संसद में 60 सेकंड का लोकतंत्र? लोकसभा स्पीकर की भूमिका और सरकार की मंशा पर उठते सवाल
लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला द्वारा मात्र एक मिनट में सदन स्थगित किए जाने पर सियासी घमासान तेज़ हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष को संरक्षण और सवाल पूछने वालों को चुप कराया जा रहा है। क्या संसद बहस की जगह नहीं रही? क्या सरकार असहज सवालों से बच रही है?
संसद में 60 सेकंड का लोकतंत्र? स्पीकर की भूमिका और सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल
नई दिल्ली।
देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था—भारतीय संसद—इन दिनों जिस तरह से संचालित हो रही है, उसने आम नागरिक से लेकर संवैधानिक विशेषज्ञों तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला के हालिया आचरण को लेकर विपक्ष ही नहीं, लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले हर व्यक्ति के मन में सवाल उठ रहे हैं।
आज जो दृश्य संसद में दिखा, वह सामान्य संसदीय प्रक्रिया से कहीं दूर नज़र आया।
सुबह 11 बजे स्पीकर सदन में आए, कार्यवाही शुरू हुई।
अगले 60 सेकंड में विपक्ष को नसीहत दी गई।
और 11:01 बजे सदन स्थगित कर दिया गया।
इतनी जल्दी स्थगन—वह भी तब, जब विपक्ष अपनी बात रखना चाहता था—क्या यह सिर्फ़ संयोग है या किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा?
सत्ता को छूट, सवालों पर सज़ा?
विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष के सांसदों की तीखी और कई बार आपत्तिजनक टिप्पणियों पर स्पीकर की चुप्पी साफ़ दिखाई देती है।
, लेकिन जैसे ही विपक्ष सवाल उठाता है—कार्यवाही रोक दी जाती है।
यही नहीं, राज्यसभा में भी वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को बार-बार बोलने से रोका जाना, लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर सीधा आघात माना जा रहा है।
सवाल उठता है—
क्या संसद अब बहस की जगह नहीं रही?
क्या असहमति अब अव्यवस्था घोषित कर दी गई है?
स्पीकर की कुर्सी निष्पक्ष है या सत्ता के साथ खड़ी?
संविधान के अनुसार, लोकसभा स्पीकर का पद निष्पक्षता का प्रतीक होता है। वह न सरकार का होता है, न विपक्ष का—वह सदन का होता है।
लेकिन हालिया घटनाओं ने इस संवैधानिक विश्वास को गहरी चोट पहुंचाई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि स्पीकर का रवैया एकतरफ़ा दिखे, तो इसका सीधा संदेश जनता तक जाता है कि संसद अब सरकार से सवाल पूछने की जगह नहीं रही।
सरकार की मंशा पर सवाल क्यों?
जब:
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बहस से पहले स्थगन हो
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सवाल पूछने वालों को चुप कराया जाए
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और जवाब देने वालों को संरक्षण मिले
तो सवाल सिर्फ़ स्पीकर पर नहीं, सरकार की मंशा पर भी उठते हैं।

क्या सरकार असहज सवालों से बचना चाहती है?
क्या संसद को सिर्फ़ औपचारिक मुहर लगाने की संस्था बनाया जा रहा है?
लोकतंत्र सिर्फ़ चुनाव नहीं होता
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ़ वोट डालना नहीं, बल्कि चुनी हुई सरकार से लगातार सवाल पूछना होता है। संसद उसी सवाल-जवाब की जगह है।
अगर वही मंच सीमित कर दिया जाए, तो यह केवल विपक्ष की हार नहीं—यह देश के लोकतंत्र की हार है।
आज संसद में जो हो रहा है, वह आने वाले समय के लिए एक चेतावनी है।
क्योंकि जब सवाल दबते हैं, तो जवाब भी मर जाते हैं।
Hindu Solanki 
