बैलगाड़ियों में लाखों का मायरा: भीलवाड़ा में तीन भाइयों ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा

भीलवाड़ा में तीन भाइयों ने बहन के घर मायरा सजी-धजी बैलगाड़ियों में पहुंचाया। ढोल-नगाड़ों और लोक नृत्य के साथ निकले इस पारंपरिक काफिले ने राजस्थान की संस्कृति को जीवंत कर दिया।

बैलगाड़ियों में लाखों का मायरा: भीलवाड़ा में तीन भाइयों ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा
बहन के घर मायरा बैलगाड़ियों में पहुंचाया

राजस्थान की धरती पर परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत हैं, जितनी सदियों पहले थीं। आधुनिक दौर में जहां शादियों में लग्जरी कारों और महंगे काफिलों का चलन बढ़ गया है, वहीं भीलवाड़ा के माली परिवार ने अनोखी मिसाल पेश करते हुए बहन के घर मायरा बैलगाड़ियों में पहुंचाया।

पांच सजी-धजी बैलगाड़ियों का अनोखा काफिला

माणिक्य नगर क्षेत्र से तीन भाई अपने परिवारजनों के साथ मायरा लेकर निकले। करीब दो किलोमीटर दूर कुंवाड़ा रोड स्थित राधेश्याम वाटिका में भांजी की शादी थी, जहां मायरा (भात) भरने की रस्म निभानी थी।

इस खास मौके के लिए भाइयों ने महंगी SUV या कारों की जगह पांच खूबसूरती से सजी बैलगाड़ियों को चुना। बैलगाड़ियां फूलों, रंग-बिरंगे कपड़ों और पारंपरिक सजावट से सुसज्जित थीं, जो पूरे रास्ते आकर्षण का केंद्र बनी रहीं।

लोक संगीत और नृत्य से गूंजा रास्ता

काफिले के आगे-आगे लोक कलाकार मधुर धुनें बजाते हुए चल रहे थे। कच्छी घोड़ी नृत्य और ढोल-नगाड़ों की थाप ने माहौल को उत्सवमय बना दिया। पूरे रास्ते लोग इस दृश्य को देखने के लिए रुकते नजर आए। पारंपरिक अंदाज में निकला यह मायरा जुलूस हर किसी के लिए यादगार बन गया।

नई पीढ़ी को दिया संस्कृति से जुड़ने का संदेश

परिवार का कहना है कि यह निर्णय केवल एक रस्म निभाने के लिए नहीं था, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास भी था।

लग्जरी और आधुनिकता के इस दौर में बैलगाड़ियों का यह काफिला यह संदेश दे गया कि राजस्थान की संस्कृति और परंपराएं आज भी उतनी ही मजबूत और सम्मानित हैं।