क्या भारत के स्पेस प्रोग्राम में सैबोटाज की आशंका? PSLV के लगातार फेल मिशन और NSA डोभाल का गुप्त दौरा.........

भारत के सबसे भरोसेमंद रॉकेट PSLV के लगातार दो मिशन फेल होने के बाद देश के स्पेस प्रोग्राम पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। महज 9 महीनों में हुई इन असफलताओं के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर का गुप्त दौरा किया और वैज्ञानिकों के साथ बंद कमरे में बैठकों की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह दौरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर हुआ। जांच में तकनीकी खामी के साथ-साथ सैबोटाज के एंगल को भी खंगाला जा रहा है। क्या यह सिर्फ तकनीकी चूक है या भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के खिलाफ किसी बड़ी साजिश का संकेत? पूरी पड़ताल।

क्या भारत के स्पेस प्रोग्राम में सैबोटाज की आशंका?  PSLV के लगातार फेल मिशन और NSA डोभाल का गुप्त दौरा.........

PSLV की लगातार नाकामी और डोभाल का गुप्त दौरा: सिर्फ तकनीकी चूक या उससे कहीं ज़्यादा?

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय से दुनिया के लिए भरोसे, सटीकता और कम लागत का प्रतीक रहा है। इसी भरोसे का सबसे मज़बूत नाम रहा है—PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle)
चार दशकों में 90% से ज़्यादा सफलता दर, दर्जनों देशों के सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में पहुँचाने का रिकॉर्ड और “वर्कहॉर्स रॉकेट” की पहचान… लेकिन बीते 9 महीनों में PSLV के दो मिशनों का फेल होना, सिर्फ तकनीकी असफलता भर नहीं रह गया है।

अब यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में प्रवेश कर चुका है।

क्या हुआ है असल में?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक,
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने हाल ही में केरल स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) का गुप्त दौरा किया। यह दौरा सामान्य प्रोटोकॉल या औपचारिक निरीक्षण जैसा नहीं था।

  • डोभाल करीब दो दिन तक VSSC में रहे

  • उन्होंने सीनियर वैज्ञानिकों, मिशन डायरेक्टर्स और सिस्टम इंजीनियर्स के साथ बंद कमरे में बैठकें कीं

  • मीटिंग्स में कोई मीडिया ब्रीफिंग या आधिकारिक प्रेस नोट जारी नहीं किया गया

यही चुप्पी इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना रही है।

PSLV की नाकामी: क्यों बढ़ी चिंता?

ISRO जैसे संगठन में मिशन फेल होना नया नहीं है। लेकिन चिंता की वजह ये है कि:

  1. PSLV अब तक सबसे भरोसेमंद रॉकेट रहा है

  2. दोनों नाकामियाँ बेहद क्रिटिकल फेज (स्टेज सेपरेशन / नेविगेशन / कंट्रोल सिस्टम) में हुईं

  3. शुरुआती आंतरिक रिपोर्ट्स में एक जैसी तकनीकी खामियों की बात सामने आई

  4. फेलियर पैटर्न ने वैज्ञानिकों के बीच भी असहज सवाल खड़े कर दिए

यही वजह है कि मामला सिर्फ ISRO तक सीमित नहीं रहा।

सैबोटाज एंगल क्यों चर्चा में आया?

यह सवाल अचानक नहीं उठा।

कुछ अहम वजहें:

  • PSLV का उपयोग केवल सिविल सैटेलाइट्स तक सीमित नहीं

  • यह नेविगेशन, अर्थ ऑब्ज़र्वेशन और रणनीतिक मिशनों में भी इस्तेमाल होता है

  • भारत की स्पेस क्षमताएं सीधे तौर पर

    • सैन्य निगरानी

    • मिसाइल चेतावनी

    • साइबर और कम्युनिकेशन सिक्योरिटी
      से जुड़ी हैं

ऐसे में जानबूझकर सिस्टम को प्रभावित करना (Sabotage)—एक सैद्धांतिक संभावना के तौर पर जांच के दायरे में लाई गई है, न कि किसी निष्कर्ष के रूप में।

सैबोटाज क्या होता है?

सैबोटाज वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति या समूह छिपकर, अंदर से या चालाकी से किसी व्यवस्था को खराब करता है।

यह गलती नहीं होती,
यह इरादतन किया गया नुकसान होता है।

 सैबोटाज कैसे किया जाता है?

सैबोटाज कई तरीकों से हो सकता है:

 तकनीकी सैबोटाज

  • मशीन के पुर्ज़ों से छेड़छाड़

  • गलत पार्ट लगाना

  • सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी डालना

  • सेंसर या वायरिंग को नुकसान

 सूचना आधारित सैबोटाज

  • गलत डेटा देना

  • ज़रूरी जानकारी छुपाना

  • रिपोर्ट में जानबूझकर झूठ लिखना

 अंदरूनी सैबोटाज

  • संस्था के अंदर का ही कोई व्यक्ति

  • कर्मचारी, वैज्ञानिक, ठेकेदार या अधिकारी

 बाहरी सैबोटाज

  • दुश्मन देश

  • विदेशी एजेंसियां

  • साइबर अटैक या हैकिंग

 PSLV और ISRO के मामले में सैबोटाज क्यों चर्चा में है?

क्योंकि:

  • PSLV भारत का सबसे भरोसेमंद रॉकेट माना जाता है

  • दर्जनों सफल मिशन दे चुका है

  • लेकिन 9 महीनों में लगातार 2 मिशन फेल होना असामान्य है

  • इसी वजह से सरकार ने सिर्फ तकनीकी नहीं,
    जानबूझकर नुकसान (Sabotage Angle) की भी जांच शुरू की

 गलती और सैबोटाज में फर्क

गलती सैबोटाज
अनजाने में होती है जानबूझकर किया जाता है
सुधार की मंशा होती है नुकसान की नीयत होती है
सामान्य तकनीकी जोखिम गंभीर अपराध

 भारत में सैबोटाज कितना गंभीर अपराध है?

  • राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा अपराध

  • देशद्रोह तक के आरोप लग सकते हैं

  • आजीवन कारावास या कड़ी सज़ा संभव

 सोचने वाली बात

अगर देश का सबसे सुरक्षित स्पेस प्रोग्राम भी सुरक्षित नहीं,
तो सवाल सिर्फ रॉकेट का नहीं—
पूरे सिस्टम की सुरक्षा का है।

यही वजह है कि सैबोटाज शब्द इतना गंभीर माना जाता है।

डोभाल की भूमिका क्यों अहम है?

अजीत डोभाल केवल NSA नहीं हैं—
वह इंटेलिजेंस, काउंटर-सैबोटाज और स्ट्रैटेजिक थ्रेट असेसमेंट के विशेषज्ञ माने जाते हैं।

उनकी मौजूदगी यह संकेत देती है कि:

  • सरकार इसे सिर्फ “इंजीनियरिंग फेलियर” मानकर छोड़ना नहीं चाहती

  • हर संभावित एंगल—

    • तकनीकी

    • मानवीय चूक

    • साइबर हस्तक्षेप

    • अंदरूनी लापरवाही
      की जांच की जा रही है

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह दौरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर हुआ।

क्या सरकार ISRO पर दबाव बना रही है?

इस सवाल पर दो राय उभरती हैं।

पहला नजरिया:

सरकार अत्यधिक दबाव डाल रही है—

  • लगातार लॉन्च

  • कम समय

  • बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा

जिससे वैज्ञानिकों पर तनाव बढ़ा है।

दूसरा नजरिया:

सरकार जवाबदेही और सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहती है—

  • क्योंकि स्पेस अब केवल वैज्ञानिक क्षेत्र नहीं रहा

  • यह राष्ट्रीय सुरक्षा का सीधा मोर्चा बन चुका है

सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है।

क्या यह ISRO के लिए चेतावनी है?

ISRO के इतिहास में कई बार असफलताएँ आईं—
लेकिन हर बार उसने खुद को और मज़बूत किया

यह मामला:

  • संस्थान की साख पर सवाल नहीं

  • बल्कि सिस्टम को और मजबूत करने का अवसर हो सकता है

हालांकि, विश्वास बनाए रखने के लिए पारदर्शिता जरूरी होगी

आगे क्या हो सकता है?

संभावनाएं साफ हैं:

  • PSLV मिशनों की री-डिज़ाइन और री-वैलिडेशन

  • सिक्योरिटी ऑडिट और साइबर सेफ्टी की समीक्षा

  • लॉन्च प्रक्रिया में थर्ड पार्टी चेक

  • और शायद कुछ आंतरिक बदलाव भी

लेकिन फिलहाल सरकार और ISRO—दोनों ही चुप्पी साधे हुए हैं

 सवाल ज़रूरी हैं

यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि

“PSLV को जानबूझकर फेल किया गया”

लेकिन यह पूछना बिल्कुल जायज़ है कि—

  • क्या भारत का स्पेस प्रोग्राम अब नए खतरे के दौर में है?

  • क्या तकनीक से ज़्यादा अब सुरक्षा चुनौती बन चुकी है?

  • और क्या आने वाले समय में स्पेस मिशन, युद्ध से कम संवेदनशील नहीं रहेंगे?

जब देश का सबसे भरोसेमंद रॉकेट लड़खड़ाता है,
तो सवाल सिर्फ वैज्ञानिक नहीं रहते—
वे राष्ट्रीय हो जाते हैं।