बदलेगा ट्रैफिक पैटर्न! अब लेफ्ट नहीं राइट साइड चलेंगे लोग? SC ने केंद्र से मांगा जवाब - जानें LHT-RHT का पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क पर दाईं तरफ चलने के नियम पर केंद्र से जवाब मांगा। हर साल 18000+ पैदल यात्री मरते हैं। LHT-RHT क्या है? पूरा मामला समझें।

बदलेगा ट्रैफिक पैटर्न! अब लेफ्ट नहीं राइट साइड चलेंगे लोग? SC ने केंद्र से मांगा जवाब - जानें LHT-RHT का पूरा मामला

बदलेगा ट्रैफिक का पैटर्न! अब लेफ्ट नहीं राइट साइड चलेंगे लोग? SC ने केंद्र से मांगा जवाब

क्या है पूरा मामला?

नई दिल्ली। सड़क पर चलते वक्त आप हमेशा बाईं तरफ चलते हैं ना? लेकिन अब ये नियम बदल सकता है! सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या भारत में पैदल चलने वालों के लिए दाईं तरफ चलने का नियम बनाया जा सकता है ।

मध्य प्रदेश के जबलपुर से ज्ञान प्रकाश नाम के एक शख्स ने SC में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि हर साल 18,000 से ज्यादा पैदल चलने वाले सड़क हादसों में मारे जाते हैं। इनमें से करीब 30 फीसदी मौतें सिर्फ इसलिए होती हैं क्योंकि लोग गलत दिशा में चल रहे होते हैं

कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र और NHAI से जवाब मांगा है।

LHT-RHT क्या बला है? समझिए आसान भाषा में

LHT यानी Left-Hand Traffic

मतलब साफ है - गाड़ियां सड़क के बाईं तरफ चलती हैं। भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड जैसे करीब 75 देशों में यही सिस्टम है ।

ये अंग्रेजों की देन है। जब वो भारत पर राज करते थे, तब से यही चल रहा है।

RHT यानी Right-Hand Traffic

इसमें गाड़ियां दाईं तरफ चलती हैं। अमेरिका, चीन, फ्रांस, जर्मनी समेत दुनिया के 163 देशों में यही सिस्टम है ।

दुनिया की 65-70 फीसदी आबादी इसी तरीके से चलती है।

असली समस्या क्या है?

खौफनाक आंकड़े

साल 2022 की बात करें तो:

  • भारत में कुल सड़क हादसे: 4.6 लाख से ज्यादा

  • इनमें मरने वालों की संख्या: 1.68 लाख

  • सिर्फ पैदल चलने वालों की मौत: 18,000 से ज्यादा

  • गलत दिशा में चलने की वजह से मौतें: 5,400 से ज्यादा

हर रोज औसतन 50 पैदल चलने वाले सड़क हादसों में मारे जाते हैं!

क्यों होती हैं इतनी मौतें?

अभी क्या होता है:

  • गाड़ियां बाईं तरफ चलती हैं

  • लोग भी बाईं तरफ चलते हैं

  • मतलब गाड़ियां आपकी पीठ पीछे से आती हैं

  • आपको दिखती नहीं, और धड़ाम!

अगर दाईं तरफ चलें तो:

  • गाड़ियां सामने से आती दिखेंगी

  • आप बच के चल सकते हैं

  • ड्राइवर से आंखें मिलेंगी, वो भी सावधान हो जाएगा

  • एक्सपर्ट कहते हैं - 30-40 फीसदी तक एक्सीडेंट कम हो सकते हैं

कौन है ये याचिकाकर्ता?

ज्ञान प्रकाश जबलपुर के रहने वाले हैं और पिछले कई सालों से रोड सेफ्टी के लिए लड़ रहे हैं ।

उन्होंने पहले भी SC में कई याचिकाएं डाली हैं:

  • बाइक पर सेफ्टी के लिए (2006)

  • हाईवे पर अवैध कब्जे हटाने के लिए (2019)

  • और अब ये नई याचिका (2025)

इनकी एक किताब भी है - "यातायात शिक्षा" - जिसमें बताया गया है कि दाईं तरफ चलना क्यों सुरक्षित है ।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

अक्टूबर 2025 में जस्टिस अभय एस. ओका की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की ।

कोर्ट के सवाल सरकार से:

  1. क्या भारत में लोगों को दाईं तरफ चलने का नियम बनाया जा सकता है?

  2. क्या ये प्रैक्टिकल है?

  3. इससे सच में एक्सीडेंट कम होंगे?

  4. इसे लागू कैसे करोगे?

  5. खर्चा कितना आएगा?

कोर्ट ने सरकार और NHAI से 10 नवंबर 2025 तक जवाब मांगा था ।

SC की फटकार भी लगी:
कोर्ट ने याद दिलाया कि पहले भी ट्रैफिक कंट्रोल के आदेश दिए थे, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं हुआ ।

दुनिया में कैसे चलते हैं लोग?

Left वाले देश

Asia: भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, जापान, थाईलैंड, इंडोनेशिया
यूरोप: इंग्लैंड, आयरलैंड
Oceania: ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड
Africa: केन्या, दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे

Total: करीब 75 देश

Right वाले देश

Americas: अमेरिका, कनाडा, मैक्सिको, ब्राजील (पूरा अमेरिका!)
यूरोप: फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, रूस (लगभग सभी)
Asia: चीन, कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान
Middle East: सऊदी अरब, UAE, ईरान, तुर्की

Total: 163 देश

दिलचस्प किस्से

स्वीडन ने एक दिन में बदल दिया था!
1967 में स्वीडन ने एक दिन में पूरे देश का सिस्टम बदल दिया। सुबह 5 बजे सभी गाड़ियां रुकीं, फिर दाईं तरफ शिफ्ट हो गईं। इसे "H-Day" कहते हैं ।

म्यांमार की अजीब हालत:
1970 में म्यांमार ने बाएं से दाएं शिफ्ट किया। लेकिन आज भी जापान से आई पुरानी गाड़ियां चलती हैं जिनमें स्टीयरिंग दाईं तरफ है!

क्या भारत बदल सकता है पूरा सिस्टम?

एक बात साफ कर लें

याचिका में गाड़ियों के चलने का तरीका बदलने को नहीं कहा गया। सिर्फ पैदल चलने वालों को दाईं तरफ चलने को कहा गया है

मतलब:

  • गाड़ियां वैसे ही बाईं तरफ चलेंगी

  • बस लोग दाईं तरफ चलेंगे

  • ताकि सामने से आती गाड़ियां दिखें

अगर पूरा सिस्टम बदलें तो...

ये लगभग नामुमकिन है क्योंकि:

खर्चा: लाखों करोड़ रुपये लगेंगे

  • सारी सड़कें बदलनी होंगी

  • ट्रैफिक सिग्नल बदलने होंगे

  • फ्लाईओवर, अंडरपास सब नए सिरे से

  • पेट्रोल पंप, बस स्टॉप सब शिफ्ट करने होंगे

गाड़ियां: करोड़ों गाड़ियां चेंज करनी होंगी

  • अभी सब में स्टीयरिंग दाईं तरफ है

  • इन्हें बाईं तरफ करना होगा या बदलना होगा

लोग: 140 करोड़ लोगों की आदत बदलना

  • कम से कम 10-15 साल लगेंगे

  • बीच में कन्फ्यूजन से और एक्सीडेंट होंगे

सिर्फ पैदल चलने का नियम बदलें तो?

ये ज्यादा प्रैक्टिकल है!

फायदे

 कोई सड़क नहीं बदलनी
 गाड़ियां वैसे ही चलेंगी
 बस लोगों को समझाना है
 खर्चा कम (सिर्फ अवेयरनेस कैंपेन)
 30-40% एक्सीडेंट कम हो सकते हैं

चुनौतियां

 200 साल पुरानी आदत बदलनी होगी
 हर किसी को समझाना मुश्किल
 शुरुआत में कन्फ्यूजन होगा
 लोग मानेंगे कैसे? पुलिस थोड़े ही हर जगह खड़ी रहेगी

कैसे लागू हो सकता है?

धीरे-धीरे (3-5 साल में)

पहला साल:

  • TV, रेडियो, सोशल मीडिया पर अवेयरनेस

  • स्कूलों में बच्चों को सिखाना

  • सड़कों पर बोर्ड लगाना

दूसरा-तीसरा साल:

  • दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में ट्रायल

  • हाईवे पर पहले लागू करना

  • डेटा इकट्ठा करना - काम कर रहा है या नहीं

चौथा-पांचवां साल:

  • पूरे देश में लागू

  • पुलिस द्वारा नरमी से समझाना

  • फिर धीरे-धीरे छोटा-मोटा जुर्माना (₹100-200)

जरूरी काम

सड़कों पर:

  • हर 100 मीटर पर "दाईं तरफ चलें" के बोर्ड

  • फुटपाथ पर तीर के निशान

  • रात में चमकने वाले साइन्स

लोगों को:

  • बच्चों को स्कूल में पढ़ाना

  • ड्राइविंग स्कूल में सिखाना

  • हर जगह पोस्टर, विज्ञापन

खर्चा कितना आएगा?

अनुमान:

  • साइनबोर्ड और निशान: ₹500-1000 करोड़

  • अवेयरनेस कैंपेन: ₹200-300 करोड़

  • स्कूलों में प्रोग्राम: ₹100-200 करोड़

  • पुलिस ट्रेनिंग: ₹300-500 करोड़

कुल: ₹1,100-2,000 करोड़ (5 साल में)

लेकिन याद रखिए:

  • सड़क हादसों से भारत को हर साल ₹5 लाख करोड़ का नुकसान

  • अगर 30% एक्सीडेंट कम हुए तो ₹1.5 लाख करोड़ बचत हर साल!

लोग क्या सोचते हैं?

हां में

"अगर इससे हजारों जानें बच सकती हैं तो क्यों नहीं? आदत बदलेंगे, पर जान बचेगी।"

"विदेशों में काम करता है तो यहां क्यों नहीं? साइंस को मानो।"

ना में

"फुटपाथ ही नहीं हैं ज्यादातर जगह। पहले वो बनाओ।"

"200 साल की आदत एक दिन में कैसे बदलेगी? लोग तो ट्रैफिक लाइट भी नहीं मानते!"

कन्फ्यूज्ड

"अभी Left याद रखना मुश्किल है, अब Right? दिमाग खराब हो जाएगा!"

"थ्योरी में अच्छा लगता है, लेकिन इंडिया में होगा कैसे?"

एक्सपर्ट्स की राय

रोड सेफ्टी के जानकार

"सामने से आती गाड़ी दिखेगी तो बचने का मौका मिलेगा। ये डिफेंसिव वॉकिंग है।"

ट्रैफिक साइकोलॉजिस्ट

"ड्राइवर से आई कॉन्टैक्ट हो तो एक्सीडेंट कम होते हैं। ये साबित हो चुका है।"

इंफ्रास्ट्रक्चर एक्सपर्ट

"सिर्फ 30% सड़कों पर फुटपाथ हैं भारत में। बिना इंफ्रा के नियम बदलना बेकार है।"

पुलिस अधिकारी

"लागू कैसे करेंगे? हर पैदल चलने वाले को पकड़ेंगे क्या? प्रैक्टिकल नहीं है।"

10 बड़े सवाल

1. क्या सिर्फ ये बदलाव काफी है?
हां, क्योंकि गाड़ियों का सिस्टम नहीं बदल रहा। कम खर्च में बड़ा फायदा।

2. शुरुआत में तो और एक्सीडेंट होंगे?
हो सकता है। इसलिए धीरे-धीरे करना होगा। पहले समझाओ, फिर लागू करो।

3. गांवों में कैसे?
वहां तो फुटपाथ ही नहीं। पहले शहरों में करो, फिर धीरे-धीरे गांवों तक पहुंचाओ।

4. गलत चलने पर जुर्माना?
शुरुआत में नहीं। 2-3 साल सिर्फ समझाना। फिर छोटा जुर्माना (₹100-200)।

5. अंधे और दिव्यांग लोगों के लिए?
उनके लिए अलग व्यवस्था - टच पेवमेंट, ऑडियो सिग्नल।

6. क्या ये कानूनी है?
हां, संविधान में जान बचाने के लिए नियम बनाए जा सकते हैं।

7. पैसा कहां से आएगा?
₹1,100-2,000 करोड़। लेकिन हर साल ₹1.5 लाख करोड़ बचेगा!

8. दूसरे देशों से क्या सीखें?
स्वीडन ने महीनों तैयारी की थी। हमें भी चाहिए।

9. पुलिस कैसे लागू करेगी?
शुरू में सिर्फ समझाना। बाद में CCTV और स्पॉट फाइन।

10. कामयाबी कैसे नापेंगे?
एक्सीडेंट कम हुए या नहीं, कितने लोग मान रहे हैं - ये देखकर।

आगे क्या होगा?

अगले 6-12 महीने:

  • सरकार SC को रिपोर्ट देगी

  • एक्सपर्ट कमेटी बन सकती है

  • स्टडी होगी

अगर SC हां कहे:

  • 2-3 शहरों में ट्रायल (2026-27)

  • बड़ा अवेयरनेस कैंपेन

  • डेटा इकट्ठा करना

लंबे समय में (5-10 साल):

  • अगर कामयाब रहा तो पूरे देश में

  • 30-40% पैदल चलने वालों की मौतें कम

  • भारत रोड सेफ्टी में मिसाल बनेगा

ये सिर्फ Left-Right का खेल नहीं है। ये है जान बचाने का सवाल

हर साल 18,000 परिवार अपने किसी न किसी को सड़क हादसे में खो देते हैं। अगर एक छोटा सा बदलाव - दाईं तरफ चलना - इनमें से 5,000-6,000 जानें बचा सकता है, तो क्या कोशिश नहीं करनी चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट ने सही सवाल उठाया है। अब देखते हैं सरकार क्या जवाब देती है।

क्योंकि जान से बड़ा कोई नियम नहीं होता!