बांग्लादेश चुनाव 2026: 35 साल बाद सत्ता का खाली सिंहासन, क्या बदलेगा साउथ एशिया का पावर बैलेंस?
35 साल तक शेख हसीना और खालिदा जिया के इर्द-गिर्द घूमती बांग्लादेश की राजनीति अब निर्णायक मोड़ पर है। अवामी लीग के बाहर होने और नए नेतृत्व की तलाश के बीच 12 फरवरी 2026 का चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की कूटनीति और शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला साबित हो सकता है।
ढाका की सर्द सुबह और टूटी हुई परछाइयाँ

फरवरी की शुरुआत में ढाका की हवा कुछ अलग थी।
ठंडी ज़रूर थी, लेकिन उसमें वह सुकून नहीं था जो आमतौर पर चुनाव से पहले महसूस होता है। सड़कों पर पोस्टर थे, मगर चेहरों पर उत्साह नहीं। चाय की दुकानों पर चर्चा थी, मगर आवाज़ों में भरोसा नहीं।
लोग बार-बार एक ही बात कह रहे थे—
“इस बार कुछ अलग होने वाला है।”
यह वही ढाका था, जिसने दशकों तक सत्ता के दो चेहरों को देखा था।
एक चेहरा—जो देश की आज़ादी की विरासत से निकला था।
दूसरा—जो सैन्य सत्ता की छाया से राजनीति में आया था।
अब दोनों नहीं थे।

जब राजनीति दो नामों में सिमट गई थी
1991 के बाद बांग्लादेश में लोकतंत्र आया, लेकिन राजनीति कभी खुलकर सांस नहीं ले पाई। सत्ता का खेल दो परिवारों में बंट गया।
शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी शेख हसीना—
जो भारत से दोस्ती, सेकुलरिज़्म और मज़बूत सरकार का चेहरा बनीं।

और
खालिदा जिया—

जो राष्ट्रवाद, इस्लामी पहचान और सेना से जुड़े तबके की आवाज़ रहीं।
चुनाव होते, सरकार बदलती, लेकिन देश वही रहता।
लोगों ने धीरे-धीरे मान लिया कि
प्रधानमंत्री कोई भी बने, नाम इन्हीं दो में से होगा।
यह लोकतंत्र था, लेकिन विकल्पहीन लोकतंत्र।
फिर आया 2024… और सब कुछ टूट गया
2024 में बांग्लादेश के विश्वविद्यालयों से उठी आवाज़ कोई राजनीतिक नारा नहीं थी।
वह एक सवाल था—
“हम पढ़-लिखकर भी बेरोज़गार क्यों हैं?”
सरकारी नौकरियों में आरक्षण, कथित पक्षपात और सत्ता से जुड़े लोगों की प्राथमिकता—इन सबने छात्रों को सड़कों पर ला दिया।
शुरुआत शांत थी।
प्लाकार्ड थे, नारे थे, उम्मीद थी।
फिर लाठियाँ आईं।
फिर आँसू गैस।
फिर गोलियाँ।
ढाका, चिटगांव, राजशाही—हर शहर में आग फैल गई।
सरकार ने इसे “कानून व्यवस्था” कहा,
छात्रों ने इसे “राज्य प्रायोजित हिंसा”।
और यहीं से इतिहास ने करवट ली।

एक प्रधानमंत्री, जो देश छोड़ गई
जब हिंसा की तस्वीरें दुनिया भर में पहुँचीं,
जब संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठन सवाल पूछने लगे,
जब सेना और प्रशासन के भीतर भी असहजता बढ़ी—
तब एक रात शेख हसीना देश से बाहर चली गईं।
कोई औपचारिक घोषणा नहीं।
कोई विदाई भाषण नहीं।
बस एक खाली कुर्सी।
बांग्लादेश ने पहली बार देखा कि
सत्ता स्थायी नहीं होती।
और फिर, खालिदा जिया भी चली गईं
कुछ ही समय बाद एक और खबर आई—
खालिदा जिया का निधन।
जो दो चेहरे 35 साल तक राजनीति के केंद्र में रहे,
वे दोनों एक साथ इतिहास बन गए।
देश के पास न नेतृत्व था,
न भरोसेमंद विपक्ष।
अवामी लीग पर ताला
चुनाव आयोग का फैसला बिजली की तरह गिरा—
अवामी लीग चुनाव नहीं लड़ेगी।

कारण वही 2024 की हिंसा।
यह सिर्फ एक पार्टी पर प्रतिबंध नहीं था,
यह आज़ादी के आंदोलन से निकली पार्टी को
राजनीति से बाहर करना था।
समर्थकों ने कहा—
“यह बदले की राजनीति है।”
आलोचकों ने कहा—
“यह न्याय है।”
लेकिन आम लोग चुप थे।
क्योंकि उन्हें डर था।
क्योंकि डर सिर्फ अंदर से नहीं आता
ढाका के सत्ता गलियारों में एक और चर्चा थी—
बाहरी ताकतों की।
भारत खामोश था, लेकिन चिंतित।
शेख हसीना उसके लिए सुरक्षा कवच थीं।
पाकिस्तान फिर सक्रिय दिखने लगा।
इस्लामिक संगठनों की हलचल बढ़ी।
और चीन?
चीन हमेशा की तरह चुप था,
लेकिन उसके प्रोजेक्ट बोल रहे थे—पोर्ट, सड़कें, निवेश।
यह चुनाव सिर्फ बांग्लादेश का नहीं रह गया था।
यह साउथ एशिया का संतुलन तय करने वाला क्षण बन चुका था।
12 फरवरी 2026: एक खाली मैदान
चुनाव का दिन आएगा
मतदान केंद्र खुलेगे
लाइनें लगेगी
लेकिन वह जुनून नहीं रहेगा जो कभी होता था।
लोग वोट डाल रहे होंगे
पर सवाल वही रहेगा
“हम किसे चुन रहे हैं?”
यह चुनाव लोकतंत्र का उत्सव नहीं,
बल्कि एक संक्रमण काल था।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है
क्या नया प्रधानमंत्री अच्छा होगा या बुरा—
असल सवाल यह है:
-
क्या बांग्लादेश परिवारवाद से बाहर निकलेगा?
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या सत्ता किसी नए लेकिन अदृश्य हाथ में जाएगी?
-
क्या लोकतंत्र मजबूत होगा,
या यह खाली खोल बन जाएगा?
इतिहास गवाह है
जब पुराने चेहरे अचानक हटते हैं,
तो नए चेहरे हमेशा लोकतांत्रिक नहीं होते।
कभी सेना आती है।
कभी कट्टरपंथ।
कभी विदेशी हित।
बांग्लादेश आज उसी चौराहे पर खड़ा है।
और अंत में…
यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
यह 12 फरवरी को भी खत्म नहीं होगी।
यह तय करेगी कि
बांग्लादेश सिर्फ प्रधानमंत्री बदलेगा
या अपनी राजनीतिक आत्मा भी।
और शायद इसी वजह से
दिल्ली, बीजिंग और इस्लामाबाद—
तीनों की निगाहें ढाका पर टिकी हैं।
क्योंकि यह चुनाव
एक देश का नहीं, एक पूरे क्षेत्र का भविष्य लिख रहा है।
Hindu Solanki 
