2018 की भर्तियों का काला सच: मेरिट से खिलवाड़, मेहनत से धोखा और युवाओं के भविष्य पर डाका

माइनस से मेरिट तक: क्या यही चयन प्रक्रिया है?

2018 की भर्तियों का काला सच: मेरिट से खिलवाड़, मेहनत से धोखा और युवाओं के भविष्य पर डाका

राजस्थान में सरकारी नौकरी का सपना देखने वाले लाखों युवाओं के लिए साल 2018 एक उम्मीद लेकर आया था। सुपरवाइज़र, लेब सहायक और कृषि पर्यवेक्षक जैसी भर्तियों ने युवाओं को भरोसा दिलाया कि मेहनत रंग लाएगी। लेकिन आज, वर्षों बाद, जब जांच की परतें खुल रही हैं, तो वही भर्तियां युवाओं के साथ सबसे बड़ा धोखा बनकर सामने खड़ी हैं।

यह कोई साधारण अनियमितता नहीं, बल्कि मेरिट सिस्टम पर सुनियोजित हमला है—
जहाँ फेल को पास और पास को फेल किया गया।

माइनस से मेरिट तक: क्या यही चयन प्रक्रिया है?

जांच में सामने आया तथ्य चौंकाने वाला है।
एक अभ्यर्थी, जिसके मूल अंक माइनस 6 थे, उसके नंबर बढ़ाकर 265 कर दिए गए।


यानी जो अभ्यर्थी परीक्षा में पूरी तरह असफल था, वह अचानक मेरिट सूची में जगह बना लेता है।

अब सवाल सीधा है—
अगर माइनस नंबर वाला पास हो सकता है, तो फिर परीक्षा का मतलब क्या रह जाता है?
क्या OMR शीट अब मेहनत नहीं, पहचान देखती है?

4th ग्रेड जैसी भर्तियों में 80% से ज्यादा कटऑफ: क्या यह भी उसी सिस्टम का हिस्सा है?

यह मामला केवल 2018 की भर्तियों तक सीमित नहीं दिखता।
आज हालात यह हैं कि चतुर्थ श्रेणी (4th ग्रेड) की भर्तियों में भी 80% से ज्यादा कटऑफ जा रही है।

जहाँ एक ओर सरकार बेरोजगारी कम करने के दावे करती है,
वहीं दूसरी ओर ऐसी कटऑफ यह सवाल खड़ा करती है—

क्या सरकार वाकई युवाओं को नौकरी देना चाहती है,
या भर्तियां सिर्फ आंकड़ों का खेल बन चुकी हैं?

38 OMR शीट में छेड़छाड़, लेकिन चयन 18 का ही क्यों?

जांच में यह भी सामने आया कि 38 अभ्यर्थियों की OMR शीट में गड़बड़ी की गई,
लेकिन अंतिम चयन केवल 18 अभ्यर्थियों का हुआ।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

  • बाकी 20 अभ्यर्थियों के नाम क्यों दबा दिए गए?

  • क्या वे ज्यादा ताकतवर थे?

  • क्या उनके नाम सामने आने से “ऊपर तक” बात पहुंच जाती?

यदि सिस्टम साफ है, तो पूरी सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?

रिकॉर्ड गायब, सवाल जिंदा

सबसे गंभीर और खतरनाक पहलू यह है कि
2024 में इन भर्तियों से जुड़ा मूल OMR रिकॉर्ड ही गायब हो गया।

जब जांच तेज हुई,
जब जवाब मांगे जाने लगे,
तभी सबूत गायब हो जाना—

क्या यह संयोग है या सबूत मिटाने की साजिश?
रिकॉर्ड किसके आदेश पर और किसकी निगरानी में गायब हुआ?

2019 से 2025 तक सरकार क्या करती रही?

इस पूरे मामले में एक और बड़ा सवाल समय को लेकर है।

  • दलाल 2019 में पकड़े गए

  • रिकॉर्ड 2024 में गायब हुआ

  • गिरफ्तारियां 2025 में हुईं

तो फिर—

बीच के पांच साल तक सरकार और सिस्टम क्या कर रहा था?
फाइलें क्यों दबाई गईं?
छात्रों की आवाज क्यों अनसुनी की गई?

छात्रों की आवाज: मेहनत करें या सिस्टम से लड़ें?

आज राजस्थान का युवा सबसे ज्यादा भ्रम में है।
वह पूछ रहा है—

क्या अब पढ़ाई से नौकरी नहीं मिलेगी?

क्या हर भर्ती में “सेटिंग” जरूरी है?

क्या सामान्य वर्ग, ग्रामीण और गरीब छात्र सिर्फ आंकड़े भर हैं?

सरकारी नौकरी कभी सामाजिक न्याय और स्थिर भविष्य का प्रतीक थी।
आज वही नौकरी अविश्वास और डर का कारण बनती जा रही है।

SOG जांच से उम्मीद, लेकिन भरोसा अधूरा

मामले की जांच चल रही है, गिरफ्तारियां भी हुई हैं।
लेकिन छात्रों का भरोसा तभी लौटेगा जब—

सभी दोषियों के नाम सामने आएं
 राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण की परत खुले
 जिन छात्रों का चयन छीना गया, उन्हें न्याय मिले
 भविष्य की भर्तियों में पारदर्शिता की गारंटी हो

 यह सिर्फ घोटाला नहीं, यह पीढ़ी के भविष्य का सवाल है

2018 की भर्ती एक उदाहरण है,
लेकिन सवाल पूरे सिस्टम पर है।

अगर परीक्षा का परिणाम बदला जा सकता है,

तो फिर मेहनत किस लिए?
अगर रिकॉर्ड गायब हो सकते हैं,
तो फिर न्याय किससे मांगे?

सरकार को समझना होगा—
युवा सिर्फ नौकरी नहीं मांग रहा,
वह ईमानदार सिस्टम मांग रहा है।