सोशल मीडिया का ‘मसीहा’ चेहरा, भर्ती का स्याह सच ...आलोक राज की कहानी
“भर्ती निकालो, लेकिन नौकरी मत दो” — क्या यही मंशा?
4th ग्रेड भर्ती में 80% कटऑफ, 50 हजार पदों पर भी युवाओं के हाथ खाली — सिस्टम फेल या सुनियोजित खेल?
राजस्थान में इन दिनों एक चेहरा सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय और लोकप्रिय दिखाई देता है — आलोक राज।

हर ट्वीट का जवाब, छात्रों के मीम्स पर हल्की-फुल्की टिप्पणियां, और युवाओं से सीधे संवाद — पहली नजर में लगता है कि सिस्टम अब “संवेदनशील” हो गया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया की यह सक्रियता ज़मीनी हकीकत को ढकने का जरिया तो नहीं?
हंसते-हंसाते जवाब, लेकिन चयन सूची में सन्नाटा
छात्र पूछते हैं —
“सर, नंबर अच्छे हैं, फिर भी चयन नहीं हुआ?”
जवाब आता है —
“कटऑफ हाई चली गई ”
यहीं से असली कहानी शुरू होती है।

राज्य में 4th ग्रेड भर्ती के तहत 50 हजार से अधिक पदों पर नियुक्ति की गई। सरकार ने इसे “रिकॉर्ड भर्ती” बताकर पीठ थपथपाई।
लेकिन जब परिणाम सामने आए, तो कटऑफ 80% से ऊपर देखकर लाखों अभ्यर्थियों के होश उड़ गए।
सवाल सीधा है —
जब इतनी बड़ी संख्या में पद थे, तो कटऑफ इतनी असामान्य रूप से ऊंची क्यों गई?
जो फेल हुए, वो लाखों… पास कौन हुआ?

राजस्थान जैसे राज्य में, जहां ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्र सीमित संसाधनों में पढ़ते हैं, वहां 80–85% कटऑफ सामान्य नहीं, अस्वाभाविक मानी जा रही है।
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क्या पेपर का स्तर जरूरत से ज्यादा आसान था?
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क्या नॉर्मलाइजेशन में गड़बड़ी हुई?
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क्या चयन प्रक्रिया में कुछ खास वर्ग या कोचिंग-नेटवर्क को फायदा मिला?
ये सवाल सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अब युवा सड़कों और अदालतों की ओर देखने लगे हैं।
“भर्ती निकालो, लेकिन नौकरी मत दो” — क्या यही मंशा?

आलोचकों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया सरकार की उस सोच को दर्शाती है जिसमें
भर्ती निकालकर आंकड़े दिखाए जाते हैं,
लेकिन चयन इस तरह किया जाता है कि अधिकांश युवा बाहर रह जाएं।
इससे एक ओर बेरोजगारी के आंकड़े नियंत्रित रहते हैं,
तो दूसरी ओर सरकार यह कह सकती है —
“हमने तो मौके दिए, छात्र योग्य नहीं निकले।”
सोशल मीडिया एक्टिविज़्म बनाम जवाबदेही
यह भी पहली बार नहीं है जब चयन प्रक्रिया पर सवाल उठे हों। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार विरोध को
मुस्कान,
इमोजी,
और ट्वीट रिप्लाई से शांत करने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन युवाओं का कहना है —
“हमें जवाब नहीं, न्याय चाहिए।”
SOG जांच की मांग क्यों उठ रही है?

अब छात्र संगठनों और अभ्यर्थियों की मांग है कि
इस पूरी भर्ती प्रक्रिया की जांच SOG (Special Operations Group) से कराई जाए।
क्योंकि:
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मामला केवल कटऑफ का नहीं
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यह लाखों युवाओं के भविष्य का सवाल है
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और भरोसे की उस डोर का भी, जो सिस्टम से जुड़ी है
सरकार चुप क्यों है?
अब तक न तो सरकार की ओर से
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कटऑफ पर कोई श्वेत पत्र आया
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न ही चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर ठोस जवाब
और यही चुप्पी सबसे बड़ा सवाल बनती जा रही है।
सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना अच्छी बात है,
लेकिन भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और न्याय उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।
अगर
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50 हजार पदों पर भर्ती के बाद भी
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योग्य छात्र बाहर रह जाते हैं
तो यह सिर्फ “इत्तेफाक” नहीं हो सकता।
सवाल अब सिस्टम से है — और जवाब जांच से ही आएगा।


