खेजड़ी पर भाषण, ज़मीन पर बुलडोज़र: आखिर जनता को गुमराह क्यों किया जा रहा है?

राजस्थान के ओसियां विधानसभा क्षेत्र के ग्राम डांवरा में सोलर प्लांट की आड़ में 100 से अधिक खेजड़ी के पेड़ों की अवैध कटाई ने सरकार और प्रशासन की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर खेजड़ी संरक्षण को लेकर आंदोलन चल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ज़मीन पर अंधाधुंध कटाई जारी है। Divvya Mahepal Madernna ने इस पर्यावरणीय अपराध को मरुधरा की जीवनरेखा पर सीधा हमला बताया है। इससे पहले खारी गांव में भी इसी तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जहां दोषी कंपनियों के बजाय ग्रामीणों पर ही कार्रवाई हुई। सवाल यह है कि क्या कानून सिर्फ़ भाषणों तक सीमित है, और ज़मीनी हकीकत में कॉरपोरेट हितों के आगे पर्यावरण को कुचला जा रहा है

खेजड़ी पर भाषण, ज़मीन पर बुलडोज़र: आखिर जनता को गुमराह क्यों किया जा रहा है?

खेजड़ी पर भाषण, ज़मीन पर बुलडोज़र: आखिर जनता को गुमराह क्यों किया जा रहा है?

ओसियां विधानसभा क्षेत्र के ग्राम डांवरा में सोलर प्लांट के नाम पर 100 से अधिक खेजड़ी के पेड़ों की अवैध कटाई कोई अलग-थलग घटना नहीं है। यह उस दोहरी नीति का ताज़ा उदाहरण है, जिसमें सरकार एक तरफ़ संरक्षण की बात करती है और दूसरी तरफ़ ज़मीन पर विनाश को चुपचाप चलने देती है।

Divvya Mahepal Madernna का बयान इस पूरे घटनाक्रम को नंगा कर देता है। सवाल सीधा है—
जब खेजड़ी राजस्थान की जीवनरेखा है, संरक्षित वृक्ष है, सांस्कृतिक पहचान है, तो फिर उसके कटने का सिलसिला क्यों नहीं रुकता?

एक तरफ़ आंदोलन, दूसरी तरफ़ अनुमति

बीकानेर में खेजड़ी बचाने के लिए पर्यावरण प्रेमी सड़कों पर हैं, अनशन कर रहे हैं, सरकार से कानून की मांग कर रहे हैं। वहीं ओसियां के डांवरा और इससे पहले खारी गांव में सोलर प्लांट की आड़ में वही खेजड़ी काटी जा रही है।
यह सिर्फ़ संयोग नहीं, नीतियों और ज़मीनी अमल के बीच की खाई है।

कानून किसके लिए सख़्त, किसके लिए नरम?

खारी गांव की घटना और भी चिंताजनक है।
जहाँ दोषी कंपनियों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी, वहाँ शांतिपूर्ण विरोध कर रहे ग्रामीणों पर ही पाबंदियां लगा दी गईं।
यह संदेश साफ़ गया—

पर्यावरण बचाओगे तो परेशानी झेलोगे, पर्यावरण उजाड़ोगे तो संरक्षण मिलेगा।

क्या यही “विकास” की परिभाषा है?

सोलर प्लांट बनाम पर्यावरण: झूठा टकराव

सोलर एनर्जी ज़रूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं।
लेकिन सवाल यह है कि—

  • क्या सोलर प्लांट बिना खेजड़ी काटे नहीं बन सकते?

  • क्या बंजर ज़मीनें खत्म हो चुकी हैं?

  • क्या हर हरित क्षेत्र ही विकास की पहली बलि बनेगा?

अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर कटाई क्यों?

धरना शांतिपूर्ण, मांगें जायज़

डांवरा में ग्रामीण शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हैं। कोई हिंसा नहीं, कोई अव्यवस्था नहीं। उनकी मांगें भी असंवैधानिक नहीं—

  • दोषी कंपनियों पर सख़्त कार्रवाई

  • खेजड़ी कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध

  • भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसकी गारंटी

फिर प्रशासन की चुप्पी क्यों?

सबसे बड़ा सवाल: जनता को गुमराह क्यों किया जा रहा है?

जब सरकार को पता है कि कटाई रुक नहीं रही,
जब कानून ज़मीन पर लागू नहीं हो रहा,
तो फिर घोषणाएँ क्यों?

क्या ये सिर्फ़ प्रेस बयान और मंचीय भाषण हैं?
क्या संरक्षण कानून सिर्फ़ फाइलों और पोस्टरों तक सीमित है?

अगर नियम बनाकर भी पालन नहीं कराया जा सकता,
तो जनता से हर बार “सब ठीक है” कहकर सच क्यों छुपाया जा रहा है?

खेजड़ी सिर्फ़ पेड़ नहीं है—
यह राजस्थान की सांस है।
और अगर इसी सांस पर हर बार विकास के नाम पर कुल्हाड़ी चलेगी,
तो सवाल सरकार से नहीं, पूरा सिस्टम से पूछा जाएगा।