खेजड़ी आंदोलन में हनुमान बेनीवाल की दूरी: बिना बुलावे क्यों नहीं पहुंचे, क्या सियासत आंदोलन से बड़ी हो गई?

बीकानेर में चल रहे खेजड़ी बचाओ महापड़ाव के बीच नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल के बयान ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। बेनीवाल ने साफ कहा कि जब तक मंच से बुलावा नहीं आएगा, वह किसी आंदोलन में शामिल नहीं होंगे। इस बयान ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या यह उनकी राजनीतिक रणनीति है या आंदोलन के नेतृत्व से दूरी बनाए रखने का तरीका। बिश्नोई समाज के नेतृत्व वाले इस आंदोलन में बड़े राजनीतिक चेहरों की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। क्या खेजड़ी जैसे संवेदनशील पर्यावरणीय मुद्दे पर भी राजनीति की शर्तें तय होंगी, या जनता की आवाज़ ही निर्णायक होगी—इसी टकराव की तस्वीर पेश करती यह रिपोर्ट।

खेजड़ी आंदोलन में हनुमान बेनीवाल की दूरी: बिना बुलावे क्यों नहीं पहुंचे, क्या सियासत आंदोलन से बड़ी हो गई?

खेजड़ी आंदोलन के बीच हनुमान बेनीवाल का बयान: सिद्धांत, सियासत या दूरी की रणनीति?

बीकानेर में खेजड़ी बचाओ महापड़ाव लगातार गहराता जा रहा है। पर्यावरण, स्थानीय अस्मिता और सरकार की नीतियों को लेकर उठी यह आवाज अब केवल आंदोलन नहीं रही, बल्कि राजस्थान की राजनीति का एक अहम मोर्चा बन चुकी है। इसी बीच राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के प्रमुख और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल का बयान सामने आया है, जिसने नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

हनुमान बेनीवाल ने साफ शब्दों में कहा—

“पब्लिक हमें पुकार रही है, लेकिन जब तक मंच नहीं पुकारेगा, तब तक हर कहीं मैं नहीं जाता… जो आदमी खुद पांच लाख की रैली कर रहा है, वो बिना बुलाए नहीं जाता।”

यह बयान जितना सीधा लगता है, उसके पीछे उतनी ही परतें हैं।

बिना बुलाए न जाना: बेनीवाल की पुरानी राजनीतिक शैली

हनुमान बेनीवाल की राजनीति को अगर करीब से देखा जाए, तो एक बात साफ दिखती है—वे खुद को “मास लीडर” के साथ-साथ “डिसिप्लिन्ड पॉलिटिकल ब्रांड” के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।
वे अक्सर आंदोलनों में तभी जाते हैं, जब—

  • मंच की ओर से औपचारिक न्योता हो

  • आंदोलन की दिशा और नेतृत्व स्पष्ट हो

  • उन्हें प्रतीकात्मक नहीं, निर्णायक भूमिका मिले

किसान आंदोलन (दिल्ली बॉर्डर), नागौर-सीकर के बड़े किसान महापड़ाव, OPS आंदोलन या Jat आरक्षण से जुड़े प्रदर्शन—इन सभी मौकों पर बेनीवाल वहां पहुंचे, लेकिन बुलाए जाने के बाद, और मंच पर उनकी भूमिका स्पष्ट थी।

उनका मानना रहा है कि बिना बुलाए पहुंचना आंदोलन को समर्थन देने से ज्यादा क्रेडिट लेने जैसा दिख सकता है, और इससे स्थानीय नेतृत्व कमजोर पड़ता है।

क्या बिश्नोई समाज उन्हें बुलाना नहीं चाहता?

यह सवाल आंदोलन के भीतर भी उठ रहा है। खेजड़ी आंदोलन का नेतृत्व मुख्यतः बिश्नोई समाज और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के हाथ में है। बिश्नोई समाज ऐतिहासिक रूप से पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक रहा है और वह अपने आंदोलनों को अक्सर गैर-राजनीतिक रखने की कोशिश करता है।

ऐसे में संभव है कि—

  • आंदोलनकारी किसी एक बड़े राजनीतिक चेहरे को आगे रखकर आंदोलन को “राजनीतिक रंग” नहीं देना चाहते

  • उन्हें डर हो कि बेनीवाल जैसे तेज़-तर्रार नेता के आने से मुद्दा पर्यावरण से हटकर सियासी टकराव बन सकता है

  • मंच यह तय नहीं कर पा रहा हो कि किस नेता को बुलाया जाए और किसे नहीं

यह भी सच है कि बिश्नोई समाज की राजनीति में अपनी अलग पहचान और स्वायत्तता रही है, और वह बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर सतर्क रहता है।

या फिर बेनीवाल खुद दूरी बनाए रखना चाहते हैं?

दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। हनुमान बेनीवाल फिलहाल भाजपा और कांग्रेस—दोनों के खिलाफ अपनी अलग राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश में हैं। वे हर आंदोलन में कूदने से बचते हैं, ताकि—

  • उनकी राजनीति “हर मुद्दे पर दिखने वाले नेता” की न लगे

  • वे केवल उन्हीं आंदोलनों से जुड़ें, जहां उन्हें नेतृत्व की जगह मिले

  • भविष्य में अगर आंदोलन विफल हो, तो उसकी जवाबदेही उन पर न आए

खेजड़ी आंदोलन एक संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दा है। अगर सरकार ने इसे कड़े कानून या दमन से कुचल दिया, तो किसी बड़े नेता की मौजूदगी उसे सीधे टकराव में बदल सकती है—और शायद बेनीवाल यह जोखिम फिलहाल नहीं लेना चाहते।

जनता बनाम मंच: बयान का असली संदेश

बेनीवाल के बयान का सबसे अहम हिस्सा “पब्लिक हमें पुकार रही है, लेकिन मंच नहीं”—यहीं असली राजनीति छुपी है।
यह एक तरह से दोनों पक्षों को संदेश है:

  • जनता को: हम आपके साथ हैं, लेकिन नियमों के साथ

  • मंच को: अगर बुलाओगे, तो पूरी ताकत से आऊंगा

यह बयान दबाव भी बनाता है और दूरी भी बनाए रखता है।

आंदोलन के बीच सियासत का संतुलन

बीकानेर का खेजड़ी बचाओ महापड़ाव अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा। यह तय करेगा कि—

  • क्या जन आंदोलन राजनीतिक नेतृत्व के बिना आगे बढ़ सकते हैं?

  • क्या बड़े नेता बिना बुलाए जनभावना के साथ खड़े हो सकते हैं?

  • और क्या पर्यावरण जैसे मुद्दों पर भी राजनीति की शर्तें तय होंगी?

हनुमान बेनीवाल का बयान इसी द्वंद्व की तस्वीर है—जहां जनता की आवाज़ है, मंच की राजनीति है और नेता अपनी सीमाएं तय कर रहा है।

अब निगाहें इस पर हैं कि क्या आंदोलन का मंच उन्हें औपचारिक न्योता देगा, या फिर यह आंदोलन बिना किसी बड़े राजनीतिक चेहरे के ही सरकार को झुकाने की कोशिश करेगा।

सवाल यही है—
खेजड़ी की लड़ाई में नेतृत्व किसका होगा: जनता का, मंच का या राजनीति का?