13 मिनट की संसद: हंगामा, आरोप और सवाल—क्या लोकतंत्र सिर्फ अभिनय बनकर रह गया है?
बजट सत्र के 9वें दिन लोकसभा सिर्फ 13 मिनट चली। राहुल गांधी को बोलने न देने पर हंगामा, कार्यवाही स्थगित। सवाल—क्या संसद में सब पहले से तय होता है?
13 मिनट की संसद और लोकतंत्र का लंबा सवाल
बजट सत्र के नौवें दिन लोकसभा की कार्यवाही महज़ 13 मिनट में सिमट गई। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल है, जिसके नाम पर संसद चलती है और देश चलता है। विपक्ष राहुल गांधी को बोलने देने की मांग कर रहा था, सत्ता पक्ष नियमों की दुहाई दे रहा था और अंत में वही हुआ, जो पिछले कुछ वर्षों में बार-बार होता आया है— हंगामा, स्थगन और फिर आरोपों का खेल।
राहुल गांधी का दावा बनाम सरकार का खंडन

राहुल गांधी ने सदन में कहा कि वे एक घंटे पहले लोकसभा स्पीकर के पास गए थे, जहां उन्हें यह भरोसा दिया गया कि बजट चर्चा से पहले उन्हें बोलने दिया जाएगा। लेकिन जैसे ही सदन शुरू हुआ, वैसा कुछ नहीं हुआ। राहुल ने सीधे पूछा—
“आप मुझे बोलने देंगी या नहीं?”
आसंदी पर बैठीं भाजपा सांसद संध्या राय ने जवाब दिया कि राहुल गांधी की ओर से किसी अन्य मुद्दे पर नोटिस नहीं आया है और यदि वे बजट पर बोलना चाहते हैं, तो बता दें। यहीं से टकराव खुलकर सामने आ गया।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने तुरंत राहुल के दावे को नकारते हुए कहा कि ऐसा कोई कमिटमेंट स्पीकर की ओर से नहीं किया गया।
इसके बाद वही दृश्य—नारेबाजी, शोर, हंगामा और अंततः कार्यवाही स्थगित।

क्या विपक्ष सच में बोलना चाहता है?
यह सवाल अब सिर्फ सत्ता पक्ष नहीं, बल्कि आम जनता भी पूछ रही है—
क्या विपक्ष सच में चर्चा चाहता है या सिर्फ एक चेहरे, एक मुद्दे और एक नारे के सहारे संसद चलाना चाहता है?
अगर विपक्ष के पास बजट पर ठोस सवाल हैं—
-
बेरोज़गारी
-
महंगाई
-
किसान
-
शिक्षा और स्वास्थ्य
तो फिर हर बार चर्चा की शुरुआत सिर्फ एक मांग से क्यों होती है?
राहुल गांधी का बोलना महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन क्या पूरी संसद का काम केवल इसी पर टिका है?
या फिर रणनीति यह है कि एक बिंदु पकड़ा जाए, हंगामा हो, कार्यवाही ठप हो और फिर बाहर आकर सरकार को दोष दिया जाए?
और सरकार? क्या वह भी स्थिति का लाभ उठाती है?
सरकार भी दूध की धुली नहीं है।
नियमों और प्रक्रियाओं का सहारा लेकर कई बार असहज सवालों से बचने की कोशिश साफ़ दिखाई देती है। विपक्ष को बोलने न देना, या सीमित करना, सरकार के लिए नया हथियार बन चुका है।

जब सदन नहीं चलता, तो सरकार को भी जवाब नहीं देने पड़ते।
बजट जैसे अहम मुद्दे पर विस्तृत बहस से बच निकलना, कहीं न कहीं सत्ता पक्ष के लिए भी सुविधाजनक हो जाता है।
परदे के पीछे की राजनीति: क्या सब पहले से तय होता है?
यह सवाल अब धीरे-धीरे सड़क से संसद तक पहुंच चुका है—
क्या संसद में होने वाला हंगामा पहले से स्क्रिप्टेड होता है?
देश कई बार देख चुका है कि
-
सदन के बाहर कांग्रेस और भाजपा के नेता आपस में हंसते-बोलते दिखते हैं
-
निजी बातचीत में कोई कटुता नहीं होती
-
लेकिन कैमरे के सामने आते ही तीखी राजनीति शुरू हो जाती है
तो क्या यह मान लिया जाए कि संसद अब एक राजनीतिक मंच से ज़्यादा राजनीतिक थिएटर बन चुकी है?
जहां तय होता है—
-
आज कौन बोलेगा
-
कौन रोकेगा
-
कितना हंगामा होगा
-
और कितनी देर में सदन स्थगित कर दिया जाएगा
ताकि बाहर निकलकर दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों को बता सकें—
“हमने पूरी कोशिश की, सामने वाला नहीं मान रहा था।”
लोकसभा स्पीकर पर अविश्वास प्रस्ताव: समाधान या नया ड्रामा?
अब विपक्ष स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात कर रहा है।
लेकिन सवाल यह है—
क्या इससे संसद की कार्यप्रणाली बदलेगी?
या यह भी सिर्फ एक और राजनीतिक हथकंडा बनकर रह जाएगा?
अगर संसद में संवाद की इच्छा ही नहीं है, तो चेहरा बदलने से व्यवस्था नहीं बदलेगी।
असली नुकसान किसका हो रहा है?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा नुकसान देश की जनता का हो रहा है।
जिस संसद से सवालों के जवाब निकलने चाहिए थे, वहां सिर्फ शोर निकल रहा है।
जिस लोकतंत्र में बहस होनी चाहिए थी, वहां बहाने गढ़े जा रहे हैं।
13 मिनट की कार्यवाही सिर्फ समय की बर्बादी नहीं है—
यह जनता के भरोसे की बर्बादी है।
आख़िरी सवाल
अगर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को पता है कि हंगामे से कुछ नहीं बदलने वाला,
अगर सब जानते हैं कि सदन नहीं चलेगा,
अगर सबको मालूम है कि कैमरे के सामने लड़ना है और बाहर मिलकर मुस्कुराना है—
तो फिर यह सब किसके लिए हो रहा है?
लोकतंत्र के लिए?
या सिर्फ जनता को व्यस्त रखने के लिए?

शायद यही सबसे बड़ा सवाल है, जिसका जवाब आज संसद के पास भी नहीं है।
Hindu Solanki 
