क्या भारत में विरोध की सज़ा और समर्थन का इनाम तय है? पल्लवी पटेल की घटना से आज़ादी तक की राजनीति का आईना
पल्लवी पटेल के साथ पुलिसिया व्यवहार ने एक बार फिर भारत में सत्ता, विरोध और कानून की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर सरकार के विरोध में खुलेआम गालियां, पुतले जलाने और हिंसक प्रदर्शनों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, वहीं दूसरी ओर सत्ता से सवाल करने वालों पर कठोर रवैया अपनाया जाता है। यह रिपोर्ट आज़ादी से लेकर अब तक की राजनीति, बीजेपी की वैचारिक सोच, मीडिया की चयनात्मक चुप्पी और समाज में बढ़ते विभाजन का विश्लेषण करती है। क्या लोकतंत्र में विरोध अपराध बनता जा रहा है? क्या कानून सबके लिए समान है या राजनीतिक पहचान से तय होता है? पढ़िए पूरी पड़ताल।
भारत में सत्ता, समाज और दमन
पल्लवी पटेल की घटना से आज़ादी तक की राजनीति का आईना
एक दृश्य, जो बहुत कुछ कह जाता है
पुलिस की गाड़ी।
एक महिला नेता — पल्लवी पटेल।
बाल खींचते हुए पुलिसकर्मी।
कैमरे मौजूद हैं, लेकिन सवाल नहीं।
यह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं थी।
यह एक संदेश था —
कि कौन “अपने” हैं और कौन “असुविधाजनक”।
यही वह बिंदु है जहाँ से यह सवाल जन्म लेता है:
क्या भारत में कानून सबके लिए एक जैसा है?
या फिर पहचान, विचारधारा और राजनीतिक रुख तय करता है कि आपके साथ कैसा बर्ताव होगा?

“पिछड़े तब तक हिंदू हैं, जब तक चुनाव है”
यह वाक्य भावनात्मक जरूर है, लेकिन खोखला नहीं।
भारत की राजनीति में
-
जाति पहचान
-
धार्मिक पहचान
-
वर्ग पहचान
को ज़रूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया गया है।
चुनाव के समय:
-
पिछड़ा = हिंदू
-
दलित = हिंदू
-
आदिवासी = हिंदू
लेकिन जब वही तबका
-
सवाल पूछता है
-
सत्ता के खिलाफ खड़ा होता है
-
नीतियों का विरोध करता है
तो अचानक वह:
-
“उपद्रवी” हो जाता है
-
“अराजक” कहलाता है
-
“कानून व्यवस्था के लिए खतरा” बन जाता है
पल्लवी पटेल की गिरफ्तारी इसी मानसिकता का दृश्य रूप है।
विरोध सब करते हैं, लेकिन कार्रवाई कुछ पर ही क्यों?
आपने एक बहुत अहम तुलना रखी है।
UGC विरोध, मोदी विरोध, गालियाँ, पुतले
-
खुलेआम गालियाँ दी गईं
-
प्रधानमंत्री के पुतले जलाए गए
-
चप्पलें मारी गईं
-
मीडिया ने लाइव दिखाया
न कोई सख्त कार्रवाई
न बाल खींचे गए
न “देशद्रोह” की बहस
लेकिन जब
-
सत्ता समर्थक या
-
सत्ता से निकले लोग
-
सत्ता की सीमाओं में सवाल करते हैं
तो:
-
तुरंत पुलिस
-
तुरंत FIR
-
तुरंत “कानून व्यवस्था”
यह दोहरा मापदंड नहीं तो क्या है?

मीडिया: जो दिखे वही सच?
आज का मीडिया दो हिस्सों में बंट चुका है:
“स्वीकृत विरोध”
जिस विरोध से सत्ता को लाभ हो
या जो पहले से तय स्क्रिप्ट में फिट बैठे
“असुविधाजनक सवाल”
जिससे
-
जातीय गणित हिले
-
धार्मिक ध्रुवीकरण कमजोर पड़े
-
सत्ता की नैतिकता पर सवाल उठे
पल्लवी पटेल का मामला
दूसरी श्रेणी में आता है।
इसलिए:
-
प्राइम टाइम नहीं
-
डिबेट नहीं
-
आक्रोश नहीं
क्योंकि यह दृश्य
“सब ठीक है” वाले नैरेटिव को तोड़ता है।
आज़ादी से अब तक: सत्ता की सोच कैसे बदली?
यह समझना ज़रूरी है कि यह सब अचानक नहीं हुआ।
आज़ादी के बाद
-
सत्ता = सेवा का वादा
-
संविधान = सबसे ऊपर
-
विरोध = लोकतंत्र की आत्मा
70–80 का दशक
-
सत्ता पर पकड़ मजबूत
-
लेकिन विरोध को जगह
-
छात्र आंदोलन, किसान आंदोलन
90 का दशक
-
मंडल बनाम कमंडल
-
पहचान की राजनीति
-
धर्म का खुला इस्तेमाल
2014 के बाद
-
सत्ता = नैरेटिव
-
नैरेटिव = राष्ट्रवाद
-
राष्ट्रवाद = सवालों से परे
अब सवाल पूछना
“देश के खिलाफ” बताया जाने लगा।
BJP की वैचारिक यात्रा: संगठन से सत्ता तक
BJP को समझे बिना यह कहानी अधूरी है।
RSS की सोच
-
अनुशासन
-
एकरूपता
-
असहमति से असहजता
BJP का राजनीतिक रूप
-
चुनावी जीत प्राथमिक
-
सामाजिक इंजीनियरिंग
-
भावनात्मक ध्रुवीकरण
जब तक:
-
आप वोट बैंक हैं → सम्मान
-
आप सवाल हैं → समस्या
यही कारण है कि
समर्थक तब तक “अपने” हैं
जब तक वे चुप हैं।
कानून: किताब में बराबर, ज़मीन पर नहीं
संविधान कहता है:
कानून के सामने सब बराबर हैं
हकीकत कहती है:
-
आपके नाम से फर्क पड़ता है
-
आपकी जाति से फर्क पड़ता है
-
आपके विचार से फर्क पड़ता है
पल्लवी पटेल के साथ
जो हुआ, वह कानून की किताब में नहीं
बल्कि सत्ता की सुविधा में लिखा गया था।
महिला होना, नेता होना — दोहरी सज़ा

यह पहलू अक्सर नजरअंदाज हो जाता है।
एक महिला नेता के:
-
बाल खींचना
-
सार्वजनिक अपमान
-
पुलिस बल का असंवेदनशील व्यवहार
यह सिर्फ राजनीतिक नहीं
लैंगिक शक्ति प्रदर्शन भी है।
यह बताने के लिए कि:
“तुम अपनी जगह भूल रही हो”
बंटा हुआ समाज: सबसे बड़ी जीत किसकी?
जब समाज:
-
समर्थक बनाम विरोधी
-
देशभक्त बनाम देशद्रोही
-
हिंदू बनाम “अन्य”
में बंटता है,
तो सत्ता को सवालों से राहत मिलती है।
-
बेरोज़गारी पीछे छूट जाती है
-
महंगाई शोर में दब जाती है
-
शिक्षा और स्वास्थ्य हाशिए पर चले जाते हैं
और हम एक-दूसरे से लड़ते रहते हैं।
असली सवाल: लोकतंत्र बचा है या आदत बन गया है?

आज भारत में:
-
चुनाव होते हैं ✔️
-
संसद चलती है ❓
-
सवाल पूछने की आज़ादी ❓❓
अगर विरोध की कीमत:
-
अपमान
-
गिरफ्तारी
-
चरित्र हनन
हो जाए,
तो लोकतंत्र सिर्फ प्रक्रिया रह जाता है, आत्मा नहीं।
यह कहानी किसी एक पार्टी की नहीं
यह लेख
ना सिर्फ BJP के खिलाफ है
ना किसी एक नेता के समर्थन में।
यह सत्ता की उस मानसिकता के खिलाफ है
जो:
-
सवाल से डरती है
-
आलोचना को दुश्मनी मानती है
-
और चुप्पी को देशभक्ति कहती है
पल्लवी पटेल की घटना
एक चेतावनी है।
अगर आज हम चुप रहे,
तो कल सवाल पूछने वाला
कोई भी हो सकता है।
Hindu Solanki 
