राइट टू हेल्थ पर राजस्थान में सियासी संग्राम: खींवसर के बयान पर गहलोत का पलटवार, जनता के इलाज पर राजनीति तेज

राजस्थान में राइट टू हेल्थ को लेकर सियासत गरमा गई है। चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के बयान कि “राइट टू हेल्थ की जरूरत नहीं” पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कड़ा पलटवार किया है। गहलोत ने इसे गरीब और मध्यम वर्ग के साथ अन्याय बताया, जबकि भाजपा सरकार पर मेडिकल लॉबी के दबाव में काम करने का आरोप लगाया। विधानसभा से लेकर मीडिया तक इस मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

राइट टू हेल्थ पर राजस्थान में सियासी संग्राम: खींवसर के बयान पर गहलोत का पलटवार, जनता के इलाज पर राजनीति तेज

राजस्थान में ‘राइट टू हेल्थ’ पर सियासी संग्राम: बयान से बढ़ी बहस, मंशा और मॉडल पर टकराव

राजस्थान विधानसभा में ‘राइट टू हेल्थ’ को लेकर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं। चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के उस बयान के बाद सियासी तापमान और बढ़ गया, जिसमें उन्होंने कहा कि “राइट टू हेल्थ की लोगों को जरूरत ही नहीं है।” इस पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीखा पलटवार करते हुए इसे निंदनीय बताया और कहा कि बढ़ते मेडिकल खर्च से जूझ रहे गरीब व मध्यम वर्ग के लिए यह “जख्मों पर नमक” जैसा है।

क्या है विवाद की जड़?

कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ‘राइट टू हेल्थ’ की परिकल्पना की गई थी। गहलोत का कहना है कि चिरंजीवी योजना और निरोगी राजस्थान जैसी यूनिवर्सल हेल्थकेयर पहलों के बावजूद आपातकालीन स्थिति में किसी मरीज को इलाज से वंचित न रहना पड़े—इसी सोच से यह कानून लाया गया।
दूसरी ओर, भाजपा सरकार का तर्क है कि कानून के क्रियान्वयन, नियमों की व्यवहारिकता और निजी अस्पतालों पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे मुद्दों पर गंभीर चुनौतियां हैं, जिनका समाधान जरूरी है।

खींवसर का पक्ष

मंत्री खींवसर ने संकेत दिया कि मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे और योजनाओं के रहते अलग से ‘राइट टू हेल्थ’ की जरूरत पर पुनर्विचार होना चाहिए। उनका इशारा इस ओर भी माना जा रहा है कि बिना स्पष्ट नियमों और वित्तीय प्रावधानों के कानून लागू करने से जमीनी स्तर पर भ्रम और टकराव बढ़ सकता है।

गहलोत का जवाब

अशोक गहलोत ने कहा कि भाजपा सरकार नियम बनाने में विफल रही है और अब बहानेबाजी कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार मेडिकल लॉबी के दबाव में कानून को कमजोर कर रही है, जबकि आम जनता को महंगे इलाज से राहत देना प्राथमिकता होनी चाहिए।

असली सवाल: मंशा बनाम मॉडल

क्या भाजपा स्वास्थ्य को लेकर गंभीर नहीं है? या फिर विवाद लागू करने के तरीके और वित्तीय मॉडल पर है?
विश्लेषकों के मुताबिक, बहस दो स्तरों पर है:

  1. मंशा (Intent): सभी दल सार्वजनिक रूप से स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने की बात करते हैं।

  2. मॉडल (Implementation): आपातकालीन इलाज का दायित्व, भुगतान की प्रक्रिया, निजी अस्पतालों की भूमिका, और राज्य पर वित्तीय बोझ—ये वे बिंदु हैं जिन पर मतभेद गहरे हैं।

निजी अस्पतालों की चिंता

कानून के तहत आपातकालीन इलाज देने के बाद भुगतान कैसे और कब होगा—यह बड़ा प्रश्न है। निजी अस्पतालों ने पहले भी आशंका जताई थी कि भुगतान में देरी या अस्पष्ट प्रक्रिया से सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

जनता की अपेक्षा

मेडिकल खर्च लगातार बढ़ रहा है। ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए आपातकालीन इलाज का खर्च विनाशकारी साबित हो सकता है। ऐसे में ‘राइट टू हेल्थ’ जैसी पहल से उम्मीदें स्वाभाविक हैं।

कैबिनेट और विभागीय स्तर पर नियमों की समीक्षा, वित्तीय प्रावधानों की स्पष्टता और हितधारकों—डॉक्टर्स, अस्पतालों, बीमा एजेंसियों—के साथ संवाद से समाधान निकल सकता है।

राजनीतिक बयानबाजी के बीच मूल प्रश्न वही है:

  • क्या कानून को बेहतर नियमों के साथ प्रभावी बनाया जाएगा?

  • या फिर इसे संशोधित/सीमित कर नया मॉडल लाया जाएगा?

जनता के लिए अहम यह है कि आपातकाल में इलाज बिना बाधा मिले और खर्च का बोझ कम हो। सियासी आरोप-प्रत्यारोप से परे, आने वाले सत्रों में ठोस नीति स्पष्टता ही इस बहस का असली जवाब देगी।