बाड़मेर पंचायत पुनर्गठन पर हाईकोर्ट की मुहर: चुनाव प्रक्रिया के बीच दखल से इनकार, याचिका खारिज

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने बाड़मेर जिले में ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन और सीमांकन को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को जारी राज्य सरकार की अधिसूचना को वैध ठहराते हुए कहा कि वर्तमान में पंचायत चुनाव प्रक्रिया जारी है, ऐसे में न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंचायत मुख्यालय बदलने या पुनर्गठन से किसी के संवैधानिक या कानूनी अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता। कोर्ट ने यह भी माना कि चुनाव पहले ही एक साल से अधिक विलंबित हैं और राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने का हलफनामा दिया है। इस फैसले के बाद बाड़मेर में पंचायत चुनाव नए ढांचे के तहत ही कराए जाएंगे।

बाड़मेर पंचायत पुनर्गठन पर हाईकोर्ट की मुहर: चुनाव प्रक्रिया के बीच दखल से इनकार, याचिका खारिज

बाड़मेर पंचायत पुनर्गठन मामला: हाईकोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की, असल वजह क्या है और अब आगे क्या होगा?

पूरा मामला क्या है?

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने बाड़मेर जिले में ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन, सीमांकन और मुख्यालय बदलने को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। यह याचिका उन ग्रामीणों द्वारा दायर की गई थी, जिनका कहना था कि राज्य सरकार ने पंचायतों का पुनर्गठन नियमों के खिलाफ किया है और इससे उन्हें नुकसान होगा।

राज्य सरकार ने 20 नवंबर 2025 को एक अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत जिला कलेक्टर की सिफारिश पर बाड़मेर जिले की कई ग्राम पंचायतों का:

  • पुनर्गठन

  • पुनर्निर्धारण (री-डिलिमिटेशन)

  • और नई पंचायतों का सृजन

किया गया था।

इसी अधिसूचना को लेकर प्रेमसुख, चेतनराम, बालाराम सहित 10 याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में डीबी सिविल रिट याचिका दायर की थी।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्तियाँ क्या थीं?

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि:

  1. पंचायतों का पुनर्गठन स्थानीय लोगों की सहमति के बिना किया गया

  2. पंचायत मुख्यालय बदले जाने से:

    • दूरी बढ़ेगी

    • प्रशासनिक असुविधा होगी

    • ग्रामीणों को सेवाओं में परेशानी आएगी

  3. यह पूरी प्रक्रिया पंचायती राज नियमों के अनुरूप नहीं है

  4. इसलिए इस अधिसूचना पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए

हाईकोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?

जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कई अहम कानूनी और संवैधानिक बिंदुओं को आधार बनाया।

 चुनाव प्रक्रिया चल रही है, दखल नहीं हो सकता

कोर्ट ने साफ कहा कि:

जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी हो, तब न्यायालय का हस्तक्षेप संविधान और कानून दोनों के खिलाफ होता है।

फिलहाल:

  • ग्राम पंचायत

  • पंचायत समिति

  • जिला परिषद

तीनों के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है।

 चुनाव पहले ही एक साल लेट हो चुके हैं

कोर्ट ने माना कि पंचायत चुनाव:

  • पहले ही लगभग एक साल की देरी से हो रहे हैं

  • ऐसे में पुनर्गठन पर रोक लगाना चुनाव को और टाल देगा

 सुप्रीम कोर्ट को दिया गया वचन

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव पूरे कराने का वादा किया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्थिति में वह चुनाव प्रक्रिया में बाधा नहीं बन सकता।

 अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता

कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा:

पंचायत मुख्यालय बदलने या पुनर्गठन से किसी व्यक्ति के मौलिक या कानूनी अधिकार का हनन नहीं होता।

यानी:

  • यह नीति-निर्धारण (policy decision) का मामला है

  • इसमें कोर्ट तभी दखल दे सकता है जब कोई स्पष्ट अवैधता हो

जयपुर पीठ के फैसले का भी असर

कोर्ट ने यह भी माना कि:

  • इसी तरह की अधिसूचना को पहले जयपुर पीठ में चुनौती दी गई थी

  • जयपुर पीठ ने 21 जनवरी 2026 को सुनील जांगिड़ बनाम राजस्थान राज्य मामले में ऐसी याचिकाएं खारिज कर दी थीं

जोधपुर पीठ ने उसी निर्णय से सहमति जताई, जिससे यह साफ हो गया कि हाईकोर्ट की दोनों पीठें इस मुद्दे पर एकमत हैं।

असल कारण क्या माना जा रहा है?

कानूनी फैसले से इतर अगर ज़मीनी कारण देखें तो कुछ बातें साफ दिखती हैं:

 1. चुनाव समय पर कराने का दबाव

राज्य सरकार पर:

  • सुप्रीम कोर्ट का दबाव

  • राज्य चुनाव आयोग की समयसीमा

हावी है। ऐसे में सरकार किसी भी कीमत पर चुनाव नहीं टालना चाहती।

 2. पंचायतों का राजनीतिक संतुलन

पंचायत पुनर्गठन अक्सर:

  • जातीय समीकरण

  • वोट बैंक

  • स्थानीय प्रभाव

से जुड़ा होता है। यही वजह है कि ऐसे फैसलों पर हमेशा विवाद होते हैं।

 3. कोर्ट का सीमित दायरा

हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि:

नीति और प्रशासनिक फैसलों में अदालत “सुपर एडमिनिस्ट्रेटर” की भूमिका नहीं निभा सकती।

अब आगे क्या होगा?

 पंचायत चुनाव तय समय पर होंगे

अब लगभग तय है कि:

  • 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत चुनाव संपन्न कराए जाएंगे

  • नए सीमांकन और पुनर्गठन के अनुसार ही चुनाव होंगे

 याचिकाकर्ताओं के पास सीमित विकल्प

अब याचिकाकर्ता:

  • या तो सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं

  • या फिर चुनाव बाद प्रशासनिक स्तर पर शिकायत उठा सकते हैं

लेकिन चुनाव से पहले राहत मिलने की संभावना बेहद कम है।

 नए ढांचे में पंचायतें काम करेंगी

चुनाव के बाद:

  • नई पंचायतें

  • नए मुख्यालय

  • नया प्रशासनिक ढांचा

पूरी तरह लागू हो जाएगा।

बाड़मेर पंचायत पुनर्गठन मामला अब लगभग कानूनी तौर पर बंद माना जा सकता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि:

  • चुनाव प्रक्रिया सर्वोपरि है

  • नीति से असहमति का समाधान अदालत नहीं, राजनीतिक और प्रशासनिक मंच पर होना चाहिए

अब नजरें पंचायत चुनावों पर होंगी, जहां जनता तय करेगी कि नया पुनर्गठन उनके हित में है या नहीं।