लोकसभा में जोरदार हंगामा… प्रश्नकाल ठप! क्या राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव आएगा?
लोकसभा में हंगामे के कारण प्रश्नकाल नहीं चल सका और कार्यवाही दोपहर 12 बजे तक स्थगित करनी पड़ी। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर स्पीकर के चैंबर में हंगामा करने का आरोप लगाया और राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की बात कही। प्रियंका गांधी ने आरोपों से इनकार किया है। विपक्ष लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। संसद का सत्र अब और टकराव की ओर बढ़ता नजर आ रहा है।
नई दिल्ली से विशेष रिपोर्ट
संसद का सत्र शुरू होते ही लोकसभा का माहौल फिर गरमा गया। प्रश्नकाल जैसे ही आरंभ होना था, विपक्षी सांसद नारेबाजी करते हुए वेल में पहुंच गए। हाथों में प्लेकार्ड और पोस्टर लिए कई सदस्य अध्यक्षीय आसन के सामने डटे रहे। हंगामा बढ़ता देख अध्यक्षीय कुर्सी पर मौजूद के.पी. तेन्नेटी ने करीब सात मिनट की कार्यवाही के बाद सदन को दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दिया।
सदन के भीतर की यह तस्वीर बाहर की राजनीतिक बयानबाजी से और तेज हो गई, जब संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक वीडियो साझा किया। वीडियो के साथ उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी सांसदों ने स्पीकर के चैंबर के बाहर भी हंगामा किया और वातावरण को जानबूझकर अशांत बनाने की कोशिश की। रिजिजू ने यह भी दावा किया कि विपक्ष की ओर से कुछ सदस्यों को उकसाया गया, यहां तक कि अभद्र भाषा का इस्तेमाल हुआ।
इन आरोपों के केंद्र में कांग्रेस नेता राहुल गांधी का नाम भी आया। कुछ मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव (Privilege Motion) लाने पर विचार कर सकती है। रिजिजू ने संकेत दिया कि यदि सदन की गरिमा को ठेस पहुंची है, तो विशेषाधिकार प्रस्ताव लाना एक संसदीय विकल्प हो सकता है।
क्या होता है विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव?

संसद के दोनों सदनों के पास कुछ विशेषाधिकार होते हैं, जिनका उद्देश्य सदन की गरिमा और स्वतंत्रता को बनाए रखना है। यदि कोई सदस्य या बाहरी व्यक्ति सदन की कार्यवाही, अधिकार या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला आचरण करता है, तो उसके खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाया जा सकता है। प्रस्ताव स्वीकार होने पर इसे विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जाता है, जो जांच कर अपनी रिपोर्ट देती है।
हालांकि, प्रस्ताव लाने की चर्चा और उसे औपचारिक रूप से स्वीकार किए जाने में अंतर होता है। अभी तक सरकार की ओर से औपचारिक नोटिस की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह संभावना चर्चा का विषय बनी हुई है।
विपक्ष का पलटवार
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार के आरोपों को खारिज किया है। प्रियंका गांधी ने कथित उकसावे और अभद्र भाषा के आरोपों को निराधार बताया। विपक्ष का कहना है कि वे सदन में जनता के मुद्दे उठाना चाहते थे, लेकिन उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया गया।
विपक्षी दलों का आरोप है कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा से बचने के लिए सरकार हंगामे को बहाना बना रही है। उनका कहना है कि यदि सरकार चर्चा के लिए तैयार हो, तो सदन सुचारु रूप से चल सकता है।
सदन में टकराव की पृष्ठभूमि
हाल के सत्रों में यह देखा गया है कि प्रश्नकाल और शून्यकाल अक्सर हंगामे की भेंट चढ़ जाते हैं। प्रश्नकाल को लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान सांसद सरकार से जवाब मांगते हैं। लेकिन राजनीतिक टकराव के चलते कई बार यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है।
संसदीय कार्य मंत्री का कहना है कि सरकार चर्चा के लिए तैयार है, परंतु विपक्ष की रणनीति सदन को चलने नहीं देने की है। वहीं विपक्ष का दावा है कि सरकार गंभीर मुद्दों पर जवाब देने से बच रही है।
क्या बढ़ेगा टकराव?

सूत्रों के अनुसार, यदि विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाया जाता है तो सदन में टकराव और तेज हो सकता है। दूसरी ओर, विपक्ष लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। यदि ऐसा होता है तो यह सत्र और अधिक विवादों का केंद्र बन सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विशेषाधिकार प्रस्ताव का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक संदेश देने के लिए भी किया जाता है। हालांकि, इसकी प्रक्रिया लंबी होती है और अंतिम निर्णय तक पहुंचने में समय लगता है।
लोकतंत्र और संसदीय मर्यादा
संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद का केंद्र है। हंगामे और आरोप-प्रत्यारोप से जहां राजनीतिक तापमान बढ़ता है, वहीं जनता के मुद्दों पर ठोस चर्चा पीछे छूट जाती है।
पूर्व संसदीय अधिकारियों का कहना है कि विशेषाधिकार प्रस्ताव गंभीर विषय है और इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यदि सदन की गरिमा पर सवाल उठते हैं तो जांच आवश्यक है, लेकिन राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से इसे देखना उचित नहीं।
अगर विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव (Privilege Motion) पास हो जाता है, तो आगे क्या हो सकता है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि “पास” होने का मतलब दो स्तर पर हो सकता है:
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नोटिस स्वीकार होना (Speaker द्वारा)
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जांच के बाद दोष सिद्ध होना
अब आगे की पूरी प्रक्रिया सरल भाषा में समझिए:
अगर स्पीकर प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं
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मामला विशेषाधिकार समिति (Privileges Committee) को भेजा जाता है।
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समिति जांच करती है — संबंधित सांसद को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है।
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गवाह, दस्तावेज और रिकॉर्ड देखे जाते हैं।
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समिति रिपोर्ट तैयार कर सदन में पेश करती है।
इस चरण में तुरंत कोई सज़ा नहीं होती।
अगर समिति की रिपोर्ट में दोष सिद्ध होता है
सदन के पास कुछ शक्तियां होती हैं। स्थिति की गंभीरता के आधार पर ये कदम उठाए जा सकते हैं:
(1) चेतावनी (Warning)
सबसे हल्का कदम — सदन की ओर से फटकार या चेतावनी।
(2) निंदा प्रस्ताव (Admonition/Reprimand)
सदन के पटल पर खड़े होकर फटकार लगाई जा सकती है।
(3) निलंबन (Suspension)
निर्धारित समय के लिए सदन की कार्यवाही से निलंबित किया जा सकता है।
(4) कारावास (Rare Case)
संसद के पास सैद्धांतिक रूप से हिरासत में लेने की शक्ति है, लेकिन आधुनिक दौर में यह बेहद दुर्लभ है।
क्या सदस्यता खत्म हो सकती है?
सिर्फ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पास होने से स्वतः सदस्यता समाप्त नहीं होती।
सदस्यता खत्म करने के लिए अलग संवैधानिक प्रक्रिया (जैसे अयोग्यता, आपराधिक सजा आदि) जरूरी होती है।
राजनीतिक असर क्या हो सकता है?
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मामला राजनीतिक रूप से बड़ा मुद्दा बन सकता है।
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विपक्ष इसे “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” बता सकता है।
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सरकार इसे “संसद की गरिमा की रक्षा” का कदम बता सकती है।
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सदन में और टकराव बढ़ सकता है।
क्या अदालत जा सकते हैं?
आमतौर पर संसद की आंतरिक कार्यवाही में अदालत दखल नहीं देती।
लेकिन अगर संवैधानिक अधिकारों का सवाल उठता है, तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जा सकती है।
अगर विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पास भी हो जाता है, तो तुरंत गिरफ्तारी या सदस्यता खत्म होना तय नहीं होता।
ज्यादातर मामलों में यह चेतावनी, फटकार या निलंबन तक सीमित रहता है।
असल असर कानूनी से ज्यादा राजनीतिक होता है — और सदन का माहौल और गरम हो सकता है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या सरकार औपचारिक रूप से विशेषाधिकार प्रस्ताव का नोटिस देती है या यह केवल राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति साबित होगी। विपक्ष की ओर से भी स्पष्ट संकेत हैं कि वे अपने रुख पर कायम रहेंगे और अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी करेंगे।
सत्र के बाकी दिनों में और हंगामे के आसार जताए जा रहे हैं। यदि दोनों पक्षों के बीच संवाद का रास्ता नहीं निकला, तो विधायी कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
लोकतंत्र की खूबसूरती संवाद में है। सवाल यह है कि क्या संसद के भीतर यह संवाद संभव हो पाएगा, या फिर राजनीतिक टकराव ही सुर्खियां बटोरता रहेगा? आने वाले दिनों में सदन का रुख इस बहस का जवाब देगा।
Hindu Solanki 
