता जानते हैं कि वे किस बात के लिए लड़ रहे हैं? क्या उन्हें पता है कि उनकी पार्टी की विचारधारा क्या है?
ज्यादातर मामलों में—नहीं। वे सिर्फ इसलिए लड़ते हैं क्योंकि उनके नेता ने कहा।
नेताओं की दोस्ती, कार्यकर्ताओं की दुश्मनी
सबसे दर्दनाक यह है कि:
-
कल तक जो नेता एक-दूसरे को "गद्दार, भ्रष्ट, देशद्रोही" कह रहे थे
-
आज गठबंधन बनाकर एक मंच पर खड़े हैं
-
लेकिन कार्यकर्ताओं के बीच दुश्मनी बनी रहती है
उदाहरण:
-
नीतीश कुमार और लालू प्रसाद—कभी साथ, कभी अलग
-
शिवसेना और बीजेपी—50 साल की दोस्ती, फिर दुश्मनी, फिर से साथ
-
कांग्रेस और NCP—महाराष्ट्र में कभी साथ, कभी अलग
नेता तो सत्ता के लिए समझौता कर लेते हैं, लेकिन जमीन पर कार्यकर्ता एक-दूसरे का खून बहाते रहते हैं।
वैचारिक संघर्ष बनाम व्यक्तिगत विद्वेष: फर्क समझना जरूरी
वैचारिक संघर्ष क्या है?

वैचारिक संघर्ष का मतलब है:
-
दो अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक दर्शन के बीच की लड़ाई
-
एक पक्ष समाजवाद में विश्वास करता है, दूसरा पूँजीवाद में
-
एक पक्ष धर्मनिरपेक्षता चाहता है, दूसरा धार्मिक पहचान चाहता है
-
यह बहस विचारों की होती है, व्यक्तियों की नहीं
स्वस्थ वैचारिक संघर्ष के फायदे:
-
जनता को विकल्प मिलते हैं
-
बहस से नई सोच पैदा होती है
-
लोकतंत्र मजबूत होता है
-
नीतियों में सुधार होता है
व्यक्तिगत विद्वेष क्या है?
व्यक्तिगत विद्वेष का मतलब है:
-
"मैं उससे नफरत करता हूँ क्योंकि वह मेरा विरोधी है"
-
व्यक्तित्व पर हमला, विचारों पर नहीं
-
"वह भ्रष्ट है, मैं ईमानदार हूँ" जैसे दावे
-
अहंकार, ईर्ष्या, प्रतिशोध की भावना
व्यक्तिगत विद्वेष के नुकसान:
-
राजनीति कीचड़ उछालने में बदल जाती है
-
मुद्दे गायब हो जाते हैं
-
कार्यकर्ता भावनात्मक रूप से भड़काए जाते हैं
-
समाज में नफरत और हिंसा बढ़ती है
आज की राजनीति में कौन सा संघर्ष है?
दुर्भाग्य से, आज भारत की राजनीति में व्यक्तिगत विद्वेष हावी है। विचारधाराओं की लड़ाई लगभग खत्म हो चुकी है।
उदाहरण:
-
मोदी बनाम राहुल—यह व्यक्तिगत टकराव बन गया है, विचारों का संघर्ष नहीं
-
ममता बनाम अमित शाह—बंगाल में यह सत्ता की लड़ाई है, जनता की भलाई की नहीं
-
अखिलेश बनाम मायावती—दोनों के बीच जातीय समीकरण है, विकास का एजेंडा नहीं
राजनीति के शिकार
जनता को मिलता क्या है?
जब नेता लड़ते हैं और कार्यकर्ता मरते हैं, तो जनता को क्या मिलता है?
1. विकास की कमी
-
नेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने में व्यस्त
-
विधानसभा में हंगामा, काम ठप
-
योजनाएँ लागू नहीं होतीं
2. भ्रष्टाचार का बोलबाला
-
विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों भ्रष्ट
-
कोई किसी से सवाल नहीं पूछता
-
जनता का पैसा लूटा जाता है
3. समाज में नफरत
-
धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर विभाजन
-
पड़ोसी एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं
-
सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है
4. हिंसा और अपराध
-
राजनीतिक झड़पों में आम लोग मारे जाते हैं
-
कानून-व्यवस्था ध्वस्त
-
गुंडागर्दी को राजनीतिक संरक्षण
5. निराशा और पलायन
-
युवा राजनीति से मुँह मोड़ते हैं
-
प्रतिभाशाली लोग देश छोड़कर जाते हैं
-
लोकतंत्र में विश्वास घटता है
कार्यकर्ताओं को सीख लेने की जरूरत
सवाल खुद से पूछें
हर कार्यकर्ता को खुद से ये सवाल पूछने चाहिए:
-
मैं किस विचारधारा के लिए लड़ रहा हूँ?
-
अगर जवाब सिर्फ "मेरे नेता के लिए" है, तो यह गलत है
-
-
क्या मेरा विरोधी सच में दुश्मन है?
-
वह भी एक इंसान है, एक नागरिक है, शायद उसकी सोच अलग है
-
-
मेरे नेता ने मेरे लिए क्या किया?
-
क्या उन्होंने मुझे नौकरी दी? शिक्षा दी? सम्मान दिया?
-
या सिर्फ इस्तेमाल किया?
-
-
अगर कल मेरे नेता किसी और पार्टी में चले गए, तो मैं क्या करूँगा?
-
क्या मैं भी साथ चला जाऊँगा, या अपनी विचारधारा के साथ खड़ा रहूँगा?
-
बदलाव के लिए कदम
कार्यकर्ताओं को यह समझना होगा:
1. नेता भगवान नहीं हैं
-
वे भी इंसान हैं, गलतियाँ करते हैं
-
उन्हें सवाल पूछने का हक है
2. विरोधी दुश्मन नहीं, प्रतिद्वंद्वी है
-
राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं
-
लेकिन व्यक्तिगत दुश्मनी की जरूरत नहीं
3. हिंसा कोई समाधान नहीं
-
मारपीट से कोई मुद्दा हल नहीं होता
-
बल्कि पार्टी की छवि खराब होती है
4. विचारधारा पर फोकस करें
-
अपनी पार्टी की नीतियाँ समझें
-
उन्हें तर्क से समझाएँ, जबरदस्ती से नहीं
5. जनता की सेवा ही असली राजनीति है
-
सत्ता पाना लक्ष्य नहीं, साधन है
-
असली लक्ष्य समाज की भलाई है
जनता को भी जागना होगा
वोट का सही इस्तेमाल
जनता को समझना होगा कि:
-
वोट सिर्फ जाति, धर्म, या पैसे के लिए नहीं
-
योग्यता, ईमानदारी, और विज़न देखकर वोट दें
सवाल पूछने की आदत
-
अपने MLA, MP से सवाल पूछें
-
उनके काम का हिसाब माँगें
-
उन्हें यह एहसास दिलाएँ कि वे जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं
विभाजन के जाल में न फँसें
-
धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर बँटवारे से सावधान रहें
-
असली मुद्दे पहचानें—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा
लोकतंत्र में भागीदारी बढ़ाएँ
-
चुनाव में वोट जरूर दें
-
सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाएँ
-
युवाओं को राजनीति में सकारात्मक भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करें
राजनीति को वापस जनता के पास लाना होगा
राजनीति का असली मतलब: जनता की सेवा, समाज का विकास, और देश की प्रगति।
आज की राजनीति: सत्ता की लड़ाई, व्यक्तिगत अहंकार, और जनता का शोषण।
बदलाव की जरूरत: कार्यकर्ताओं, नेताओं, और जनता—सभी को।
संदेश
कार्यकर्ताओं से:
यूँ ही लड़ते-मरते नहीं हैं। लेकिन यह भी याद रखें—राजनीति वैचारिक मतभेदों पर आधारित संघर्ष है, न कि व्यक्तिगत विद्वेष की लड़ाई। अपने नेता से ज्यादा, अपनी विचारधारा के प्रति वफादार रहें। हिंसा नहीं, तर्क से लड़ें।
जनता से:
आप ही असली ताकत हैं। अपनी ताकत पहचानें। वोट का सही इस्तेमाल करें। विभाजन के जाल में न फँसें। सवाल पूछें, जवाब माँगें।
नेताओं से:
अगर आपमें थोड़ी भी ईमानदारी बची है, तो याद रखें—आप जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं। व्यक्तिगत अहंकार छोड़ें, देश के बारे में सोचें। कार्यकर्ताओं को हिंसा के लिए नहीं, विचारों के लिए प्रेरित करें।
राजनीति और जनता का बँटवारा तब तक जारी रहेगा, जब तक हम सब—कार्यकर्ता, जनता, और नेता—अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे।
बदलाव मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं।
क्योंकि लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास है। बस उसे पहचानने और इस्तेमाल करने की जरूरत है।
Hindu Solanki 
