मणिपुर में सरकार बनी, लेकिन शांति नहीं लौटी: शपथ के 24 घंटे में हिंसा, विरोध और शटडाउन
करीब एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद मणिपुर में नई सरकार बनी, लेकिन 24 घंटे में ही चुराचांदपुर समेत कई इलाकों में हिंसा और विरोध भड़क उठा।
मणिपुर में सरकार बनी, फिर भी सुलग उठा राज्य
राष्ट्रपति शासन के बाद सत्ता आई, लेकिन ज़मीन पर भरोसा क्यों नहीं लौटा?
करीब एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद मणिपुर में 4 फरवरी 2026 को नई सरकार का गठन हुआ। भाजपा के वरिष्ठ नेता युमनाम खेमचंद सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

सरकार बनने के साथ ही उम्मीद जताई जा रही थी कि लंबे समय से हिंसा, विस्थापन और अविश्वास के दौर से गुजर रहा मणिपुर अब धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौटेगा।
लेकिन सरकार के गठन के महज़ 24 घंटे के भीतर ही चुराचांदपुर समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन, झड़पें और हिंसा सामने आ गईं। सवाल उठने लगे — जब बहुमत साबित हो चुका है, तो बवाल क्यों?
राष्ट्रपति शासन: शांति का इंतज़ार, समाधान का अभाव
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन का उद्देश्य था:
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हिंसा को रोकना
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समुदायों के बीच तनाव कम करना
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राजनीतिक समाधान का रास्ता निकालना
लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह रही कि इस दौरान:
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संवाद की प्रक्रिया ठप रही
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विस्थापित परिवारों की वापसी अधूरी रही
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समुदायों के बीच भरोसा बहाल नहीं हो सका
राष्ट्रपति शासन ने हालात “फ्रीज़” तो कर दिए, लेकिन घावों को भरने का काम नहीं हुआ। यही कारण है कि जैसे ही राजनीतिक सत्ता लौटी, दबा हुआ गुस्सा बाहर आ गया।

नई सरकार का ढांचा: संतुलन की कोशिश या मजबूरी?
नई सरकार ने जातीय संतुलन साधने की कोशिश की:
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मुख्यमंत्री: युमनाम खेमचंद सिंह (मैतेई समुदाय)
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उपमुख्यमंत्री:
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नेमचा किपजेन (कुकी समुदाय)
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एल. दिखो (नागा समुदाय)
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कागज़ों पर यह समावेशी सरकार दिखती है, लेकिन कुकी संगठनों का तर्क अलग है। उनका कहना है कि यह सिर्फ प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है, जबकि उनकी असली मांग — अलग प्रशासन (Separate Administration) — को फिर नजरअंदाज कर दिया गया।

कुकी समाज का विरोध: सत्ता नहीं, पहचान का सवाल
कुकी-जो समुदाय पिछले कई महीनों से यह मांग कर रहा है कि:
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उन्हें अलग प्रशासनिक व्यवस्था मिले
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मौजूदा ढांचे में वे खुद को असुरक्षित मानते हैं
नई सरकार में कुकी नेताओं की भागीदारी को समुदाय के कई संगठनों ने विश्वासघात करार दिया। यही वजह है कि:
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कुकी विधायकों के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार का ऐलान हुआ
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पहाड़ी इलाकों में टोटल शटडाउन बुलाया गया
यह विरोध सिर्फ सरकार के खिलाफ नहीं था, बल्कि अपने ही प्रतिनिधियों के खिलाफ था — जो हालात को और विस्फोटक बना देता है।

चुराचांदपुर हिंसा: अचानक नहीं, पहले से तैयार माहौल
5 फरवरी की शाम चुराचांदपुर में जो कुछ हुआ, वह किसी एक चिंगारी का नतीजा नहीं था।
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प्रदर्शन पहले से घोषित था
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बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे
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सुरक्षाबलों से सीधी टक्कर हुई
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करीब 12 लोग घायल हुए
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, भीड़ संगठित थी और संवेदनशील इलाकों को जानबूझकर चुना गया। इससे यह साफ होता है कि असंतोष लंबे समय से भीतर पक रहा था।
अंदरूनी टूटन: जब समाज अपने नेताओं को ही खारिज कर दे
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह सबसे खतरनाक संकेत होता है जब:
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समुदाय अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को मानने से इंकार कर दे
कुकी विधायकों का सामाजिक बहिष्कार यह बताता है कि:
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नेतृत्व और जनता के बीच गहरी खाई बन चुकी है
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सरकार में शामिल होना अब समाधान नहीं, बल्कि विवाद का कारण बन गया है

पर्दे के पीछे कौन? कई परतों में बंटी कहानी
हालात को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियां और राजनीतिक विश्लेषक कई एंगल से मामले को देख रहे हैं:
कट्टर सामुदायिक संगठन
जो किसी भी तरह के समझौते के खिलाफ हैं और टकराव को ही दबाव का जरिया मानते हैं।
राजनीतिक अस्थिरता से लाभ उठाने वाले तत्व
जो नई सरकार को शुरू में ही कमजोर दिखाना चाहते हैं।
सीमा से सटे इलाकों का फैक्टर
म्यांमार सीमा से लगे क्षेत्रों में पहले भी उग्रवादी गतिविधियों और अवैध नेटवर्क की चर्चा रही है। हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
सरकार का दावा और ज़मीनी सच्चाई
मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह ने कहा है कि:
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विस्थापितों का पुनर्वास
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शांति और कानून-व्यवस्था
सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि:
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राजनीतिक समाधान पर कोई स्पष्ट टाइमलाइन नहीं
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Separate Administration पर चुप्पी
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संवाद की ठोस पहल नजर नहीं आ रही
बड़ा सवाल: क्या सिर्फ सरकार बनना काफी है?
मणिपुर की स्थिति यह साफ करती है कि:
सिर्फ बहुमत साबित कर लेना,
राज्य को स्थिर नहीं करता।
जब तक:
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समुदायों को भरोसे में नहीं लिया जाएगा
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उनकी मांगों पर खुलकर बात नहीं होगी
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और राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखेगी
तब तक हर नई सरकार
पुराने संकट को नए रूप में झेलती रहेगी।
मणिपुर में बवाल इसलिए नहीं हुआ कि सरकार बनी,
बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि लोगों को लगा कि उनकी पीड़ा फिर अनसुनी रह गई।
यह संकट कानून-व्यवस्था से ज्यादा
विश्वास और राजनीतिक ईमानदारी का संकट है।
Hindu Solanki 
