संसद के बाहर राहुल गांधी का मीडिया पर हमला, बोले– ‘ऑब्जेक्टिव रहिए, देश के साथ अन्याय मत कीजिए’
संसद परिसर में राहुल गांधी ने मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। ‘प्रिविलेज मोशन’ और ‘कोड वर्ड’ टिप्पणी के बीच उन्होंने कहा कि मीडिया को ऑब्जेक्टिव रहना चाहिए। जानिए पूरा मामला।
संसद परिसर में राहुल गांधी का मीडिया पर निशाना, बोले— “ऑब्जेक्टिव रहना आपकी जिम्मेदारी”
संसद के बाहर मीडिया से बातचीत के दौरान कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने मीडिया की भूमिका और निष्पक्षता को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, “क्या आज के लिए यही कोड वर्ड है? मुझे पहले से कोड वर्ड बता दो। कल यह ‘ऑथेंटिकेट’ था, और आज यह ‘प्रिविलेज मोशन’ है।”
राहुल गांधी का इशारा उन सवालों की ओर था जो हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव (प्रिविलेज मोशन) को लेकर उनसे पूछे जा रहे थे। उन्होंने मीडिया से कहा कि वह किसी एक राजनीतिक दल के दृष्टिकोण को बिना जांचे-परखे लगातार प्रसारित न करे।
“कम से कम थोड़ा ऑब्जेक्टिव बनिए”
राहुल गांधी ने कहा,
“क्या आप पूरी तरह से BJP के लिए काम नहीं करें, कम से कम थोड़ा ऑब्जेक्टिव काम करने की कोशिश तो करो। यह सच में शर्मनाक हो जाता है। यह बहुत ज्यादा है। आप जिम्मेदार लोग हैं। मीडिया के लोग हैं; आपकी जिम्मेदारी है कि आप ऑब्जेक्टिव रहें।”
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि कुछ चैनल और प्लेटफॉर्म एकतरफा नैरेटिव को आगे बढ़ाते हैं और उसी आधार पर पूरे कार्यक्रम तैयार करते हैं। उनके मुताबिक, इससे लोकतांत्रिक विमर्श प्रभावित होता है।
सियासी पृष्ठभूमि
हाल के दिनों में संसद के भीतर और बाहर कई मुद्दों पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच टकराव देखने को मिला है। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव को लेकर भी बयानबाजी तेज है। ऐसे माहौल में मीडिया की कवरेज को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर नया नहीं है।

सत्तापक्ष अक्सर विपक्ष पर भ्रामक बयान देने का आरोप लगाता है, जबकि विपक्ष मीडिया के एक हिस्से पर सरकार के पक्ष में झुकाव का आरोप लगाता रहा है। राहुल गांधी की ताजा टिप्पणी इसी बहस का हिस्सा मानी जा रही है।
लोकतंत्र में मीडिया की क्या भूमिका होनी चाहिए?
राहुल गांधी के बयान ने एक बड़ा सवाल फिर सामने ला दिया है— लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की जिम्मेदारी क्या है?
1. निष्पक्षता और संतुलन
मीडिया का पहला दायित्व तथ्यों की जांच कर संतुलित प्रस्तुति देना है। किसी भी राजनीतिक बयान या आरोप को ज्यों का त्यों प्रसारित करने के बजाय उसकी पुष्टि और संदर्भ देना जरूरी है।
2. सत्ता से सवाल
लोकतंत्र में मीडिया को “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। इसका मतलब है कि वह सरकार से सवाल पूछे, नीतियों की पड़ताल करे और जवाबदेही सुनिश्चित करे—चाहे सत्ता में कोई भी दल हो।
3. विपक्ष की भी जांच
सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि विपक्ष के दावों और आरोपों की भी समान रूप से जांच होनी चाहिए। विश्वसनीयता का आधार यही संतुलन है।
4. जनहित सर्वोपरि
मीडिया का अंतिम उद्देश्य राजनीतिक दलों की लड़ाई नहीं, बल्कि आम नागरिक के हितों को सामने रखना होना चाहिए—चाहे वह महंगाई का मुद्दा हो, रोजगार, शिक्षा या सुरक्षा।
संसद के बाहर राहुल गांधी की टिप्पणी ने मीडिया की निष्पक्षता पर चल रही बहस को फिर हवा दे दी है। यह बहस केवल एक दल या नेता तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक लोकतांत्रिक ढांचे से जुड़ी है।
आखिरकार, लोकतंत्र की मजबूती इस पर निर्भर करती है कि सत्ता, विपक्ष और मीडिया—तीनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का संतुलित निर्वहन करें। सवाल यह है कि क्या मौजूदा माहौल में यह संतुलन कायम रह पा रहा है, या फिर भरोसे की खाई और चौड़ी हो रही है?
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