अब 5वीं में भी फेल होंगे बच्चे! राजस्थान सरकार ने खत्म किया ऑटो प्रमोशन, 32 नंबर अनिवार्य

राजस्थान में 5वीं बोर्ड परीक्षा को लेकर बड़ा बदलाव किया गया है। सरकार ने ऑटो प्रमोशन सिस्टम खत्म कर दिया है। अब हर विषय में न्यूनतम 32 अंक लाना जरूरी होगा, वरना दोबारा परीक्षा देनी होगी। यह नियम 2026-27 सत्र से लागू होगा।

अब 5वीं में भी फेल होंगे बच्चे! राजस्थान सरकार ने खत्म किया ऑटो प्रमोशन, 32 नंबर अनिवार्य

बच्चो… अब सुधर जाओ! अब पास होना आसान नहीं रहेगा

राजस्थान के लाखों बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों के लिए यह खबर सिर्फ एक नियम में बदलाव नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा सिस्टम की दिशा बदलने वाला फैसला है।
सरकार ने साफ कर दिया है—अब 5वीं बोर्ड की परीक्षा में बिना पढ़े-लिखे आगे बढ़ने का दौर खत्म होने वाला है।

अब अगर कोई बच्चा 5वीं बोर्ड की परीक्षा में हर विषय में कम से कम 32 अंक नहीं लाता है, तो वह सीधे पास नहीं होगा।
यानी, अब तक जो “ऑटो प्रमोशन” की ढाल बच्चों को बिना तैयारी आगे बढ़ा देती थी, उसे हटा दिया गया है।

ऑटो प्रमोशन क्या था और क्यों हटा?

पिछले कई सालों से राजस्थान समेत देश के कई राज्यों में 5वीं और 8वीं तक के बच्चों को फेल नहीं किया जाता था
चाहे बच्चा कुछ भी लिखे, कुछ भी न लिखे—उसे अगली कक्षा में भेज दिया जाता था।

इस व्यवस्था का मकसद अच्छा था—

  • बच्चों पर परीक्षा का डर न रहे

  • स्कूल छोड़ने की दर कम हो

  • गरीब और ग्रामीण बच्चों को बराबरी का मौका मिले

लेकिन समय के साथ यही व्यवस्था शिक्षा की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई।

हकीकत क्या थी?

सरकारी आंकड़ों और शिक्षकों की ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी कहती है—

  • 6वीं में पहुंचे कई बच्चे ठीक से पढ़ नहीं पाते

  • 7वीं-8वीं में बच्चों को जोड़-घटाव तक नहीं आता

  • शिक्षक मजबूरी में आगे का सिलेबस पढ़ाते हैं, लेकिन बच्चे पीछे छूटते जाते हैं

  • आखिर में वही बच्चे 9वीं-10वीं में आकर स्कूल छोड़ देते हैं

यानी फेल न करने की नीति ने बच्चों को बचाया नहीं, बल्कि धीरे-धीरे पढ़ाई से दूर कर दिया

सरकार ने क्या बदला?

शिक्षा विभाग ने अब RTE (शिक्षा का अधिकार अधिनियम) के नियमों में संशोधन किया है।
इस संशोधन के तहत—

  • 5वीं बोर्ड परीक्षा अब सिर्फ औपचारिक परीक्षा नहीं रहेगी

  • हर विषय में 32 अंक लाना अनिवार्य होगा

  • जो बच्चा 32 अंक से कम लाएगा, उसे फेल घोषित नहीं किया जाएगा

  • बल्कि उसे दो महीने बाद दोबारा परीक्षा देने का मौका मिलेगा

यह नियम शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू होगा

फेल मतलब फेल नहीं!

सरकार यह भी साफ कर चुकी है कि—
यह फैसला बच्चों को सजा देने के लिए नहीं,
बल्कि सीखने का दूसरा मौका देने के लिए है।

अगर कोई बच्चा पहली परीक्षा में पास नहीं हो पाया—

  • उसे दो महीने का समय मिलेगा

  • उस दौरान रीमेडियल क्लासेस लगेंगी

  • शिक्षक उस बच्चे की कमजोरियों पर काम करेंगे

  • फिर दोबारा परीक्षा होगी

अगर दूसरी परीक्षा में भी बच्चा पास नहीं हुआ, तभी अगला फैसला लिया जाएगा।

शिक्षकों की राय क्या है?

ग्रामीण और शहरी इलाकों के कई शिक्षक इस फैसले को जरूरी लेकिन चुनौतीपूर्ण मानते हैं।

एक सरकारी स्कूल शिक्षक कहते हैं—

“अब तक बच्चों को पता था कि कुछ भी हो जाए, पास तो हो ही जाएंगे।
अब कम से कम उन्हें लगेगा कि पढ़ना ज़रूरी है।”

वहीं कुछ शिक्षक यह भी कहते हैं—

“जब तक स्कूलों में टीचर की कमी, संसाधनों की कमी और बच्चों पर घरेलू दबाव रहेगा, सिर्फ नियम बदलने से सब ठीक नहीं होगा।”

अभिभावक क्या सोच रहे हैं?

इस फैसले को लेकर माता-पिता की राय बंटी हुई है।

कुछ अभिभावक खुश हैं—

“अब बच्चों को मोबाइल से ज़्यादा किताब से दोस्ती करनी पड़ेगी।”

तो कुछ माता-पिता चिंतित भी हैं—

“गरीब परिवार के बच्चों पर दबाव बढ़ेगा। ट्यूशन कौन करवाएगा?”

असली सवाल: क्या सिस्टम तैयार है?

यह फैसला तभी सफल होगा, जब—

  • स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक हों

  • बच्चों को डर नहीं, समझ के साथ पढ़ाया जाए

  • परीक्षा को सजा नहीं, सुधार का मौका बनाया जाए

अगर सिर्फ नंबरों की दौड़ बनी रही,
तो यह नियम बच्चों पर बोझ भी बन सकता है।

क्या यह सही फैसला है?

सवाल आसान नहीं है।

लेकिन एक बात साफ है—
बिना पढ़े-लिखे पास होने से
न तो बच्चा मजबूत बनता है
और न ही देश।

शायद अब वक्त आ गया था कि—

  • बच्चों को जिम्मेदारी का अहसास हो

  • माता-पिता पढ़ाई को हल्के में न लें

  • और शिक्षा सिर्फ कागज़ी पास-फेल न रहे

यह फैसला सख्त जरूर है,
लेकिन अगर सही तरीके से लागू हुआ
तो यही नियम आने वाले समय में
मजबूत नींव वाले छात्र तैयार कर सकता है।

अब सवाल बच्चों से भी है,
माता-पिता से भी,
और सिस्टम से भी—

क्या हम सिर्फ पास होना चाहते हैं,
या सच में पढ़ा-लिखा भविष्य?