अजमेर रेप केस: 7 साल पुराने रिश्ते, शादी के झांसे और ब्लैकमेल के आरोप—सच्चाई क्या है?
अजमेर के मांगलियावास थाना क्षेत्र में दर्ज रेप मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़िता ने युवक पर नशीला पदार्थ पिलाकर रेप, शादी का झांसा, अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल, गर्भपात और जेवरात हड़पने के आरोप लगाए हैं। वहीं, 7–8 साल तक चले कथित रिश्ते के बाद दर्ज केस को लेकर सहमति, धोखा और कानून की भूमिका पर बहस तेज हो गई है। पुलिस जांच जारी है और सच्चाई सबूतों पर निर्भर करेगी।
अजमेर रेप मामला: आरोप, संदेह, कानून और सच्चाई की पड़ताल
क्या यह जबरन अपराध है या सहमति से बने रिश्ते का बाद का विवाद?
अजमेर के मांगलियावास थाना क्षेत्र में दर्ज यह मामला केवल एक एफआईआर नहीं है, बल्कि वह सामाजिक और कानूनी सवाल भी है, जो आजकल ऐसे कई मामलों में सामने आते हैं। एक युवती ने एक युवक पर गंभीर आरोप लगाए हैं—नशीला पदार्थ पिलाकर बलात्कार, शादी का झांसा, अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल, गर्भवती करने के बाद जबरन गर्भपात और जेवरात हड़पने जैसे आरोप। मामला 2018 से जुड़ा बताया गया है, यानी कथित रूप से यह रिश्ता वर्षों तक चला।
यहीं से समाज दो हिस्सों में बंट जाता है—
एक पक्ष कहता है, “अगर लड़की की मर्जी नहीं थी तो इतने साल चुप क्यों रही?”
दूसरा पक्ष कहता है, “डर, ब्लैकमेल और धोखे में चुप रहना मजबूरी हो सकती है।”
सच क्या है—यह भावनाओं से नहीं, जांच और सबूतों से तय होगा।
मामला क्या है? (तथ्यात्मक पृष्ठभूमि)
पीड़िता के अनुसार—
-
वर्ष 2018 में आरोपी ने प्रेम संबंध बनाने का दबाव डाला
-
बीमारी के दौरान आरोपी उसका पीछा करते हुए अस्पताल तक पहुंचा
-
डॉक्टर से पहचान का झांसा देकर भरोसा जीता
-
जूस में नशीला पदार्थ मिलाकर होटल ले गया
-
वहां उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, जिसे वह रेप बता रही है
-
बाद में आरोपी ने अश्लील वीडियो बना लिए
-
शादी का वादा कर, वीडियो वायरल करने की धमकी देकर संबंध बनाए रखे
-
इस दौरान उसे पता चला कि आरोपी पहले से शादीशुदा है
-
गर्भवती होने पर दवाइयों से गर्भपात कराया गया
-
जेवरात और नकदी भी हड़प ली गई
-
अब आरोपी धमकी दे रहा है
पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
सबसे बड़ा सवाल:

“अगर सब कुछ 7–8 साल तक चलता रहा, तो अचानक रेप का केस क्यों?”
यह सवाल आम आदमी के मन में आना स्वाभाविक है। लेकिन कानून इस सवाल को भावनात्मक नहीं, परिस्थितिजन्य तरीके से देखता है।
सहमति (Consent) स्थायी नहीं होती
कानून मानता है कि:
-
किसी एक समय दी गई सहमति
-
भविष्य के हर रिश्ते के लिए स्वतः मान्य नहीं हो जाती
अगर किसी समय सहमति डर, धमकी, ब्लैकमेल या धोखे में बदली हो, तो वह वैध नहीं मानी जाती।
शादी का झांसा: कब अपराध बनता है, कब नहीं?
यह इस केस का सबसे अहम कानूनी बिंदु है।
सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट लाइन:
अगर—
-
आरोपी शुरू से ही शादी करने का इरादा नहीं रखता था
-
और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा वादा किया
तो इसे धोखाधड़ी + बलात्कार माना जा सकता है।
लेकिन अगर—
-
दोनों के बीच प्रेम संबंध थे
-
शादी की बात बाद में बिगड़ी
-
या सामाजिक/पारिवारिक कारणों से शादी नहीं हो पाई
तो इसे रेप नहीं माना जाता।
यानी कोर्ट यह देखेगा कि
“नियत शुरुआत में क्या थी?”

अश्लील वीडियो और ब्लैकमेल का आरोप
अगर यह साबित होता है कि:
-
वीडियो वास्तव में मौजूद हैं
-
उनका इस्तेमाल डराने या चुप कराने के लिए किया गया
तो यह केवल रेप नहीं, बल्कि:
-
IT Act
-
आपराधिक धमकी
-
मानसिक उत्पीड़न
जैसे गंभीर अपराधों की श्रेणी में आएगा।
लेकिन अगर:
-
वीडियो सहमति से बने
-
या वीडियो का अस्तित्व ही साबित न हो
तो यह आरोप कमजोर हो सकता है।
गर्भपात (Abortion) का मुद्दा
यह पहलू अक्सर नजरअंदाज हो जाता है, लेकिन कानून में यह बहुत गंभीर है।
अगर:
-
महिला की स्वतंत्र सहमति के बिना
-
दबाव या धमकी में
-
या अवैध तरीके से
गर्भपात कराया गया हो—
तो यह:
-
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट
-
और IPC की अलग धाराओं के तहत अपराध बनता है।
यहां:
-
डॉक्टर की भूमिका
-
मेडिकल रिकॉर्ड
-
दवाइयों की जानकारी
सब निर्णायक होंगे।
आरोपी पहले से शादीशुदा था—इसका असर क्या?
अगर यह साबित होता है कि:
-
आरोपी ने अपनी शादी की सच्चाई छुपाई
-
और इसी आधार पर संबंध बनाए
तो यह धोखे का मजबूत आधार बन सकता है।
लेकिन अगर:
-
पीड़िता को पहले से जानकारी थी
-
या बाद में जानने के बाद भी संबंध जारी रहे
तो बचाव पक्ष इसे सहमति का तर्क बनाएगा।
झूठे मामलों की बहस: सच्चाई क्या है?

यह भी सच है कि:
-
कुछ मामलों में
-
रिश्ते बिगड़ने
-
पैसों या सामाजिक दबाव
के बाद रेप की धाराएं लगाई गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट खुद कह चुका है कि:
“रेप कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।”
लेकिन साथ ही अदालत यह भी कहती है:
“केवल इस डर से पीड़िता की बात को खारिज नहीं किया जा सकता।”
यानी:
-
हर केस झूठा नहीं
-
हर आरोप सच भी नहीं
जांच में क्या तय करेगा सच?
इस केस में सच्चाई इन बिंदुओं पर टिकेगी
मेडिकल और अस्पताल रिकॉर्ड
होटल एंट्री, CCTV
कॉल डिटेल्स और चैट
गर्भपात से जुड़े दस्तावेज
वीडियो का फॉरेंसिक विश्लेषण
गवाहों के बयान
यही तय करेंगे कि—
-
यह अपराध है
या -
आपसी सहमति से बने रिश्ते का बाद का विवाद
मीडिया और समाज की भूमिका
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा खतरा होता है—
-
ट्रायल से पहले फैसला
-
सोशल मीडिया पर चरित्र हनन
ना आरोपी को पहले अपराधी कहना सही है
ना पीड़िता को झूठा कहकर चुप कराना।
न्याय शोर से नहीं, सबूत से होता है।
अभी फैसला नहीं, जांच जरूरी
यह मामला:
-
न सिर्फ एक एफआईआर है
-
बल्कि हमारे समाज की जटिल सच्चाई भी है
आज यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि:
-
लड़की झूठ बोल रही है
या -
लड़का दोषी ही है
फैसला अदालत करेगी—
सबूतों के आधार पर, कानून के अनुसार।
सबसे ज़रूरी है:
निष्पक्ष जांच, संतुलित रिपोर्टिंग और जिम्मेदार सोच।
Hindu Solanki 
