काली लेंबोर्गिनी, काला कवर और खाकी वर्दी: क्या कानून अमीरों के लिए अलग होता है? कानपुर हादसे ने खड़े किए बड़े सवाल

कानपुर में तंबाकू कारोबारी के बेटे द्वारा ब्लैक लेंबोर्गिनी से लोगों को टक्कर मारने की घटना ने पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घायलों से ज़्यादा सुरक्षित रखी गई करोड़ों की कार, बाउंसरों की मौजूदगी और थाने में ढका गया वाहन—क्या यह कानून की बराबरी पर चोट नहीं?

काली लेंबोर्गिनी, काला कवर और खाकी वर्दी: क्या कानून अमीरों के लिए अलग होता है? कानपुर हादसे ने खड़े किए बड़े सवाल

काली कार, सफ़ेद कवर और खाकी वर्दी का सन्नाटा

(कानपुर से उठते सवाल, जो सिर्फ़ एक हादसे तक सीमित नहीं हैं)

कानपुर की एक सड़क पर अचानक चीख़ें गूंजीं। लोग भागे, कोई गिरा, कोई संभला नहीं। कुछ सेकंड पहले तक जो सड़क आम लोगों की थी, वह एक ब्लैक लेंबोर्गिनी के नीचे आ चुकी थी। करोड़ों की कार, तेज़ रफ़्तार, और सामने—सामान्य लोग।
कार रुकी नहीं, हालात रुके नहीं।

कार से उतरा नाम—शिवम मिश्रा, तंबाकू कारोबारी का बेटा। उसके साथ थे बाउंसर। और फिर कहानी ने वह मोड़ लिया, जिसने हादसे को सिर्फ़ “एक एक्सीडेंट” नहीं रहने दिया।

भीड़ इकट्ठा हुई, सवाल उठे—तो बाउंसर आगे आए

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, जैसे ही लोग इकट्ठा हुए और सवाल पूछने लगे—
“किसकी गाड़ी है?”
“घायलों को अस्पताल क्यों नहीं ले जाया जा रहा?”
वैसे ही बाउंसरों ने मोर्चा संभाल लिया।
अभद्रता हुई, धक्का-मुक्की हुई।
सड़क पर पड़े घायल और खड़े सवाल—दोनों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

थाने में खड़ी कार, कवर में लिपटी ‘इज़्ज़त’

कुछ देर बाद तस्वीर बदलती है।
अब दृश्य थाना परिसर का है।
वहीं, वही ब्लैक लेंबोर्गिनी—लेकिन अब उस पर ब्लैक कवर चढ़ा है।
कवर इसलिए, ताकि स्क्रैच न आए

यही वह बिंदु है, जहां से सवाल शुरू होते हैं।

क्या थाने में खड़ी कार को सुरक्षा चाहिए थी, या सड़क पर गिरे लोगों को?

कार बाउंसरों की निगरानी में सुरक्षित खड़ी है।
घायल—अस्पतालों में, कुछ बिना बयान दर्ज कराए।

पुलिस की भूमिका: कार्रवाई या व्यवस्था?

पुलिस का आधिकारिक बयान—
“मामले की जांच की जा रही है। कार को सुरक्षित रखा गया है। कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।”

लेकिन ज़मीन पर दिखती तस्वीर अलग कहानी कहती है।
आम तौर पर किसी आम व्यक्ति की बाइक अगर ज़ब्त होती है, तो वह खुले में धूप-बारिश खाती रहती है।
यहां—
कार ढकी है, सुरक्षित है, मानो वह सबूत नहीं बल्कि मेहमान हो।

यह पहली बार नहीं है

यह घटना किसी शून्य में नहीं हुई।
देश के अलग-अलग शहरों में इससे पहले भी—

  • महंगी कार,

  • रईस परिवार का बेटा,

  • हादसा,

  • और फिर “कानून अपना काम करेगा” वाला आश्वासन।

कुछ मामलों में केस चला, कुछ में समझौता हुआ, कुछ में समय ने सब ढक दिया—जैसे आज इस कार को ढक दिया गया है।

गरीब के लिए पुलिस, अमीर के लिए सुरक्षा?

यही सवाल सबसे तेज़ है।
अगर यही हादसा किसी ऑटो चालक या मज़दूर की बाइक से होता—
तो क्या—

  • बाउंसर खड़े होते?

  • कार पर कवर चढ़ता?

  • या थाने में इतनी नर्मी दिखती?

कानून कहता है—सब बराबर हैं।
लेकिन ज़मीन पर तस्वीर कहती है—
पैसा पहले बोलता है, इंसाफ़ बाद में।

आज़ाद देश की पुलिस या मानसिक गुलामी?

यह सवाल किसी एक थाने या एक शहर का नहीं है।
यह उस सोच का है, जहां वर्दी अनजाने में ताक़तवर के आगे झुक जाती है।
जहां डर अपराध से नहीं, प्रभाव से पैदा होता है।

आज सवाल यह नहीं कि कार कितनी महंगी है।
सवाल यह है कि—

क्या कानून की कीमत भी करोड़ों में तय होती है?

अंत में—

यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
जांच चल रही है, बयान दर्ज होने बाकी हैं।
लेकिन जब तक जवाब आएंगे, तब तक यह सवाल ज़िंदा रहेगा—

क्या इस देश की सड़कें सबके लिए बराबर हैं?
और क्या थाने सिर्फ़ कानून के हैं, या हैसियत के भी?

क्योंकि अगर जवाब दूसरा है—
तो फिर हादसे बदलते रहेंगे,
कारें बदलेंगी,
नाम बदलेंगे—
लेकिन सड़क पर गिरने वाले लोग वही रहेंगे।