राजस्थान कांग्रेस की नई सर्जरी: जंबो कार्यकारिणी खत्म, अब युवाओं और सामाजिक संतुलन पर दांव
राजस्थान कांग्रेस में संगठनात्मक बदलाव की बड़ी शुरुआत हो चुकी है। AICC के नए निर्देशों के तहत अब जिला कांग्रेस कार्यकारिणी जंबो नहीं बनेगी। 31 से 51 सदस्यों की सीमित टीम, 50% युवाओं की भागीदारी और SC-ST-OBC, अल्पसंख्यक व महिलाओं को अनिवार्य प्रतिनिधित्व जैसे सख्त नियम लागू किए गए हैं। कांग्रेस अब गुटबाजी और भीड़ की राजनीति छोड़कर साफ, संतुलित और जवाबदेह संगठन खड़ा करने की कोशिश में है। क्या यह बदलाव कांग्रेस को मजबूती देगा या पुराने नेताओं की नाराज़गी बढ़ाएगा—पूरी कहानी पढ़िए।
राजस्थान कांग्रेस की नई सर्जरी: जंबो कार्यकारिणी का दौर खत्म, अब “कम लोग–ज्यादा जिम्मेदारी” का फॉर्मूला
राजस्थान कांग्रेस में लंबे समय से चली आ रही “जंबो कार्यकारिणी” की परंपरा पर आखिरकार ब्रेक लग गया है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ने जिला कांग्रेस कमेटियों की कार्यकारिणी को लेकर सख्त और साफ़ पैरामीटर तय कर दिए हैं। अब न तो सिफारिशों की भरमार चलेगी और न ही भीड़ जुटाकर संगठन मजबूत दिखाने का खेल।
यह फैसला ऐसे वक्त में आया है, जब कांग्रेस लगातार चुनावी हार, अंदरूनी गुटबाजी और संगठनात्मक ढीलापन झेल रही है। राजस्थान जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में कांग्रेस अब कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। यही वजह है कि पार्टी ने “क्लीन एंड क्लियर” सिद्धांत अपनाते हुए संगठन को छोटा लेकिन प्रभावी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

क्या है पूरा मामला?
अब तक राजस्थान के कई जिलों में कांग्रेस की जिला कार्यकारिणी 80, 90甚至 100 से ज्यादा सदस्यों की बनती रही है।
इनमें से:
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कई नाम सिर्फ “सम्मान” के लिए होते थे
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कई लोग संगठन में सक्रिय नहीं होते थे
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कुछ नेता केवल अपने समर्थकों को एडजस्ट कराने के लिए नाम जुड़वाते थे
नतीजा ये हुआ कि संगठन कागज़ों में बड़ा दिखता था, लेकिन ज़मीन पर असर कमजोर रहता था।
अब AICC ने साफ कर दिया है कि:
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न्यूनतम 31 और अधिकतम 51 सदस्य ही होंगे
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इससे ज्यादा नामों को मंजूरी नहीं मिलेगी
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संख्या तय होगी विधानसभा क्षेत्रों की गिनती के आधार पर

कैसे बनेगी अब कांग्रेस की जिला कार्यकारिणी?
नए नियमों के तहत कांग्रेस ने पूरी गणित तय कर दी है:
1 विधानसभा संख्या के हिसाब से सदस्य
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जिन शहर जिला कांग्रेस कमेटियों के अंतर्गत 1 से 3 विधानसभा क्षेत्र आते हैं →
वहां 31 सदस्यीय कार्यकारिणी -
जिन जिलों में 3 से ज्यादा विधानसभा क्षेत्र आते हैं →
वहां 51 सदस्यीय कार्यकारिणी
यानी अब न मनमानी चलेगी, न “फलां नेता के कहने पर नाम जोड़ दो” वाली राजनीति।
युवाओं को आगे लाने की मजबूरी या मजबूती?
इस फैसले का सबसे अहम पहलू है — 50% सदस्य 50 साल से कम उम्र के अनिवार्य।
यह कोई सामान्य नियम नहीं, बल्कि कांग्रेस की एक स्वीकारोक्ति है कि:
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संगठन बूढ़ा हो चुका है
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युवा मतदाता पार्टी से दूर हो रहा है
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वही चेहरे, वही सोच, वही भाषण अब काम नहीं कर रहे
अब पार्टी चाहती है कि:
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छात्र राजनीति से निकले चेहरे
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सोशल मीडिया समझने वाले युवा
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ज़मीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता
सीधे निर्णय लेने वाली इकाई में आएं, न कि सिर्फ पोस्टर लगाने तक सीमित रहें।

सामाजिक संतुलन पर सख्ती: अब “नाम जोड़ दिए” से काम नहीं चलेगा
AICC ने साफ कर दिया है कि जब तक कार्यकारिणी में:
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अनुसूचित जाति
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अनुसूचित जनजाति
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अन्य पिछड़ा वर्ग
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अल्पसंख्यक
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महिलाएं
कुल मिलाकर 50% प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक पीसीसी उस सूची पर मुहर नहीं लगाएगी।
यानी अब जिलाध्यक्ष चाहकर भी सामाजिक समीकरणों की अनदेखी नहीं कर पाएंगे।
यह नियम सीधे उन नेताओं पर नकेल है, जो अब तक सिर्फ अपने गुट और जातीय प्रभाव के लोगों को आगे बढ़ाते रहे हैं।
डोटासरा का सख्त अल्टीमेटम: 10 फरवरी आख़िरी तारीख
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने सभी जिलाध्यक्षों को साफ निर्देश दे दिए हैं:
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10 फरवरी तक कार्यकारिणी की सूची प्रदेश कार्यालय भेजनी होगी
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अधूरी या असंतुलित सूची सीधे खारिज हो सकती है
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दोबारा मौका मिलने की कोई गारंटी नहीं
यह पहली बार है जब प्रदेश स्तर पर इतनी सख्ती दिखाई जा रही है।
बड़ा सवाल: क्या कांग्रेस अब कोई रिस्क नहीं लेना चाहती?
इस पूरे बदलाव के पीछे एक साफ़ राजनीतिक सोच दिखती है।
पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस को जिन वजहों से नुकसान हुआ, उनमें प्रमुख हैं:
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गुटबाजी
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संगठनात्मक ढीलापन
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कार्यकर्ताओं की अनदेखी
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टिकट और पदों में असंतुलन
अब पार्टी नेतृत्व समझ चुका है कि:
“भीड़ से संगठन मजबूत नहीं होता, भरोसेमंद और जिम्मेदार लोगों से होता है।”
यही कारण है कि कांग्रेस अब:
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कम लोगों को जिम्मेदारी देना चाहती है
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जवाबदेही तय करना चाहती है
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हर जिले में स्पष्ट नेतृत्व चाहती है
क्या इससे पुराने नेताओं का कद घटेगा?
बिलकुल, और यही वजह है कि अंदरखाने कई नेता नाराज़ भी हैं।
अब:
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हर सिफारिश मंजूर नहीं होगी
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“हम इतने साल से पार्टी में हैं” वाला तर्क कमजोर पड़ेगा
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सिर्फ अनुभव नहीं, काम और प्रभाव देखा जाएगा
कुछ वरिष्ठ नेताओं को लग रहा है कि यह फैसला उनके प्रभाव को सीमित कर देगा, लेकिन पार्टी अब यह जोखिम लेने को तैयार दिख रही है।
युवाओं के लिए मौका या सिर्फ कागज़ी बदलाव?
यह सवाल बेहद अहम है।
अगर ये नियम सिर्फ कागज़ों तक सीमित रहे, तो बदलाव का असर नहीं दिखेगा।
लेकिन अगर:
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युवाओं को वास्तविक फैसलों में शामिल किया गया
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उन्हें सिर्फ नाम नहीं, काम मिला
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सोशल मीडिया, संगठन और आंदोलन में भूमिका दी गई
तो यह कांग्रेस के लिए टर्निंग पॉइंट बन सकता है।

संगठन छोटा, लेकिन असरदार बनाने की कोशिश
राजस्थान कांग्रेस का यह फैसला साफ संकेत देता है कि पार्टी अब:
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पुराने ढर्रे पर नहीं चलना चाहती
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नुकसान कम करने की रणनीति अपना रही है
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2028 और उससे आगे की राजनीति की तैयारी कर रही है
यह प्रयोग सफल होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि
नियमों को जमीन पर कितनी ईमानदारी से लागू किया जाता है।
क्योंकि जनता अब सिर्फ घोषणा नहीं, परिणाम देखना चाहती है।
Hindu Solanki 
