"हिंदू-हिंदू भाई-भाई" का खोखलापन: EWS चुपचाप आया, UGC नियम पर सड़कें क्यों जल रही ?
EWS आरक्षण और UGC इक्विटी नियमों पर आई प्रतिक्रियाएं यह संकेत देती हैं कि सामाजिक नीतियों को लेकर देश में दृष्टिकोण अब भी समान नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी कानून का मूल्यांकन उसके उद्देश्य, क्रियान्वयन और प्रभाव के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल आशंकाओं और राजनीतिक धारणाओं के आधार पर। UGC इक्विटी नियम 2026 ने एक बार फिर यह बहस केंद्र में ला दी है कि शिक्षा व्यवस्था में समानता, सम्मान और निष्पक्षता को सुनिश्चित करने के लिए कानूनों की भूमिका क्या होनी चाहिए और समाज उन्हें किस दृष्टि से स्वीकार करता है।
भारत में सामाजिक न्याय से जुड़े कानून हमेशा केवल कानूनी मुद्दा नहीं रहे, बल्कि सामाजिक चेतना और सामूहिक मानसिकता की परीक्षा भी रहे हैं। वर्ष 2019 में लागू किए गए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण और वर्ष 2026 में लागू UGC इक्विटी नियमों पर आई प्रतिक्रियाएँ इसी मानसिकता के अंतर को स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं।

EWS आरक्षण, जो सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए 10 प्रतिशत कोटा लेकर आया, अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण तरीके से स्वीकार कर लिया गया। न बड़े आंदोलन हुए, न व्यापक विरोध, न ही “दुरुपयोग” या “मेरिट खत्म होने” की तीखी बहस। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि समाज के एक बड़े हिस्से ने इसे गरीबी के आधार पर दी जाने वाली सहायता के रूप में देखा और सहानुभूति दिखाई।
लेकिन जब UGC इक्विटी नियम 2026 लागू हुए, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में SC/ST/OBC छात्रों और कर्मचारियों को जातिगत भेदभाव से सुरक्षा देना है, तो माहौल अचानक बदल गया। विरोध शुरू हुआ, सड़कों पर प्रदर्शन हुए और यह आशंका जताई गई कि इन नियमों का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वह बिंदु है जहां समाज के दोहरे मानदंडों पर सवाल खड़े होते हैं।

यदि किसी व्यवस्था में भेदभाव नहीं हो रहा है, तो उसे रोकने वाले कानून से भय क्यों होना चाहिए? यह सवाल असहज जरूर है, लेकिन आवश्यक भी। सामाजिक न्याय के कानून अक्सर उस असमानता को संबोधित करते हैं, जिसे लंबे समय तक “सामान्य” मान लिया गया हो। जब वही असमानता कानून के दायरे में आती है, तो प्रतिरोध स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
इतिहास गवाह है कि भारत में SC/ST आरक्षण, मंडल आयोग की सिफारिशें और अन्य सामाजिक सुधारों को हमेशा तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा है। इसके उलट, EWS आरक्षण बिना किसी बड़े सामाजिक टकराव के लागू हो गया। यह अंतर बताता है कि समस्या अक्सर आरक्षण या कानून से नहीं, बल्कि उससे लाभ पाने वाले समूह से जुड़ी होती है।

UGC इक्विटी नियमों को लेकर उठाई जा रही “मेरिट” की बहस भी नई नहीं है। मेरिट का प्रश्न तब मुखर होता है, जब हाशिए पर खड़े वर्गों को सुरक्षा या अवसर दिए जाते हैं, लेकिन वही तर्क आर्थिक आधार पर दिए गए लाभों के समय कमजोर पड़ जाता है। यह चयनात्मक दृष्टिकोण नीति से ज्यादा मानसिकता को उजागर करता है।
साथ ही, यह भी सच है कि किसी भी कानून की सफलता उसके संतुलित और निष्पक्ष क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। यदि UGC इक्विटी नियमों का दुरुपयोग होता है, तो उसे रोकने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया और पारदर्शिता जरूरी है। लेकिन संभावित दुरुपयोग की आशंका के आधार पर किसी कानून के मूल उद्देश्य को ही खारिज कर देना, सामाजिक न्याय की दिशा में पीछे ले जाने जैसा है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम नीतियों को “हम” और “वे” के चश्मे से देखने के बजाय, उनके उद्देश्य और प्रभाव के आधार पर आंकें। शिक्षा संस्थान केवल डिग्री देने की जगह नहीं, बल्कि समानता और सम्मान की प्रयोगशाला भी होते हैं। यदि वहां भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए नियम ही असहज कर दें, तो आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है।

UGC इक्विटी नियम 2026 ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सामाजिक न्याय की राह आसान नहीं होती। यह राह सवाल पूछती है, असहज करती है और स्थापित धारणाओं को चुनौती देती है। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यही प्रक्रिया अंततः अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था की ओर ले जाती है।

