लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, संसद की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल

संसद के बजट सत्र में विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है। लगातार कार्यवाही स्थगित होने, प्रश्नकाल बाधित रहने और विपक्ष को बोलने का मौका न मिलने के आरोपों के बीच संसद की निष्पक्षता और गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, संसद की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल

 लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, संसद की निष्पक्षता पर उठे गंभीर सवाल

संसद के बजट सत्र के दौरान विपक्ष और सरकार के बीच टकराव अब एक नए और संवेदनशील मोड़ पर पहुँच गया है। विपक्षी दलों ने लोकसभा स्पीकर  के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस पेश कर दिया है। यह कदम केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि संसद की कार्यप्रणाली, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर उठते गहरे असंतोष का संकेत माना जा रहा है।

मंगलवार को बजट सत्र के 10वें दिन की शुरुआत भी इसी तनावपूर्ण माहौल में हुई। सुबह 11 बजे जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्ष ने ज़ोरदार हंगामा शुरू कर दिया। प्रश्नकाल, जिसे लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है, महज़ एक मिनट भी नहीं चल पाया। चेयर पर मौजूद पीसी मोहन ने हालात को देखते हुए सदन को 12 बजे तक स्थगित कर दिया।

दोपहर 12 बजे कार्यवाही दोबारा शुरू हुई, लेकिन स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। विपक्षी सांसद “We want justice” के नारे लगाते रहे और सरकार पर संसद में चर्चा से भागने का आरोप लगाते रहे। अंततः लगातार हंगामे के चलते सदन को दोपहर 2 बजे तक के लिए फिर स्थगित करना पड़ा।

विपक्ष का आरोप: स्पीकर निष्पक्ष नहीं रहे

विपक्ष का सीधा आरोप है कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला संवैधानिक पद पर रहते हुए निष्पक्ष भूमिका निभाने में असफल रहे हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि—

  • विपक्ष को अपनी बात रखने का पूरा अवसर नहीं दिया जा रहा

  • महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की अनुमति नहीं मिलती

  • बार-बार कार्यवाही स्थगित कर सरकार को असहज सवालों से बचाया जा रहा

इसी असंतोष के चलते अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया गया है। विपक्ष का तर्क है कि स्पीकर का पद पार्टी राजनीति से ऊपर होता है और यदि उस पर ही पक्षपात के आरोप लगने लगें, तो यह संसद की गरिमा के लिए खतरे की घंटी है।

सरकार का पक्ष: नियमों के तहत कार्रवाई

वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि लोकसभा स्पीकर संविधान और नियमों के अनुसार ही सदन का संचालन कर रहे हैं। सरकार का दावा है कि विपक्ष जानबूझकर कार्यवाही बाधित कर रहा है और जब लगातार हंगामा हो, तो स्पीकर के पास सदन स्थगित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

सत्तारूढ़ दल के नेताओं का कहना है कि अविश्वास प्रस्ताव लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इसका इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।

क्या स्पीकर को हटाया जाना चाहिए?

यह सवाल अब संसद से निकलकर देश की राजनीतिक और बौद्धिक बहस का हिस्सा बन चुका है। संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि—

  • स्पीकर को हटाना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है

  • यह तभी होना चाहिए जब निष्पक्षता के ठोस और प्रमाणित आधार हों

  • लेकिन लगातार आरोप लगना भी संस्था की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाता है

लोकतंत्र में धारणा (perception) भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितना वास्तविक आचरण। यदि जनता और विपक्ष का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगे कि स्पीकर पक्षपाती हैं, तो संसद की साख कमजोर होती है।

संसद की गरिमा पर असर

बार-बार स्थगन, नारेबाज़ी और अविश्वास प्रस्ताव जैसे कदमों से संसद की गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आम नागरिक यह पूछने लगा है कि—

  • क्या संसद बहस का मंच है या टकराव का अखाड़ा?

  • क्या प्रश्नकाल केवल औपचारिकता बनकर रह गया है?

  • क्या लोकतांत्रिक संस्थाएँ राजनीतिक खींचतान की शिकार हो रही हैं?

संसद की प्रतिष्ठा केवल भवन से नहीं, बल्कि उसमें बैठने वालों के आचरण और संयम से तय होती है।

लोकसभा स्पीकर का पद लोकतंत्र की आत्मा माना जाता है। उस पद पर बैठा व्यक्ति यदि संदेह के घेरे में आ जाए, तो नुकसान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी संसदीय व्यवस्था का होता है। विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव एक चेतावनी है—सरकार और स्पीकर दोनों के लिए।

अब ज़रूरत है संवाद, संयम और नियमों के सम्मान की। वरना सवाल यही रहेगा कि क्या संसद की गरिमा इसी तरह गिरती रहेगी?